इस मौसम में माधुरी दीक्षित की याद आ रही है और
याद आ रहा है उनका गाया सुपर हिट गीत—दिल धक-धक करने लगा...।
मैने घर-बाहर टटोला तो पाया
कि मेरा ही नहीं, सभी का दिल धक-धका रहा है। जो दफ्तर में हैं उनका भी, जो
बेरोज़गार सड़क पर घूम रहे हैं उनका भी। जो पढ़ रहे हैं उनका भी, जो पढ़ा रहे हैं
उनका भी। गुरूजी समझा रहे हैं-‘मन लगाकर पढ़ों बच्चों परीक्षा की घड़ी निकट है!’ मगर आग दोनो तरफ
बराबर भड़की हुई है। गुरूजी का ध्यान अपनी अधिक आयकर कटौती पर है तो विद्यार्थियों
का अपने वेलेनटाइन पर।
घर से दूर पढ़ने वाले बच्चे, काम करने वाले लोग
सभी परेशान हैं। दो दिन की छुट्टी में घर जाऊँ या नहीं? घर में त्योहार मनाने के एवज में होने
वाले खर्च का हिसाब-किताब लगा रहे हैं। मौज की कीमत आंकी जा रही है। त्योहारों की
सनसनाहट के बीच चुनाव के बादल भी गरज़ रहे हैं। बड़ा दिल धड़काऊ, मन भड़काऊ, पंख फड़फड़ाऊ मौमस आया है!
दो पड़ोसन आपस में बतिया रही थीं....
पहली ने कहा- “सुनिये न...आपके ससुर जी तो हमेशा कहा
करते थे मेरा दिल धड़क रहा है मगर कल मैने सुना आपके श्रीमान जी भी? लगता है आपके घर
होली अभिये आ गई!”
दूसरी ने हाथ नचाते हुए उत्तर
दिया-“क्यों? श्रीमान जी का सुन
लिया! टिंकू
का नहीं सुना ? वह भी तो आज स्कूल से आते ही बस्ता पटक कर
बड़बड़ा रहा था-‘मेरा दिल धड़क रहा है!’
पहली आँखें फाड़कर उछली- अच्छा! टिंकू
भी..वेलेनटाइन...!!!”
तुम्हारा सर। पिताजी दिल के मरीज हैं। इनके दफ्तर
में काम का बोझ है। टिंकू परीक्षा से घबड़ा रहा है। होली मेरे घर में नहीं तुम्हारे
कपार चढ़कर नाच रही है।“
दोनो के झगड़े को सुनकर अपना दिल तो और भी धक-धक
करने लगा। :)
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