10.8.12

जन्माष्टमी


कल श्री कृष्ण जन्माष्टमी है। आनंद श्रीकांत के उत्साह से उत्साहित है। वह पुराने लोहे के बक्से से अपने खिलौने निकाल रहा है। चीनी मिट्टी के बने खिलौने, कच्ची मिट्टी के बने खिलौने, प्लॉस्टिक के खिलौने, छोटी-छोटी कारें, ट्रैफिक पुलिस और भी बहुत से खिलौने! उसने जब भगवान शंकर की मूर्ति निकाली तो आनंद खुशी से चीख पड़ा

इन जटाओं से फुहारा निकलता है नJ

हां, लेकिन मुझे नहीं आता।L

मेरे भैया तो निकाल देते हैं! तुमने देखा नहीं था मेरे घर में पिछले साल? भैया कह रहे थे शिव जी की जटा से गंगा जी निकल रही हैं!

देखा था लेकिन मुझे नहीं आता। L तुम्हें आता है? वे पहाड़ कैसे बनाते हैं ! जिसे कैलाश पर्वत की शक्ल देकर शिव जी को  रखते हैं?

झाँवाँ लाते हैं।

यह कहाँ मिलता है?

मैं जानता हूँ । वे राजघाट रेलवे स्टेशन से बोरे में भरकर लाते हैं। अरे, जो पत्थर का कोयला या ईंट जल जाती है उसी को तो झाँवाँ कहते कहते हैं। जहाँ ईँट का भट्टा हो वहाँ भी मिलता है ।

तुम्हारे पास तो बड़े भइया हैं, मैं तो अकेला हूँ। मेरे भी भैया होते तो तुम्हारे घर से अच्छी जन्माष्टमी सजाता। देखो! मेरे पास कितने सुंदर खिलौने हैंL

अकेले क्यों हो? ताई नहीं हैं? और मैं भी तो हूँ ! J चलो इस बार हम तुम दोनो मिलकर जन्माष्टमी सजायेंगे।

तुम अपने घर नहीं सजाओगे?

अपने घर ? उंह! भैया मुझे सजाने ही नहीं देते। L वे और उनके गंदे वाले दोस्त! मुझे तो सिर्फ ये लाओ, वो लाओ, काम ही बताते रहते हैं। सड़क बनाना हो तो गंगाजी से बालू मैं लेकर आऊं, बगीचा बनाने के लिए रंगीन बुरादे चलनी से छान-छान कर मैं साफ करूँ, जब सजाने की बारी आये तो मुझे डांटकर भगा देते हैं। L कहते हैं, तुम खराब कर दोगे।L   

यह बात है! तब तो बड़ा मजा आयेगा हम तुम दोनो मिलकर इस बार जन्माष्टमी मनाते हैं।

हाँ, हाँ, ठीक है। लेकिन यह तो सोचो कहाँ सजायेंगे?

नीचे, राम मंदिर में इतनी अच्छी जगह तो है ही।

हाँ, हाँ ठीक रहेगा। वह जगह तो हमेशा साफ-सुथरी रहती है।

ताई को बता दें (खुशी से दौड़कर बड़ी बहन को बुलाते हुए) ताई-ताई, इस बार आनंद भी हमारे साथ खिलौने सजायेगा।J

(श्री कांत से 5 वर्ष बड़ी दीदी भी इस खबर को सुनकर प्रसन्न हो गई।)

ठीक है लेकिन तुम लोग आपस में झगड़ना मत। आनंद के भैया उसे बुलाकर ले गये तो ?

उन्हें बतायेंगे ही नहीं। वो आयेंगे तो कह देना आनंद यहाँ नहीं है।

ठीक है, यह सही रहेगा।

चलो हम लोग रेलवे स्टेशन से झाँवाँ बीन कर लाते हैं।

सुनते ही दीदी डर गईं। उतनी दूर जाओगे! आई को पता चल गया तो बहुत मारेंगी ।

पता चलेगा तब न? और जब पहाड़ सजेगा, शंकर भगवान की मूर्ति से गंगा जी निकलेंगी तब देखकर कितनी खुश होंगी !

