1.10.26

चार धाम यात्रा

 23 सितंबर, 2026 

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दो मित्रों प्रमोद और आशुतोष के साथ ट्रेन नम्बर 13009 दून एक्सप्रेस में बैठे हैं। बनारस से सही समय 11.10 A. M. पर छूटी है।  15-16 दिन की जमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ, तुंगनाथ की लम्बी यात्रा है। इस ट्रेन का कल सुबह 5. 20A.M. हरिद्वार  पहुंचने का समय है। बंगलोर से देहली होते हुए अरविन्द के साथ आनंद भी पहुँच रहे हैं हरिद्वार। कल सुबह 5 मित्रों का हर की पौड़ी में स्नान, मनसा देवी दर्शन और हर की पैड़ी में गंगा आरती देखने का प्रोग्राम है। बनारस से एक मित्र और अजीत भाई भी चलने वाले थे, किसी कारण से उनका आना नहीं हो सका। चार धाम सब किस्मत से कर पाता है। हम लोग चले तो हैं लेकिन कहाँ पहुँच पाते हैं, कहाँ नहीं, सब ईश्वर पर निर्भर करता है।


24 सितंबर 

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अपनी ट्रेन लेट हो गई है। अभी मुरादाबाद पहुँचे हैं जबकि अब तक हरिद्वार के करीब होना चाहिए था। 2.30 घण्टे लेट है। अपनी आदत के अनुसार हम जगकर घूमने के लिए तैयार हो चुके हैं, नींद उड़ चुकी है। 


मुरादाबाद से आगे चली है ट्रेन। बाहर, भीतर अँधेरा है सिर्फ मेरा मोबाइल और चश्मे के भीतर मेरी ऑंखें चमक रही हैं। पैर दौड़ने के लिए बेताब है, मन उड़ना चाहता है लेकिन मजबूरी है, लेटे हैं लोहे के घर के अपने बर्थ में। यह सम्पन्न मित्रों का ग्रुप है, 2nd. A.C. की आराम दायक बर्थ है, बाहरी शोर कम सुनाई देता है, सोने के लिए ठीक है। स्लीपर में अलग आनंद है। खिड़की से फोटोग्राफी की जा सकती है, स्टेशन आने पर हाथ बढ़ाकर कुछ खरीदा जा सकता है और अनजान यात्रियों से खूब बातें की जा सकती हैं। स्लीपर क्लास के यात्री आपस में दिल खोलकर बतियाते हैं, इस बोगी में तो सब मुँह बनाकर अपरिचितों से सावधान की मुद्रा में दिखते हैं। यात्रा का मेरा अनुभव कहता है कि कम दूरी (4,5 घण्टे) की यात्रा स्लीपर में, रात की यात्रा 3rd AC में और दिन-रात की,  लम्बी दूरी की यात्रा 2nd AC में करनी चाहिए। 


अभी सुबह के 5.20 हुए हैं। ट्रेन सही समय पर होती तो अभी हरिद्वार के प्लेटफार्म पर उतर रहे होते। हाय! अभी अँधेरे में लेटे-लेटे सिर्फ ट्रेन के चलने की आवाज सुन रहे हैं। जब सेवा में थे तो दून पकड़ कर कई बार जौनपुर-बनारस किए हैं, दून से खूब बतियाए हैं, आज दून हमे पहचान पाती तो जानती कि उसका एक पुराना यात्री 'बेचैन आत्मा' लोहे के घर में कल दिन से सफर कर रहा है। 😃


अंततः दून 3 घण्टे विलम्ब से हरिद्वार पहुंची और हमने उसे मात्र 3 घण्टे विलम्ब के लिए धन्यवाद दिया। रात भी कर देती तो मैं क्या बिगाड़ लेता? 


आगे सब अच्छा रहा। सेठ आनंदमयी जयपुरिया धर्मशाला में अपना दो रूम, एक 3 बेड वाला दूसरा 2 बेड वाला, पहले से बुक था। यह धर्मशाला राम घाट में है। हर की पैड़ी की 400 मीटर की पैदल दूरी है। हम कमरे में सामान रखकर गंगा स्नान के लिए हर की पैड़ी चल दिए। हालांकि गंगा स्नान तो उसी धर्मशाला में ही हो जाता लेकिन हमको हर की पैड़ी में स्नान का मन था। धर्मशाला में बकायदा गंगा घाट बना है। आँगन से सीड़ी उतरकर घाट में जाने का रास्ता है। धर्मशाला में ठहरे यात्रियों के अलावा कोई दूसरा नहीं जाता। पुरुष तो कहीं भी कपड़े बदल सकते हैं लेकिन यहाँ महिलाओं के लिए भी कपड़े बदलने की अच्छी व्यवस्था है। 


