बोगी में अपने आस पास कोई नहीं। साथी संजय जी हैं मगर वे लेट कर मोबाइल में कोई फिलिम देख रहे हैं। आगे पीछे से कुछ आवाजें आ रही हैं। भोजपुरी में कोई बतिया रहा है.. नाही त अइसन बा बहिनी न! गड़िया लेट बा। हमे देर होई पूजा उजा कर के बइठा। हलो हालो.. कट गए फोनिया।
ट्रेन आराम आराम से चल रही है। जौनपुर के बाद अगला स्टेशन बनारस ही है मगर बार बार रुक कर चल रही है। इस रूट में लेट होने की वजह से शाम के समय सुल्तानपुर और फैजाबाद दोनों मार्ग से आने वाली कई ट्रेनें आगे पीछे चलती हैं। दून, जम्मूतवी, मरुधर सभी इसी समय पीछे पीछे चल रही हैं।
दो दिन की छुट्टी के बाद आज दफ्तर खुला भी तो मकर संक्रांति के दिन। कौन खिचड़ी! कैसी खिचड़ी! सब मज़ा छुट्टी में ही ले लिए। छुट्टी न हो तो कोई त्योहार पण्डित जी के हिसाब से नहीं मनता। अब तो लोग बड्डे पार्टी या वैवाहिक साल गिरह भी छुट्टी के दिन ट्रांसफर कर मना लेते हैं। कल मौनी अमावस्या है, मौन हो कर नहा लेंगे।
लोअर बर्थ पर लेटे आम आदमी ने पूरा शाल ओढ़ लिया है। सर ढक लिया है लेकिन शाल के बाहर कपड़े के जूते मोजे झांक रहे हैैं। जूता नहीं उतारा है। अनुभवी लगता है। जूता उतार लेता तो इत्ते चैन से नहीं सो पाता। अब ठीक है। जूते की भी चिंता नहीं और शाल के छोटे होने की वजह से पूरे पैर न ढक पाने का मलाल भी नहीं। जितनी चादर हो उतना ही पैर पसारना चाहिए वाले मुहावरे में एक लाइन जोड़ देनी चाहिए। चादर छोटी हो तो सर ढक कर, जूता पहन कर सोना चाहिए। आम आदमी चैन से जीने के लिए कितना जुगत लगाता है!
.............................................................
दौड़ते भागते दून पकड़ी, हांफते हांफते सुन रहा था...
आजा तुझको पुकारे मेरा प्यार।
यह गीत ट्रेन नहीं गा रही थी, कोई मोबाइल में बजा रहा था। रात के सन्नाटे में बांसुरी पर जब यह गीत सुनाई पड़ता है तो अच्छे अच्छे पाषाण हृदय व्यक्ति की नींद भी उचट जाती है। नील कमल, मो. रफी साहब के बाद मुकेश का गाया दूसरा गीत बजने लगा...
मालिक ने बनाया इंशा को इंसान मोहब्बत कर बैठा
वो ऊपर बैठा क्या जाने, इंसानों पर क्या गुजरी है!
गाना सुनते सुनते जफराबाद आ गया और जफराबाद से चढ़े शिवकुमार भाई। शिव कुमार भाई के हाथों में गरमा गरम पकौड़े का थैला! पकौड़े खाते खाते सुन रहे सभी...
हजारों मील लंबे रास्ते तुझको बुलाते
यहां दुखड़े सहने के वास्ते तुझको बुलाते
तेरा मेला पीछे छूटा राही, चल अकेला
चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला।
........
बिछौना धरती को कर के अरे आकाश ओढ़ ले
.....
तेरा मेला पीछे छूटा राही, चल अकेला।
जलाल गंज का पुल थरथराया है। दून हवा से बातें कर रही है। स्टेशन आ गया। कुछ वेंडरों के चढ़ने से थोड़ा शोर उठ्ठा..फिर वही खामोश पटरियों पर चलने से हुई खटर पटर और नया गीत...
जिंदगी तू ही बता, तेरा इरादा क्या है?
लोहे के घर का मौसम बड़ा सुहाना था कि किसी ने चेन पुलिंग कर दी। यकबयक माहौल बदल गया। मोबाइल पर गीत बजाने वाले ने अपनी मोबाइल बन्द कर दी। सामने साइड लोअर बर्थ पर बैठी कन्या बेचैनी से उठते हुए घरवालों से फोन पर बतियाने लगी...अभी ट्रेन रुकी है। अभी बाबतपुर भी नहीं पहुंची। पीछे से तरह तरह की आवाजें आनी शुरू हो गई। रोना धोना शुरू हो गया। चेन पुलिंग करने वालों को लोग कोसने लगे, देर होने के लिए ट्रेन को गरियाने लगे।
जीवन के सफ़र में यही सब तो होता है। अच्छी भली चल रही गाड़ी कब पटरी से उतर जाए और सुहाना सफ़र कब चीख पुकार में बदल जाए कोई ठीक नहीं। जिंदगी कुछ समय के लिए ठहर सी जाती है मगर हमेशा ठहरी नहीं रहती। यह गाड़ी भी चलेगी और मौसम फिर ठीक लगने लगेगा। जिन्हे रोज सफ़र में चलना है, वे भला इस छोटे मोटे ठहराव से क्यों विचलित हों! डरें वो, जिनकी जड़ें हैं बरगदी। अधर में लटके हुए को क्या फिकर?