हाँ, हाँ, खूब मजा आयेगा।J

ताई! तुम बिलकुल चिंता मत करो। हम लोग एक घंटे में आते हैं। तब तक तुम सभी खिलौनों की साफ-सफाई कर दो और एक लिस्ट बना कर रखना कि क्या-क्या लाना है।

ठीक है।

ताई की सहमति से खुश श्रीकांत और आनंद दोनो एक बड़ा सा बोरा लेकर निकल पड़े झाँवे की तलाश में। रास्ते में आनंद ने अपने घर से भैया की साइकिल भी पार कर दी। कभी आनंद साइकिल चलाता कभी श्रीकांत। रेलवे स्टेशन दोनो के घर से कम से कम चार-पांच किलोमीटर की दूरी पर था। दोनो मित्र प्लेटफॉर्म से आगे जहाँ पटरियाँ शुरू होती हैं, एक-एक कर रेलवे इंजन से गिरने वाले जले हुए पत्थर के कोयले को खूब ठोंक बजाकर देखते और अपने झोले में ऐसे सहेजते मानो कोई जौहरी हीरे के टुकड़े सहेज़ रहा हो। समय का खयाल न रहा। होश तब आया जब झोला झाँवे से भारी हो चुका था।

चलो, इतना बहुत है। इससे अधिक हम ले भी नहीं जा सकते।L

हाँ, हाँ चलो। शाम होने को आई और हम अभी पहाड़ ही बटोर रहे हैं।J

जैसे तैसे साइकिल के कैरियर में बोरी लाद-फाँद कर दोनो घर पहुँचे तो थककर चूर हो चुके थे। पहुँचते ही ताई ने झिड़की लगाई...

आनंद! तुम्हारे भैया दो बार आकर पूछ चुके हैं। बड़ी देर लगा दी तुम दोनो ने?

उन्हें ढूँढने दो। देर तो हो ही गई लेकिन हमें अभी बहुत से काम करने हैं।

खिलौने तो मैने सभी सफा कर दिये लेकिन बहुत कम हैं। आई कह रही थीं अशोक के पत्ते भी लाने हैं। कंदब या कंरौदे की टहनियाँ, केले के छोटे-छोटे खंभे और फूल-मालाएं भी लानी हैं बाजार से। ये बीस रूपये दिये हैं आई ने। मैं तुम दोनो को अपने पास से भी बीस रूपये देती हूँ। कुछ खिलौने लेते आना। ट्रैफिक पुलिस की मुंडी टूटी हुई है। घोड़े वाला ट्रैफिक पुलिस, इक्के और कुछ प्लॉस्टिक की कुर्सियाँ भी लेते आना। मेरी सुंदर गुड़िया कहाँ बैठेगी?

ये सब तो कल सुबह ले आयेंगे। पहले आज झाँवे से एक कोने में पहाड़ बना दें और उस पर भोले बाबा को रखकर रामू काका को पकड़ लायें। वे किसी बिजली मिस्त्री से कहकर मूर्ति से फुहारे निकालने का इंतजाम कर देंगे। झालर भी सजा देंगे।

श्रीकांत चहका..हाँ यह ठीक रहेगा। चलो...

तीनो ने मिलकर देखते ही देखते सुंदर पहाड़ सजा दिये। कहीँ-कहीँ गुफाएं भी बना दीं जिसमें मिट्टी के शेर भी बिठा दिये। रामू काका ने फुहारे निकलने और पानी गिरने के लिए छोटा सा तालाब भी बना दिया। ताई ने रंगोली सजा दी। तब तक अंधेरा हो चुका था। आनंद ने कहा...

अब रात हो चुकी है। पिताजी के आने का समय हो चुका है। कल सुबह-सुबह गंगा जी से बालू ले आयेंगे सड़क बनाने के लिए। बगीचे के लिए बुरादे भी लाने हैं। मैं चलता हूँ।

श्रीकांत चहका..सुबह बहुत से काम करने हैं। जल्दी आ जाना।

आनंद जब घर अपने घर पहुँचा तो उसके भैया और उनके दोस्त वही सब कर रहे थे जो उसने श्रीकांत के घर किया था। उन्होंने सुंदर एक्वेरियम भी सजाई थी जिसमें रंगीन मछलियाँ तैर रही थीं। आनंद को देखते ही भैया का पारा सातवें आसमान पर जा पहुँचा...