हर की पैड़ी में गंगा स्नान, चंदन मंदन, संकलप के बाद हम गलियों में घूमते हुए प्राचीन मथुरा की दुकान की कचौड़ी खाते हुए कमरे में लौटे। थोड़ी देर आराम करने के बाद माँ मनसा देवी के दर्शन के लिए 'रोप वे' से पहुँचे। आराम से दर्शन हुआ। दर्शन के बाद होटल 'होशियार पुरी' में स्वादिष्ट भोजन के बाद कमरे में आराम किया और शाम को पुनः हर की पैड़ी की गंगा आरती देखने पहुँच गए। देर शाम आनंद लेते हुए, एक पुरुआ दूध पीते हुए कमरे में लौटे। दिन के भारी भोजन के बाद शाम को भोजन की इच्छा नहीं थी। 

अब इतना लिखने के बाद सोने का मन है। कल सुबह सूर्योदय से पहले ही निकलना है बरकोट की यात्रा के लिए। शुभ रात्रि।


25 सितंबर 

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केशर सिंह इनोवा क्रिस्टा गाड़ी नम्बर UK07TE7218 लेकर आए। बारकोट के लिए हमारी यात्रा सुबह 6.40 से प्रारम्भ हुईं। कल 24 सितंबर की शाम हरिद्वार में खूब बारिश हुई थी, सुबह का मौसम भी बादल और नमी लिए हुए खूबसूरत था। जयपुरिया भवन से निकलकर गलियों से होते हुए मुख्य सड़क पर गाड़ी तक आना भी कठिन था। एक ऑटो ड्राइवर के सहयोग से सभी सामान गाड़ी में रखा जा सका। 5 मित्रों का 15 दिनों की यात्रा का सामान भी खूब था। दो घण्टे चलने के बाद रास्ते में हमने प्रमोद जी द्वारा गुजरात से मँगाए गए फाफड़े का स्वाद लिया और एक स्थान पर रुककर चाय पिया।


शाम 3 बजे तक ऋषिकेश होते हुए,  एक गाँव में पहाड़ी दीदी की चाय पीते हुए, बरकोट यात्री निवास GMVN पहुँच गए। वहाँ की व्यवस्था दयनीय थी। कमरे में न पँखे, न AC और तो और बिजली भी गायब थी। कोई किचन नहीं था। कमरे भी 3 मंजिल ऊपर, सामान चढ़ाना कठिन। 3 कमरों का पूर्ण भुगतान ऑनलाइन पहले ही किया जा चुका था। पहली बार तो हम लोगों की बुद्धि गोल हो गई, लगा की पहाड़ी यात्रा अभी से दुष्कर, रोमांचक होने वाली है। वहाँ के व्यवस्थापक से बात करने पर समस्या का हल निकला। एक किलोमीटर आगे बरकोट पार्किंग, बाजार के पास GMVN का दूसरा गेस्ट हाउस था। संजोग से वहाँ 3 कमरे खाली थे। हमारे कमरे वहाँ समायोजित कर दिया गया और हम लोगों की बड़ी समस्या टली। 


अभी जहाँ रुके हैं, वहाँ भी ac तो नहीं है लेकिन और सभी सुविधाएं हैं। यहाँ का मौसम भी पँखे से काम चलने वाला है। AC की आवश्यकता नहीं है। शाम बाजार में घूमकर पहाड़ी सेव और खीरे का आनंद लिया। प्रमोद जी ने 1kg पहाड़ी लाल चावल खरीदा। हमने गूगल सर्च किया तो यह चावल बनारस में ऑनलाइन उपलब्ध दिखा। सोचा, वहीं ऑनलाइन मंगा लेंगे, यहाँ ढोकर क्यों ले जाया जाय। प्रमोद जी का कहना था 1kg ले जाकर स्वाद चखा जाय, बढ़िया होगा तो मंगाया जाएगा। बाजार से लौटकर कीचन में बढ़िया भोजन बनवाया और आराम किया। कल सुबह आसपास घूमते हुए शाम तक GMVN जानकी चट्टी पहुँचने का प्रोग्राम है। वहाँ भी दो रात के लिए कमरों की अग्रिम बुकिंग हो चुकी है। शुभ रात्रि।


26 सितंबर 

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सुबह नहा धो कर हम 4 मित्र बारकोट से लाखा मंडल दर्शन के लिए निकले। अरविन्द ने अपने को अस्वस्थ बताया और नहीं गए। बारकोट से लाखा मंडल की दूरी 25km है। अन्तिम 5 km तो यमुना नदी के किनारे-किनारे गाड़ी चलती  है। कहीं-कहीं मार्ग खराब था, लैंड स्लाइड हुईं थी और क्रेन / ट्रैक्टर मलबा उठा रहे थे। 