...............................................................
आज ओस का शोर था बनारस के भोर में। सुबह ५ बजे रजाई से निकल पलकें झपकाते गेट का ताला खोलने गए तो लगा जैसे बारिश हो रही हो। कदंब के ओस नहाए पत्तों से निरंतर टप टप झरती बूंदें बारिश का एहसास करा रही थीं। कुछ देर खड़ा सुनता रहा जलतरंग। पलकें खुलीं तो खुली की खुली रह गईं.. बाहर घना कोहरा था।
मौसम कितना भी प्रतिकूल हो बस नहा कर बाइक चलाते हुए स्टेशन में आओ और लोहे के घर में बैठने का सौभाग्य मिले तो सब कष्ट दूर हो जाता है। तकलीफ तब होती है जब भागते हुए आओ और सामने से ट्रेन निकल जाय या फिर घंटों खड़े रह कर प्रतीक्षा करते रहो मगर ट्रेन न आए। आज का दिन कल की तरह मनहूस नहीं है। कल छूट गई थी, आज मिल गई। आज पटरी पर चल रही है अपनी गाड़ी।
कोहरे से डूबे खेतों में प्लास्टिक की बोतल झूलती हुए चल रही दिख रही है। अभी भी खुले में शौच का क्रेज बरकरार है। लोग खुद भले खुले में शौच करें अपने बच्चों के लिए शौचालय बनाएं और प्रयोग करने की सलाह दें तो धीरे धीरे यह प्रथा खतम होगी।
बनारसियों में तो बहरी अलंग का इतना तगड़ा क्रेज हुआ करता था कि यहां के रईस अपनी नाव लेकर गंगा उस पार जाते और उस पार खुले में शौच करते। आज भी कुछ लोग यह शौक रखते हैं। गंगा पार खुले में निपटना, साफा - पानी (कपड़े धोना) लगाना, गंगा स्नान करना, भांग बूटी छानना और हर हर महादेव का नारा लगाते हुए बाबा विश्वनाथ का दर्शन करने के बाद कचौड़ी जिलेबी खाना यहां के लोगों का शौक हुआ करता। मौसम इस शौक के आड़े न आ पाता। नहीं सुबह तो शाम गए मगर दिन में एक बार तो जरूर गंगा पार गए। भयानक बाढ़ के समय में भी जाने वाले उस पार निपटने जाते भले पानी से डूबे खेतों में निपटने के लिए जमीन न मिले और पेड़ में चढ़कर निपटना पड़े लेकिन खुले में शौच का शौक जरूर पूरा करते। नई पीढ़ी को यह कोरा गप्प लग सकता है मगर यह हकीकत है।
धीरे धीरे चल रही है ट्रेन। कोहरे से डूबे बरगद के वृक्ष के नीचे एक आदमी खैनी रगड़ते हुए साइकिल सवार को रोककर बात कर रहा है। शीशे चढ़े ट्रेन की खिड़की से देखने पर वृक्ष, कोहरा और दो प्राणी ही दिख रहे थे। बिजली के तार बैठी एक चिड़िया भी दिख गई। पगडंडी पर एक बाइक की हेड लाइट दिखी। अरहर, सरसों के खेत कोहरे में डूबे हैं, नहीं दिख रहे। बड़े और घने वृक्ष ही दिखते हैं।
लोहे के घर में बैठे लोग अखबार पढ़ चुके। किसी किसी की मोबाइल घन घना उठती है। आम आदमी के रिंग टोन भी अजीब अजीब बजते हैं। किसी ने गायत्री मंत्र लगा रखा है तो किसी ने फिलिम का गाना। अधिकारियों की रिंग टोन बस धीरे से टिन टिन करती है और वे फोन उठा कर जोर से गरजते हैं...अभी तक सोए हो?
.................................................