अभी आ रहे हो? कहाँ थे दिनभर? कल तुम्हें यहाँ झांकने भी नहीं दुंगा। यहाँ इतना सारा काम बिखरा पड़ा है और ये जनाब किसी शतरंज की अड़ी में बैठे शतरंज खेल रहे होंगे। रामनाथ हार गइलन,घोड़ा भागल टी री री री...

आनंद ने कोई जवाब नहीं दिया। दौड़कर ऊपर भाग गया और मन ही मन हंसता रहा। तब तक पिताजी आ गये। पिताजी के सामने आनंद को पीटने की हिम्मत किसी भाइयों की नहीं थी। सबसे छोटा होने के कारण उसे बड़े भाइयों की पिटाई और बाबूजी का प्यार दोनो भरपूर मिलता था। खाना खा कर जब वह बिस्तर में गया तो नींद उससे कोसों दूर थी। नींद आई तो कान्हाँ के सपने उसे दूसरी ही रंगीन दुनियाँ में ले गये। जहाँ गोपाल जी थे और थी बड़ों के मुंह सुनी उनकी अनगिन शरारतें...

सुबह जब पलकें खुलीं तो नीचे गली में श्रीकांत को चीखते हुए पाया। आनंद को बरामदे में देखते ही श्रीकांत चीखा...

अभी सोकर उठे हो !

तुम चलो मैं अभी नहा धो कर आता हूँ….

ठीक है। जल्दी आना......


बनारस की गलियों में घर-घर जन्माष्टमी सजाई जाती थी। ये वो दिन थे जब बड़ों का उत्साह और छोटों की दीवानगी देखते ही बनती थी। ऐसा लगता था जैसे समय कहीं ठहर सा गया है। किसी को कोई दूसरा काम है ही नहीं। सभी को बस एक ही फिक्र है...जन्माष्टमी कैसे सजाई जाय! बच्चे अभी भी सजाते हैं लेकिव पहले वाली फुरसत अब किसी के पास नहीं।

दोनो बाल-मित्र गंगा जी से बालू ले आये। चौखंभा स्थित विशाल गोपाल मंदिर के द्वार के आस पास लगने वाली दुकाऩों से माला-फूल, गोपाल जी के सुंदर वस्त्र, मोतियों की माला, केले के छोटे-छोटे खंभे, अशोक के पत्ते और ठठेरी बाजार से थोड़े बहुत खिलौने खरीद लिये जो वे खरीद सकते थे। उस दिन एक और घटना घटी। अनायास आनंद कि निगाह भीड़-भाड़ वाली गली में जमीन पर गिरे रूपयों पर पड़ी। उसने लपक कर उसे उठा लिया और आगे ले जाकर श्रींकात के सामने मुठ्ठी खोल दी...

इतने रूपये कहाँ से मिले?

गली में गिरे थे

कित्ते हैं?

गिनकर देखते हैं। पूरे 85 रूपये हैं। इतने रूपयों में बहुत से खिलौने आ जायेंगे।J

हाँ, लेकिन आई को पता चल गया तो?

आई को कैसे पता चलेगा?

ताई बता देगी!

ताई को कैसे पता चलेगा?

पागल हो! वो खिलौने देखते ही समझ जायेंगी कि इत्ते ढेर सारे खिलौने बीस रूपये में नहीं मिल सकते..

कह देना कि आनंद अपने पिताजी से मांगकर लाया था।

हाँ, यह ठीक रहेगा। लेकिन यह झूठ तुम्ही बोलना!

हाँ, हाँ, बोल देंगे! कोई चोरी थोड़े न की है। समझ लेंगे भगवान ने हमारे लिए भेजे हैं।J

दोनो खिलौने की दुकान के सामने खड़े हो गये। श्रीकांत खिलौने मोलाने लगा। आनंद कभी ललचाई निगाहों से खिलौनो को देखता, कभी कंपकपाई उंगलियों से मुठ्ठी ढीली करता-बंद करता। अचानक से बोल पड़ा...