लाखा मंडल में भगवान शिव का प्राचीन शिव मन्दिर है। कहा जाता है कि प्राचीन समय में यहाँ लाखों शिवलिंग मिले थे, इसलिए इसका नाम लाखा मंडल हुआ। यह कथा भी प्रचलित है कि महाभारत में दुर्योधन ने पांडवों के लिए लक्षागृह यहीं बनवाया था। अंदर ग्रेफाइट का एक प्राचीन शिवलिंग है जो पानी डालने पर आइने की तरह चमकता है और इसमे अपना प्रतिबिम्ब दिखता है। हम गए तो वहाँ पुजारी ने लोटे में जल का प्रबंध कर रखा था। शिवलिंग पर जल चढ़ाने में बनारसियों को बहुत आनंद आता है। हमने भी जल चढ़ाया और आनंद लिया। एक वीडियो भी बनाया जिसे बाद में अपने यूट्यूब चैनल bechain atma में पोस्ट कर दिया। लिंक यह रहा....(https://youtube.com/shorts/COSS10SW8Pw?si=sNHgrPgybtWG_MND)


लाखा मंडल से वापस gmvn के कमरे में आकर समाचार पढ़ा तो मन खिन्न हो गया। पूरे उत्तराखण्ड में 26, 27 को भारी बारिश का रेड एलर्ट! स्कूल कॉलेज दो दिन के लिए बन्द। नाश्ता करते-करते बारिश शुरू हो गई। हम रास्ते के दृश्यों को देखते हुए जानकी चट्टी की यात्रा के लिए तैयार थे। वहाँ भी gmvn में अपने कमरे बुक थे। यहाँ से दूरी लगभग 50-60km थी।  यहाँ से चेक आउट का समय हो चुका था। हमने किसी तरह से अपना सामान इनोवा के रैक में लदवाया, प्लास्टिक चढ़वाया और भीगते-भागते बैठ गए गाड़ी में। 30km चले होंगे कि आगे प्रशासन द्वारा गाड़ी रोक दी गई। भारी बारिश की संभावना के कारण यात्रा रोकी जा रही थी, गाड़ियों की लम्बी लाइन लगी थी।


अब हम फंस चुके थे। जानकी चट्टी में 2 दिन के लिए 3 रूम बुक थे, ऑनलाइन भुगतान किया जा चुका था। अभी हम मात्र 20km दूर थे। बरकोट वापस जाने, नया होटल लेने का मतलब खर्चा लम्बा होना। अब रूम कैंसिल करने पर पैसा वापस भी नहीं मिलता। क्या करें-क्या करें सोचते हुए 2 घण्टे बीत गए। तभी देखा,  एक गाड़ी जा रही है! हमने प्रमोद को वहाँ तैनात सिपाही से बात करने के लिए भेजा। उसने लम्बा तर्क वितर्क किया। 


वह गाड़ी कैसे गई?

स्थानीय लोग हैं,  अपने घर नहीं जाएंगे? ये जमुनोत्री नहीं जा रहे हैं।

हमारा भी 2 दिन के gmvn जानकी चट्टी में रूम बुक है, मात्र 20km है। बारिश नहीं रुकी तो हम भी जमुनोत्रि नहीं जाएंगे।

हम क्या करें? ऊपर से आदेश है। हमको ऊपर से आदेश दिला दीजिये, जाइए।

प्रमोद ने ऊपर राहत दल को अपना परिचय देते हुए फोन लगाया। वहाँ भी लम्बे बहस के बाद इस शर्त पर जाने की अनुमति मिली की बारिश नहीं रुकी तो आप लोग जानकी चट्टी में ही रुके रहेंगे, जमुनोत्री नहीं जाएंगे।


हम लोग इस अनुमति से बहुत खुश थे। कई गाड़ियाँ खड़ी थीं और हम आगे जा रहे थे। आगे का रास्ता वाकई खराब था। तेज बारिश हो रही थी। जानकी चट्टी से पहले हनुमान चट्टी आया। हमने गाड़ी रोक कर हनुमान जी के दर्शन का मन बनाया। दो मित्र भीगते हुए, दो रेन कोट का जैकेट पहन कर दर्शन करने के लिए भागे। अरविन्द इस बार भी गाड़ी में बैठा रहा, "हमारा रेन कोट ऊपर सूटकेस में रखा है, आप लोग जाकर दर्शन कर लो।" 


