3.8.12

वृक्ष और परिंदे




परिंदे
बैठ जाते हैं
वृक्ष की सबसे ऊँची फुनगी पर
जब पड़ती है
फुहार
छुप जाते हैं भाग कर
घने पत्तियों की आड़ में
जब होती है
तेज़ बारिश ।              

कम होते ही
बारिश की धार
फिर से बैठ जाते हैं
सबसे ऊपर
छुप जाते हैं फिर से
तेज़ धूप में।

आतप में
जब आकुल-व्याकुल रहता है वृक्ष भी
छुपकर
ढूँढते हैं पानी
ढूँढते हैं दाना

सर्दियों की रात में
जब ठंड से ठिठुरता रहता है वृक्ष भी
दुबक जाते हैं
गर्म घोंसले में।

वृक्ष
हर मौसम में
एक समान रहता है
परिंदे
कसते है तंज-
तुम जरा भी नहीं सीख पाये
कैसे लेते हैं आनंद ?
खड़े रहते हो हमेशा
एक ही जगह
हमे देखो,
हम लूटते हैं
हर मौसम का मजा
तुम भोगते हो
हर मौसम में सजा!”

वृक्ष
हंसता है-
तुम्हारी खुशी ही
मेरी खुशी है।

आँधियों में
जब उखड़ने लगते हैं वृक्ष के पांव
उड़ कर
बिखर जाता है घोंसला
गिर कर
टूट जाते हैं अंडे
रोता है
वृक्ष भी
परिंदों के साथ

बहुत तड़पता है
जब कोसते हैं परिंदे-
पापी !
नहीं संभाला गया तुमसे
हमारा घोंसला भी ?”

शायद
यहीं से होती है
वृक्षों में
दीमक लगने की शुरूआत
धीरे-धीरे
खोखला/बूढ़ा हो जाता है
घना वृक्ष
छोड़ देती हैं साथ
पत्तियाँ भी

यदा-कदा
हाँफते-डाँफते
दो पल ठिठक कर
चोंच लड़ाते
पंख फैलाते
फुर्र से उड़ जाते हैं
परिंदे।
............................

37 comments:

  1. वाह....
    सुन्दर...बहुत सुन्दर रचना......
    मन को छू गयी...और निहित भाव झकझोर भी गया....

    अनु

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  2. हम्म! नीव के ज़ख्म नहीं दिखाई देते।

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  3. बहुत अच्छा रूपक उठाया है आपने आखिर तक किया है उसका निर्वाह ,न सिर्फ वृक्ष का मानवीकरण किया है उसे मातु पिता का दर्जा दे दिया है आप जिसे उसके आतप /आपद काल में .ज़रायु में छोड़कर फुर्र उड़ जातें हैं परिंदे .बहुत बढ़िया भाव प्रधान रचना और उतने ही सुन्दर बिम्ब आपने उकेरें हैं .

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    1. शानदार कमेंट के लिए धन्यवाद सर जी।

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  4. वृक्ष और परिंदों जैसा ही तो होता है मनुष्य का भी जीवन .... जब बूढ़ा वृक्ष ढहने लगता है तो तो युवा परीने कहाँ परवाह करते हैं ? बहुत गहन भाव लिए सुंदर रचना

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  5. गहन जीवन-दर्शन को व्यक्त करती रचना !

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  6. आज तो वीरू भाई ने महफ़िल लूट ली !

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    1. सही कह रहे हैं आप..मैने कल ही मेल से धन्यवाद दे दिया था।:)

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    2. वीरू भाई ने अली साब के लिए क्या वास्तव में कुछ नहीं छोड़ा ?

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    3. अरे नहीं..अली सा चाहें तो इस विषय पर पूरा ग्रंथ लिख सकते हैं मगर कन्नी काट कर निकल लिये।:) वैसे भी उन्होने लिखा 'महफ़िल लूट ली' यह कहाँ लिखा कि 'कुछ नहीं छोडा।'.. :)

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    4. संतोष जी के असंतोष से असहमत :)

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  7. बहुत ही अच्छी कविता भाई साहब बधाई |

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  8. हर हाल में सहना वृक्ष को ही है !
    परिंदों को पनाह और फिर उजाड़ने का साक्षी बनना , वृक्ष होने की त्रासदी को जबान मिल गयी !

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  9. आह -यही तो है आख़िरी नियति :-(

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  10. आखिर में उजड़ना ही नियति है,परिंदे हों या पेड़ हो :-(

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  11. वृक्ष और परिंदों के माध्यम से ज़िन्दगी की सच्चाइयाँ उधेड दीं ………मन को झकझोरने वाली बेहतरीन प्रस्तुति।

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  12. पेड़ खड़ा रहता है गहरी छाँव लिए अंत आने तक ... और उड़ जाते हैं परिंदे ...
    सच को आइना दिखाया है ...

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  13. कमाल की रचना

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  14. वृक्ष सदा ही सहारा देता है..पक्षी घूमकर फिर वहीं आते हैं..बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति..

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  15. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (05-08-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  16. देवेन्‍द्र जी अच्‍छी रचना है

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  17. Paridon ne to hamesha udhee jana hota hai!

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  18. ये भी कालचक्र का ही हिस्सा है शायद, सबके दिन बदलते हैं। सुन्दर कविता।

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  19. प्रकृति के माध्यम से सुंदर जीवन दर्शन.

    भावमयी प्रस्तुति के लिये बधाई.

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  20. “तुम्हारी खुशी ही मेरी खुशी है”
    अगर वृक्ष कुछ बोल पाते तो यही वाक्य दुहराते....
    बहुत सुंदर रचना....
    सादर/

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  21. जीवन की सच्चाई लिए सुंदर भावाभिव्यक्ति !
    सादर !

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  22. बहुत सुन्दर ,कमाल किया है आपने.जब पिता बूढा हो जाता है ,तो लडके-लडकियां पिता के घर आते हैं,और २-४ दिन गफ मारकर चले जाते हैं- ....चोंच लड़ाते,पूंछ उठाते फुर्र से उड़ जाते हैं.

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  23. और परिँदो को जन्म होते, बड़ा होते और मरते हुए देखने का गम भी तो होगा वृक्ष को.

    बहुत सुन्दर कल्पना.

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  24. बहुत दिनों बाद कोई पोस्ट पढ़ने को मिली है आपके ब्लॉग पर पर बहुत ही शानदार और बेहतरीन इंतज़ार का फल मीठा लगा :-)

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  25. आने वाली त्रासदी से कोई तो डरे ..

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