श्रीकांत! गोपाल जी ने पूछा तो ?

गोपाल जी ने?

हां, हां, गोपाल जी ने...गोपाल जी ने पूछा कि तुमने दूसरे के पैसों से जन्माष्टमी क्यों मनाई तो ? तुमने आई से झूठ क्यों बोला तो...?

तुम ठीक कह रहे हो लेकिन आखिर हम इन पैसों का करें क्या? जहाँ से उठाया वहीं फिर से गिरा दें !

नहींsss चलो. वहीं चलते हैं...शायद कोई आदमी अपने गिरे पैसे ढूँढता हुआ वहाँ आये तो उसे दे देंगे।

चलो!

दोनो बड़ी देर तक ऐसे व्यक्ति की प्रतीक्षा करते रहे जो पैसे ढूँढता दिख जाये लेकिन उन्हें कोई ना मिला।L

अब क्या करें?

ये पैसे तो अब हम घर नहीं ले जा सकते। ऐसा करते हैं इसे इसी दुकानदार को दे देते हैं। कह देंगे कि कोई आदमी अपने पैसे ढूँढता हुआ यहाँ आये तो उसे दे देना। हमें यहीं गिरे मिले थे।

ठीक है। यही ठीक रहेगा।

लेकिन इस दुकानदार ने उसे नहीं दिये और खुद ही रख लिये तो ?


तो गोपाल जी उससे पूछें, हमसे तो बड़े पूछने चले आये थे ! हम सबका ठेका लिये हैं क्या ? :) 

दोनो ने पैसे दुकानदार को थमाये। अपनी झोली उठाई और घर की ओर जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाने लगे। जन्माष्टमी की सुंदर झाँकी उनके नयनों में सजी थी जहाँ गोपाल जी की मुस्की देखते ही बनती थी...  J
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'आनंद की यादें' से।

9.8.12

हे कृष्ण !



जन्माष्टमी
में तुम्हारी
याद आती है।

छाछ-मक्खन
दही-मलाई
याद आती है
साथ खेले
साथियों की
याद आती है
बांसुरी की धुन अभी
फिर सुनी मैने
गोधूलि छटा
गोपियों की  
याद आती है

कृष्ण तेरी रासलीला
याद करता हूँ
तो मुझे
अपनी भी कुछ-कुछ
याद आती है। J

कुरूक्षेत्र में
उपदेश तेरे  
भूल जाता हूँ
धर्म क्या
अधर्म क्या
भूल जाता हूँ
निर्बल दिखा तो
जोर से
शंख फूंका है
वैरी भयानक
देख अक्सर
भाग जाता हूँ

बस अकेले 
में ही गीता
याद आती है।L

होने लगा बूढ़ा तो  
होश अब आया
बचपन से मनाता
आ रहा
जन्माष्टमी तेरी
तू कभी
बुढ्ढा 
हुआ ही नहीं
नटवर !

तेरी ठगी
अपनी मुँड़ाई
याद आती है।

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5.8.12

चलिए गंगा जी चलें....

पिछली पोस्ट एक शाम गंगा के नाम में आपने देखा था कि गंगा जी बढ़ रही हैं। मैने लिखा था कि अब एक घाट से दूसरे घाट की ओर जाना संभव नहीं। अब शायद मैं आपको गंगा की तश्वीरें न दिखा पाऊँ। मन नहीं माना तो आज शाम फिर जा पहुँचा गंगा जी। चाहे जब जाइये, चाहे जितनी बार जाइये यहाँ के घाट आपको हमेशा ताज़गी से भर देते हैं। हर बार लगता है कि आपने कुछ नया देखा, कुछ नया समझा, कुछ नई ताजगी का अहसास किया।  गंगा में बाढ़ आई हो या दुनियाँ भर की गंदगी समाई हो यहाँ के रहने वाले गंगा जी नहाना नहीं छोड़ते। गंगा जी बढ़ चुकी हैं। घाट किनारे से यहाँ आना संभव नहीं था। मैं तुलसी घाट के ऊपर खड़ा हूँ। शाम के छः बज  चुके हैं। यहीं से दिखाता हूँ आपको गंगा जी की तस्वीरें....