हाँ तो हनुमान चट्टी के हनुमान जी भी काफी ऊँचाई पर थे। चढ़ने के लिए ऊँची-ऊँची 50 सीढ़ियां थीं। पानी-पानी सीढ़ी चढ़ते हुए जब तक ऊपर पहुँचे बिना रेन कोट के चढ़े प्रमोद और आनंद दर्शन करके तेजी से नीचे उतर रहे थे।  हम और शर्मा जी आराम-आराम से चढ़े और दिव्य दर्शन के बाद आराम-आराम से लौटे। वहाँ कोई दुर्लभ प्रतिमा स्थापित नहीं है। आम प्रतिमा है जो हमने खूब देखे हैं लेकिन स्थान का अपना महत्व होता है। भक्तों को हनुमान जी हर रूप में प्रिय हैं।


जानकी चट्टी से 1km पहले शनि मन्दिर भी है लेकिन खराब रास्ते की परेशानी से भक्त लोगों की हिम्मत जवाब दे चुकी थी, हाथ जोड़कर आगे बढ़े और जानकी चट्टी पहुँचकर ही रुके। पार्किंग से gmvn का गेस्ट हाउस मात्र 100 मीटर की चढ़ाई पर है लेकिन जोरदार बारिश ने उतने में ही बुद्धि हरी कर दी। बड़े बक्से पहाड़ी छोरा ले आया लेकिन छोटे सामान तो हमको ही लाने पड़े। सूटकेश पूरी तरह भीग चुका है और चेन  कवर से पानी घुसकर जगह-जगह कपड़े भीग चुके हैं। घनघोर बारिश जारी है। गनीमत यह कि गेस्ट हाउस में बिजली पानी उपलब्ध है, मैनेजर कर्मियों का व्यवहार विनम्र है और रात का भोजन भी हमारी इच्छानुसार बढ़िया बनाया था। बारिश अभी भी हो रही है, खाना खा कर हम अपने कमरों में सो रहे हैं। कल सुबह भी ऐसी ही बारिश होती रही तो ट्रैकिंग करना संभव नहीं होगा, शुभ रात्रि।

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27 सितंबर 

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आज का दिन काफी मनहूस रहा। भारी बारिश के कारण प्रशासन ने चार धाम यात्रा पर प्रतिबंध लगा दिया। लगातार इतनी बारिश हो रही थी कि प्रतिबंध न लगाता तो भी हमारी हिम्मत यमुनोत्री की कठिन चढ़ाई का नहीं था। हमने पूरा एक दिन ट्रैकिंग करने और थककर चूर होने के बाद पूर्ण विश्राम के लिए रखा था। यहाँ ट्रैकिंग तो नहीं हुई, पूर्ण विश्राम हो गया।


कोई कल शाम बारिश से भीगे कपड़े सुखवाने लगा, कोई तानकर सो गया। 48 घण्टे की मूसलाधार बारिश ने जानकी चट्टी का तापमान 2 डिग्री सेंटिग्रेट तक गिरा दिया था। हमने गर्म कपड़े रखे थे तो कोई परेशानी नहीं हुई। एक लाभ यह भी हुआ कि भारी बारिश और यात्रा पर प्रतिबंध के कारण पूरे गेस्ट हाउस में हमारा अलावा दो चार यात्री ही थे। अरविन्द बगल के 12 बेड वाले हॉल में सभी बेड पर अपने भीगे कपड़े फैला कर सुखा रहे थे। प्रमोद गेस्ट हाउस के मैनेजर से एक बड़ा हीटर मांग लाए थे, आनंद उसी पर अपने सूटकेश, कपड़े सुखा रहे थे। शर्मा जी गैसट्रिक से परेशान थे, रजाई के ऊपर कंबल लादकर सो रहे थे और हम अपने मोबाइल से तस्वीरें ब्लॉग पर, वीडियो यूट्यूब पर लोड करने, यात्रा वृतांन्त लिखने, मोबाइल साफ करने में भिड़े हुए थे। किसी के घर से फोन आता तो यही ताना सुनने को मिलता कि इतनी दूर सोने गए हैं! पूरा दिन बिता, रात आई लेकिन हमारे सोने तक बारिश नहीं रुकी।


28 सितंबर 

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जैसे कल का दिन मनहूस था, वैसे आज का दिन यात्रा का अबतक का सबसे आनंद दायक था। सुबह 5 बजे खबर मिली, यात्रा पर प्रतिबंध हट गया है। कमरा खोल कर बाहर निकले तो बारिश रुक चुकी थी, आसमान साफ था। कमरों में प्रमोद का शोर गूंजने लगा...यात्रा प्रारम्भ हो चुकी है, जागो! उठो! तैयारी करो। 


दो घण्टे में नहा धोकर, पूरे कपड़े(इनर, लोअर, फुल जैकेट, रेनकोट, टोपी) पहन कर, हाथों में लाठी लेकर जब 5km की ट्रैकिंग के लिए बाहर निकले तो घड़ी में सुबह के 7 बज रहे थे और सामने बारिश से धूलि-धूलि हिमालय की चोटियाँ दिख रही थीं । यह कल शाम को ही तय था कि हर हाल में 12 बजे तक यहाँ से आगे की यात्रा के लिए कूच कर जाना है, नहीं तो आगे का प्रोग्राम चौपट हो जाता। हर जगह gmvn का गेस्ट हॉउस बुक है।  हमारे पास दिनभर ट्रैकिंग करने और विश्राम करने का समय नहीं था। एक दिन पहले ही पूर्ण विश्राम हो चुका था। बारी-बारी से सबने घोड़े बुलाए और चढ़कर माता यमुनोत्री के दर्शन के लिए चल दिए। प्रमोद और आनंद ने तो गेस्ट हाउस में ही घोड़े बुलवा लिए थे, हम और शर्मा जी 4 घण्टे में पैदल ही दर्शन का दम्भ भर रहे थे लेकिन 500 मीटर की ट्रैकिंग से यह समझ में आ गया कि यदि पैदल यात्रा किया तो लौटने में शाम हो जाएगी और थकने के बाद आगे की यात्रा नहीं हो पाएगी,  12 बजे तक अगली यात्रा के लिए प्रस्थान करना तो असम्भव है। हारकर हम भी घोड़े पर चढ़ गए। हमारे पीछे अरविन्द भी घोड़े पर चढ़े आते दिखाई दिए। 500 मीटर की ट्रैकिंग से फायदा यह हुआ कि जहाँ प्रमोद, आनंद और अरविन्द को घोड़े 2000/-में मिले, हमको 1500/- में ही मिल गए। घोड़े पर चढ़कर ज्यों-ज्यों हम ऊपर चढ़ते जाते, यह एहसास पक्का होता जाता कि 4 घण्टे में तो पैदल आना-जाना और दर्शन करना संभव नहीं था। भयंकर खड़ी चढ़ाई है। 5km, सपाट सड़क के 25km के बराबर है। 


2 दिन से यात्रा प्रतिबंधित थी तो जब हम 9 बजे यमुनोत्री धाम पहुँचे तो मुश्किल से 8, 10 यात्री ही जुट पाए थे। दिव्य, आराम दायक दर्शन के बाद जब हम वापस आए तो घड़ी में 11 बज चुके थे। 


नाश्ते के बाद हमने जल्दी-जल्दी सामान गाड़ी में रखवाना शुरू किया और चल दिए उत्तरकाशी की अगली यात्रा के लिए। आज उत्तरकाशी के भागीरथी gmvn गेस्ट हाउस में कमरे बुक थे। बरकोट तक की दूरी के 45km की यात्रा में 20km का मार्ग बहुत खराब है। जगह-पत्थर गिरे थे, किचड़ / मिट्टी में गाड़ी फिसल रही थी। जरा सा ड्राइवर चूकता तो हजारों फीट गहरे खाई में गिरकर हमारी यात्रा यहीं पूर्ण हो जाती। उस पर मजा यह की यात्रा खुलने के कारण सैकड़ों कारों, बसों के काफिले आते जा रहे थे। सिंगल, कीचड़ भरे रास्ते में गाड़ियों की इस भीड़ के कारण 20km जाने में 2 घण्टे लग गए। आगे उत्तरकाशी तक का 81km का मार्ग बढ़िया था। हम रुकते, नाश्ता करते, चाय पीते हुए शाम 6. 45 तक गेस्ट हॉउस पहुँच चुके थे।


सामान रखकर, हाथ-मुँह धोकर हम लोग पैदल ही श्री काशी विश्वनाथ मन्दिर पहुँचे। गेस्ट हॉउस से मन्दिर मात्र 600मीटर की दूरी पर है। हम काशी के निवासी उत्तरकाशी में श्री काशी विश्वनाथ मन्दिर, माँ शक्ति मन्दिर, प्राचीन खूब लम्बा त्रिशूल, शनिदेव, बजरंगबली,, गणेश जी और दूसरे देवताओं के भव्य मन्दिर के दर्शन से अभिभूत थे। दिव्य दर्शन के बाद पुल पर खड़े हो गोमुख से निकलने वाली, गंगोत्री से होकर आने वाली भागीरथी नदी के प्रवाह का आनंद लिया। इन सबके बाद जब हम गेस्ट हॉउस में पहुँचे शाम के 9 बज चुके थे। स्वादिष्ट भोजन के बाद खूब गहरी नींद आई। कल का दिन जितना मनहूस था, आज का दिन उतना ही आनंद दायक था। जीवन यात्रा में समय एक सा नहीं रहता, दुःख के बाद सुख भी आते हैं, हमे बस धैर्य के साथ संकट का सामना करना होता है।