(1) कुछ किनारे ही नहा रहे हैं, कुछ तैर रहे हैं। दूर एक किशोर गंगा में छलांग लगा रहा है।


(2) दूसरे घाट में जाने के लिए कूद-फांद करता हुआ लड़का।  


(3)शाम के समय बादलों के संग गंगा के बदलते रंग


(4)पर्यटकों का नाव में घूमना कम हुआ है लेकिन अभी बंद नहीं हुआ है।


(5) घाटों पर हलचल बंद है । गंगा में नाव भी कम है लेकिन गगन में परिंदे खूब उड़ रहे हैं। 


(6)मैं जैन घाट के ऊपर खड़ा हूँ। यहाँ मंदिर की दीवारों में जम गया है एक पीपल।


(7) अंधेरा छा रहा है। मंदिर के शिखर ऐसे दिख रहे हैं।


(8) सीढ़ियाँ उतर कर घाट तक गया। यहाँ से गंगा के घाट ऐसे दिख रहे हैं। दूर बत्तियाँ जलनी शुरू हो चुकी है।

नोटः सभी तस्वीरें आज शाम की हैं।

3.8.12

वृक्ष और परिंदे




परिंदे
बैठ जाते हैं
वृक्ष की सबसे ऊँची फुनगी पर
जब पड़ती है
फुहार
छुप जाते हैं भाग कर
घने पत्तियों की आड़ में
जब होती है
तेज़ बारिश ।              

कम होते ही
बारिश की धार
फिर से बैठ जाते हैं
सबसे ऊपर
छुप जाते हैं फिर से
तेज़ धूप में।

आतप में
जब आकुल-व्याकुल रहता है वृक्ष भी
छुपकर
ढूँढते हैं पानी
ढूँढते हैं दाना

सर्दियों की रात में
जब ठंड से ठिठुरता रहता है वृक्ष भी
दुबक जाते हैं
गर्म घोंसले में।

वृक्ष
हर मौसम में
एक समान रहता है
परिंदे
कसते है तंज-
तुम जरा भी नहीं सीख पाये
कैसे लेते हैं आनंद ?
खड़े रहते हो हमेशा
एक ही जगह
हमे देखो,
हम लूटते हैं
हर मौसम का मजा
तुम भोगते हो
हर मौसम में सजा!”

वृक्ष
हंसता है-
तुम्हारी खुशी ही
मेरी खुशी है।

आँधियों में
जब उखड़ने लगते हैं वृक्ष के पांव
उड़ कर
बिखर जाता है घोंसला
गिर कर
टूट जाते हैं अंडे
रोता है
वृक्ष भी
परिंदों के साथ

बहुत तड़पता है
जब कोसते हैं परिंदे-
पापी !
नहीं संभाला गया तुमसे
हमारा घोंसला भी ?”

शायद
यहीं से होती है
वृक्षों में
दीमक लगने की शुरूआत
धीरे-धीरे
खोखला/बूढ़ा हो जाता है
घना वृक्ष
छोड़ देती हैं साथ
पत्तियाँ भी

यदा-कदा
हाँफते-डाँफते
दो पल ठिठक कर
चोंच लड़ाते
पंख फैलाते
फुर्र से उड़ जाते हैं
परिंदे।
............................

2.8.12

रक्षाबन्धन


हार्दिक शुभकामनाएं

मुंशी प्रेमचंद जयंती

पिछली पोस्ट "आइये मुंशी प्रेमचंद जी के गांव लमही चलें" में आपने उनके घर, गांव और गांव में साहित्य महोत्सव का अवलोकन किया। आज भी सांस्कृतिक संकुल में दिनभर विविध आयोजन होते रहे। कार्यालय की व्यस्तता के चलते मुझे शरीक होने का अवसर नहीं मिला लेकिन शाम 5 बजे के बाद जब अपना वक्त शुरू हुआ तो मुझे कौन रोकने वाला था! जा पहुँचा सांस्कृतिक संकुल और देखने लगा महोत्सव के नाम पर वहाँ  हो क्या हो रहा है?  विशाल सांस्कृतिक संकुल के हॉल में दर्शकों की अल्प उपस्थिति घोर निराशाजनक रही। 