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29 सितम्बर 

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कल शाम के श्री काशी विश्वनाथ मन्दिर के दर्शन ने ही मन यह भाव उत्पन्न कर दिया था कि प्रातः काल स्नान करके यहाँ आना है। उत्तरकाशी में अधिक ठण्ड भी नहीं थी। हम भोर में ही स्नान करके सुबह 6 बजने से पहले गलियों से होते हुए मन्दिर पहुँच गए। आज मन्दिर और खूबसूरत दिखा। शान्त वातावरण में दिव्य दर्शन हुए। मन्दिर से बाहर निकले तो पता चला बगल में हनुमान जी का भव्य मन्दिर है।

आज मंगलवार था। हम और शर्मा जी पहुँच गए हनुमान मन्दिर। उस समय मन्दिर में आरती चल रही थी। कुछ भक्त हाथ जोड़ पंक्तिबद्ध खड़े थे। हमने भी उनका अनुसरण किया। मन्दिर में प्रतिमा के पास खड़े हो पुजारी निरंतर जोर-जोर से हनुमान स्तुति का पाठ कर रहे थे। एक भक्त पीछे घण्टा बजा रहा था। एक पुजारी पंक्ति बद्ध खड़े भक्तों के हाथों में एक गेंदे का पुष्प थमा रहे थे और हमारे जैसे नए भक्तों को समझा भी रहे थे, 'आरती से पहले जाना नहीं।'


हम धैर्य के साथ पूर्ण भक्ति भाव से हाथ जोड़कर दूसरे भक्तों के साथ खड़े रहे और आरती के बाद पुजारी की तस्तरी में दक्षिणा के साथ पुष्प समर्पित कर दिए। पुजारी किसी से दक्षिणा की मांग नहीं कर रहे थे। सब भक्तों की श्रद्धा पर था था। 


मन्दिर की एक परिक्रमा कर, बजरंग बली का दर्शन कर जब बाहर निकले तो बाहर तीर के साथ दीवार में लिखा मिला... संध्या गंगा आरती स्थल! मन मे विचार आया, आरती नहीं, गंगा जी के दर्शन ही कर लिए जांय। बनारस की गलियों की तरह उत्तर काशी की गलियाँ पार करते हुए पास ही स्थित गंगा घाट की सीढ़ियां उतर गए।


गंगा तट पर विशाल भव्य घाट बना था। सामने पहाड़ों के किनारे हर-हर बहती भागीरथी के दिव्य दर्शन हुए।  घाट में एक शिला पर महादेव की पीतल की विशाल प्रतिमा स्थापित थी। हमने वीडियो बनाए, गंगा आचमन किया, अपने ऊपर जल छिड़का और घाटों का भ्रमण किया। गंगा की धार हरिद्वार से भी तेज थी। कोई स्नान नहीं करते नहीं दिखा। कुछ मॉर्निंग वाकर विशाल घाटों पर घूमकर, योगाभ्यास कर रहे थे। ऊँचे पहाड़ों पर धूप चमकने लगी थी। घाटों की सफाई देखते ही बनती थी। जगह जगह स्वक्षता के स्लोगन भी लिखे हुए थे। ऐसा प्रतीत हुआ कि यहाँ के नागरिक स्वक्षता का खूब ध्यान रखते हैं।


अपना दर्शन, पूजन, प्रातः भ्रमण, वीडियोग्राफी सब हो चुका था। शर्मा जी के साथ गलियों से होते हुए जब हम वापस लौटने लगे आनंद टोपले चंदन मंदन लगा कर आते दिखलाई दिए उनके पीछे अरविन्द भी थे। प्रमोद तो हनुमान मन्दिर में ही खड़े दिखे थे। 


गेस्ट हॉउस में लौटकर, नाश्ते के बाद 8 बजे तक हमारी गंगोत्री यात्रा प्रारम्भ हो चुकी थी। रास्ते भर हमने पहाड़ी दृश्यों का खूब आनंद लिया। पूरे सर्पाकार पहाड़ी मार्ग में भागीरथी कभी दाएं, कभी बाएं बहती दिखीं। पहाड़ी झरने खूब दिखे। जब गंगोत्री पास आने लगा, पहाड़ों के ऊपर चांदी की तरह चमकती हिमालय की चोटियों के भव्य दर्शन ने मन मोह लिया। पूरा मार्ग प्राकृतिक ऊर्जा से इतना भरा हुआ था कि किसी में थकान नाम की चीज नहीं थी। दुर्गम पहाड़ी मार्ग तय करते हुए हम पहुँच चुके थे गंगोत्री धाम।


यहाँ कोई चढ़ाई नहीं थी, धाम में 400 मीटर की पैदल यात्रा के बाद हम मुख्य मन्दिर के सामने पंक्तिबद्ध खड़े हो चुके थे।  अधिक भीड़ नहीं थी। भक्तों की संख्या हजारों में नहीं, सैकड़ों में ही थी। कुछ ही देर में हम गर्भ गृह में प्रवेश कर चुके थे। भीतर गंगोत्री माँ के साथ कई प्रतिमाएं स्थापित थीं।पुजारी ने कृपा किया, बढ़िया ढंग से प्रतिमा के बारे में ज्ञान दिया। हम धन्य हुए। 


गर्भगृह से बाहर निकलकर हमने खूब फोटोग्राफी की। मित्र प्रसाद लेने के बाद प्लास्टिक के छोटे डिब्बे में गंगाजल भरने के लिए घाटों की सीढ़िया उतरने लगे, हम ऊपर किनारे खड़े हो वीडियो बनाते रहे। बाहर निकलकर गाड़ी में बैठने तक 3 बज चुके थे। 


गंगोत्री से 25km आगे हर्षिल घाटी में हमारा होटल रॉयल krista में अपना कमरा आरक्षित था। शाम 5 बजे तक हर्षिल घाटी के बागोरी गाँव में जब हमने अपने गेस्ट हॉउस में प्रवेश किया मन आनंद से भर गया। कमरों के फर्श की टाइल्स, दीवारें, सिलाब सब लकड़ी की लग रही थीं। भीतर सब सुविधा के सामान थे।


सामान रखकर जब हम बाहर घूमने निकले बाहर का वातावरण अत्यधिक आनंद दायक था। ऐसा खूबसूरत गाँव हमने पहले कभी नहीं देखा। पहाड़ी पक्के पैदल मार्ग में बीच-बीच में पुलिया के नीचे बहती भागीरथी नदी की धार, ऊपर तीन दिशाओं में चांदी की तरह चमकती हिमालय की चोटियां और सामने सेव के वृक्षों की शाखों पर में लटक रहे रस भरे पके सेव मन को मोह रहे थे। एक दो सेव तोड़कर हमने खाया तो रस से भरे सेव इतने मीठे थे कि पूछिए मत, ऐसे सेव हमने पहले कभी नहीं खाए। 


600-700 मीटर पैदल स्वर्ग में चलते हुए जब हम हर्षिल पोस्टऑफिस पहुँचे तो राजकपूर और उनकी प्रसिद्ध फिल्म फिल्म 'राम तेरी गंगा मैली' की मन्दाकिनी सामने आ गई। 1985 में यहाँ इस फिल्म की सूटिंग हुई थी। आज भी यह पोस्ट ऑफिस चालू हालत में है। गाँव की पहाड़ी गलियों, पुराने लकड़ी के घरों, बौद्ध मंदिरों और सेव के बगानों का दर्शन करते हुए जब हम कमरों में पहुँचे तो शाम ढल चुकी थी, ठण्ड काफी बढ़ चुकी थी। 


अपने रायल्स होटल के 2,3 कर्मचारियों ने हमारी इच्छानुसार भोजन तैयार किया हुआ था। भोजन घर की तरह सादा और स्वादिष्ट था। आज का पूरा दिन भी आनंद दायक रहा। गंगोत्री धाम का दर्शन और हर्षिल की घाटी में गाँवों का भ्रमण जीवन में कभी न भुलाने वाली यात्रा थी। सोने से पहले हमने और प्रमोद ने तय किया कि कल सुबह प्रातः भ्रमण इन्हीं वादियों में होगा।