संकुल में घुसते ही प्रेमचंद जी के पुस्तकों की प्रदर्शनी देखने को मिली। संकुल की दीवारें उनके उपन्यास के पात्रों को जीवंत करते अद्भुत तैल चित्रों व धनपत राय ( मुंशी प्रेमचंद ) के हस्तलिखित दुर्लभ पत्रों से सजी हुई थीं। मंच पर पूरे दिन मुंशी प्रेमचंद जी की कृतियों पर चर्चा, नाटक का मंचन चलता रहा। मैं जब पहुँचा तो उस वक्त कामायनी वाराणसी की नाट्य प्रस्तुति 'शतरंज के खिलाड़ी' का मंचन प्रारंभ ही हुआ था।

'शतरंज के खिलाड़ी' की कहानी नवाब वाजिद अली शाह के समय की है। यह वह दौर था जब लखनऊ अपनी विलासिता में आकंठ डूबा हुआ था। छोटे-बड़े, अमीर-गरीब सभी विलासिता में डूबे हुए थे। कोई नाच-गाने की मजलिस सजाता, तो कोई अफ़ीम के मज़े लेता। जीवन के प्रत्येक विभाग में आमोद-प्रमोद की प्रधानता थी। कहीं बटेर लड़ते, तीतरों का लड़ाई के लिेए पाली बदी जाती, कहीं चौसर बिछती और कहीं पौ बारह का शोर मचता। कहीं शतरंज का घोर संग्राम छिड़ा रहता। मिर्ज़ा सज्जाद अली और मीर रौशन अली, दीन दुनियाँ से बेखबर   इसी शतरंज में अपनी बुद्धि लड़ाते रहते।


दासी बार-बार आती और लौट जाती कि बेगम बुला रही हैं। मीर रौशन अली को कोई फर्क नहीं पड़ता। जब बेगम का पारा हाई हो गया तो वे दौड़कर अपनी बेगम को मनाने चले गये....

.
बेगम नाराज हुईं तो मियाँ अपने दोस्त की हवेली में चले गये। वहाँ दोनो अलमस्त हो शतरंज खेलते रहे। मिर्जा की बेगम भी संगीत की शौकीन थी। उन्होंने चाल चली । एक मुहर देकर नौकर को अपने रिश्तेदार जो कि नबाव वाजिद अली शाह की सेना में सैनिक था को दोनो खिलाड़ियों को धमकाने के लिए भेजा तो दोनो खिलाड़ी खंडहर में जाकर शतरंज खेलने लगे....

अंग्रेजों की फौज ने आक्रमण कर दिया। नवाब वाजिद अली शाह बंदी बना लिये गये लेकिन इन दो खिलाड़ियों को कोई फर्क नहीं पड़ा। वे रूक-रूक कर अफसोस करते फिर अपनी नई बिसात बिछा देते। मजे की बात यह रही कि दोनो शतरंज के खिलाड़ी हर संकट से तो कन्नी काट कर बचते  रहे लेकिन काठ के मोहरों के लिए आपस में झगड़ पड़े। दोनो ने अपनी-अपनी तैग म्यान से खींच ली......


दोनो जमकर लड़े और शतरंज के मोहरों के लिए शहीद हो गये....


नाटक के कलाकारों का अभिनय खूब शानदार रहा। मंच पर कई नाटक खेले जा रहे थे सो उसकी साज-सज्जा में दूसरे नाटकों के दृश्यों का भी घालमेल अखर रहा था। आयोजकों के समक्ष इस कमी को स्वीकार करने के सिवा कोई चारा  न था। इस नाटक के बाद रंगभूमि के मंचन की घोषणा की जा रही थी। समयाभाव के कारण वहाँ नहीं रूक सका। सांस्कृतिक संकुल में आयोजकों ने महोत्सव मनाने की खूब तैयारी कर रखी थी। दर्शकों की कम उपस्थिति निराशाजनक लगी। जन-जन के लेखक की वार्षिक जयंती के अवसर पर आम जन की  उदासीनता चिंतनीय है।

क्रमशः