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30 सितम्बर 

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आज की मॉर्निंग वेरी वेरी वेरी गुड थी। प्रातः 6 बजे हम शर्माजी और प्रमोद के साथ भ्रमण के लिए निकल चुके थे। कड़ाके की ठंड थी। तापमान शून्य से 2 डिग्री के बीच होगा। हमने ऊनि लोअर, इनर के बाद हॉफ जैकेट, टोपी पहन रखा था। प्रमोद ने तो मफलर, टोपी, जैकेट के बाद रेन सूट भी पहन रखा था। शर्मा जी भी कई पर्त में कपड़े पहने चल रहे थे। उजाला हो चुका था। सेव बागान लटके सेवों को देखते हुए हम आगे बढ़ रहे थे। आसमान साफ था। तीन दिशाओं में हिमालय की पर्वत श्रृंखलाएं दिख रही थीं। एक चोटी पर जब सूर्य की सुनहरी किरणे पड़ी, हिमाच्छादित हिमालय सुनहरा हो गया। धीरे-धीरे धूप पड़ती गई, हिमालय की चोटियाँ चाँदनी से नहाती गईं। एक पुलिया के नीचे भागीरथी तेज धार में हर-हर, गोल-गोल, बड़े-बड़े पत्थरों से टकराती बह रही थीं और ऊपर हिमालय चम चम चमक रहा था। हर्षिल घाटी मे बगोरी गाँव की सड़कें पक्की थीं। घूमते-घूमते फिर हर्षिल पोस्टऑफिस तक पहुँचे जहाँ मन्दाकिनी पोस्टमास्टर से अपने प्रेमी की चिट्ठी मांग रही थी। पोस्ट ऑफिस में ताला जड़ा था। लगा कि अभी भी भागीरथी नदी में मन्दाकिनी नहाते हुए गा रही है... राम तेरी गंगा मैली हो गई, पापियों के पाप धोते-धोते...। राजकपूर ने अपनी फिल्म 'राम तेरी गंगा मैली हो गई ' की सूटिंग के लिए हर्षिल गाँव को चुना तो इस गाँव में कोई खास बात तो होगी। हमने एक घण्टे के प्रातः भ्रमण में पाया कि वाकई यह गाँव स्वर्ग से सुन्दर है। कुछ देसी, विदेसी जोड़े भी ट्रैकिंग सूट में, हाथों में फोल्डिंग छड़ी लिए चलते दिखाई दिए। पूछने पर उन्होने एक चोटी की ओर ऊँगली से इशारा किया, हम वहाँsss जा रहे हैं। उन्हें देख लगा, ये लोग जीना जानते हैं।


एक दो घण्टे की मॉर्निंग वॉक, फोटोग्राफी के बाद कमरे में लौटने से पहले हमने होटल के सामने लकड़ी से बने सैकड़ों वर्ष पहले बने पुराने घर में ताजे सेव खरीदने के लिए प्रवेश किया तो सुबह के 8 बज रहे थे। होटल के एक लोकल छोरे से पता चला था कि यहाँ ताजे सेव मिलते हैं। घर में 65 वर्षीय महिला, जो 50 से अधिक नहीं दिख रही थीं, अपनी युवा पुत्री के साथ सिलाई मशीन पर भेड़ के ऊन के धागे निकाल रही थीं। हमने और हमारे मित्रों ने यहाँ से खूब सेव खरीदे। यहाँ के हरे सेव इतने रसीले और मीठे थे कि बिना छिलका छीले, दांतों काटते चले जाओ, जितना भी खाओ मन नहीं भरता। महिला, जिन्होंने अपना नाम गुड्डी बताया  ने अपना एक लम्बा साक्षात्कार दिया। उन्होने ग्रामीण जीवन के बारे में, 4 बच्चों के साथ अपने जीवन के लम्बे संघर्ष के बारे में, सेव की बागवानी और भेड़ के खाल से ऊन के धागे निकालने, मफलर, दस्ताने, टोपी, स्वेटर बनाने के बारे में खूब विस्तार से बताया। मैने उनका लम्बा साक्षात्कार रिकार्ड किया था लेकिन हाय! अच्छी आवाज के लिए जो माइक हमने लगाया था, वही फेल हो गया। वीडियो तो है लेकिन उसमे आवाज नहीं है। माइक कभी फेल नहीं हुआ था, कल शायद बैटरी खतम हो गई थी, एक दुर्लभ साक्षात्कार बिना आवाज के बरबाद हो गया। हमने लौटने से पहले ढोने की क्षमता भर सेव के अलावा दस्ताने और टोपी भी खरीदे। 


नाश्ता करके श्रीनगर की अगली यात्रा के लिए गाड़ी में बैठे तो सुबह के 10 बज चुके थे। इस गाँव को छोड़ने का मन तो नहीं कर रहा था लेकिन अपने चार धाम की यात्रा की योजना के अनुसार आज 250km की लम्बी पहाड़ी यात्रा के बाद हमे श्रीनगर पहुँचना था।  जम्मू में ही नहीं उत्तराखंड में भी श्रीनगर है। यहाँ पहुँचते-पहुँचते शाम के 9 बज चुके थे। हर्षिल की ठण्डी वादियों की तुलना में यहाँ का मौसम एकदम विपरीत था। यहाँ ठण्ड तो बिलकुल नहीं थी। ए.सी. नहीं लेकिन पंखा चलाने की आवश्यकता यहाँ महसूस हो रही थी। हमने हर शहर में GMVN के गेस्ट हॉउस पहले से बुक कर रखे थे। कमरे में सामान रखकर खाने और सोने के अलावा शरीर में कोई शक्ति नहीं बची थी। अगला धाम जय बाबा केदारनाथ था...