दिन ढले देर शाम प्लेटफार्म पर खड़े खड़े जाने वाली का हारन सुनाई पड़ता है तो भी लगता है अपनी वाली आ रही है! अपनी वाली बेगमपुरा है जो रुकने के बाद, चलने से पहले झटके देती है। आज आने से पहले भी खूब झटके दिए, बैठने के बाद तो झटके दे ही रही है। साथी कहते हैं, इसमें यही एक बुराई है। स्पीड बढ़ाना हो तो भी एक जोर का झटका लगता है। हारन भी ऐसे बजा रही है जैसे ठंड के मारे सियार रोता है.. हों sss। जब अपने रंग चलती है तो क्या पूछना! मस्त चाल है। ऐसे ही चलती रही तो एक घंटे में बनारस पहुंचा देगी, बस आगे कोई माल न हो। लोहे का घर माल गाड़ी के कारण ही लेट हो जाता है। जैसे हर पुरुष की तरक्की के पीछे किसी महिला का हाथ होता है वैसे ही हर लेट ट्रेन के आगे एक माल गाड़ी होती है। ईश्वर से यही प्रार्थना है कि अपनी वाली को कोई माल न मिले। वरना हारन बजाती, झटके देती उसी के पीछे पीछे रेंगती रहेगी।
खाली खाली है ट्रेन की बोगी। लोहे के घर में जो हैं वे सभी एक एक बर्थ पकड़ कर लेटे हुए हैं। कुछ दूर के यात्री कुछ पास के। दूर वाले बैठे बैठे थक गए होंगे, पास वाले मेरी तरह दिनभर काम कर के। थके मांदे बिचारे घर पहुंच कर लड़ी जाने वाली कुश्ती से पहले थोड़ा कमर सीधी कर लेना चाहते होंगे।
घूम कर दूसरी बोगियां का हाल चाल ले लिया। कहीं कोई पहचाने चेहरे नहीं दिखे। इतनी रात को कोई अभागा ही सफ़र करता है इस जाड़े में। किस्मत वालों को तो मनमाफिक हमसफ़र समय से मिल गया और अब तो वे खा पी कर दुबक चुके होंगे घर में। अपने आगे वाली बर्थ पर अपने पूर्वांचल के लोग बैठे लगते हैं। जैसे ही ट्रेन रुकती और झटके देती है एक जोर की गाली देते हैं ट्रेन को। रोका कंट्रोलर ने मां बहन की गाली पाए बिचारी ट्रेन! यह भी कोई बात हुई? पता नहीं कब सभ्य होंगे लोग! इन लंठों को उनके हाल पर छोड़ दूर से आ रहे भारत के और यात्रियों का हाल लिखता हूं।
मिडिल बर्थ में तीन बच्चे धमाल मचाए हैं। बाबूजी बच्चों के नीचे आराम से सो रहे हैं। माताजी बारी बारी से यशोदा माता की तरह तीनों को पूड़ी खिलाने के बाद पानी पिला रही हैं। शरारती बच्चे कान्हा की तरह एक दूसरे के पीछे छुप रहे हैं और पानी पीने से बच रहे हैं।
खिड़कियों के शीशे ठंड के कारण बन्द हैं। दोनों खिड़कियों के बीच वाले टेबल पर झोले से भरा बैग रखा है। बैग पर हाथ सर और गाल सटाए गुमसुम बैठे आते जाते लोगों को टुकुर टुकुर देख रहे हैं माँ बेटे।
एक साइड लोअर बर्थ पर पाँच बच्चियाँ एक दूसरे से सट कर बैठी न जाने किस बात पर खिलखिला रही हैं! पल भर के लिए चुप होती हैं फिर कोई कुछ बोलता है फिर छूटने लगते हैं हँसी के फव्वारे। ईश्वर इन्हें बुरी नजर से बचाए, खुश रहें जीवन भर।
एक साइड अपर बर्थ पर एक गुड़िया सी खूबसूरत बच्ची कम्बल ओढ़ अधलेटी कोई पत्रिका पढ़ रही है। चेहरे के भाव रिसर्च स्कॉलर की तरह गंभीर।
हैं न कितने प्यारे प्यारे लोग? हाथ की पांचों उंगलियां बराबर नहीं होती। अपने घर में सभी प्रकार के लोग रहते हैं। लोहे का घर हमारा देश ही तो है।
.............................................................
बेगमपुरा हवा से बातें कर रही है। एक छक्का ताली बजाते हुए गुजरा है। उसके साथी आ रहे होंगे पीछे पीछे। रोज के यात्रियों को देख छक्के की ताली रुक गई। किसी ने कहा..सब स्टाफ के लोग हैं! एक के आगे ताली पीटते हुए बड़बड़ाया...जा! तेरी नौकरी छूट जाय। उसने हंस कर कहा..मिलने तो दो, मिलने के बाद किसकी छूटी है!
किसी ने चेन खींच दिया लगता है। वैक्यूम खुला छोड़ कर भाग गया। कोई उठा है बन्द करने। रुकी है ट्रेन। जो खींच कर उतरा होगा, वह भी ट्रेन लेट होने के लिए रेलवे को कोस रहा होगा। बैठने वाले तो कोस ही रहे हैं। जहां रुकी है, आस पास कोई स्टेशन नहीं दिख रहा। अंधेरे में डूबे खेत हैं। खाली खाली है इस ट्रेन की बोगियां। जम्मू से चली है और आखिरी स्टेशन बनारस है। अंत आते आते आदमी हो या ट्रेन, सभी रुक रुक कर हांफने लगते हैं।
ट्रेन यात्रा में सिंदबाद की साहसिक यात्राओं वाली कथा पढ़ने और धैर्य न खोने की सलाह देता रहता हूं मगर साथियों की बेचैनी कभी कम नहीं होती। अरे क्या जरूरत है ट्रेन में बैठते ही पत्नी से बात करने और शाम का प्रोग्राम बनाने की? उधर वो तैयार होने की घोषणा कर रही हैं और इधर जनाब पन्द्रह बीस मिनट में पहुंच जाने का आश्वासन दे रहे हैं। ट्रेन अभी तीस किलोमीटर दूर है। आज पिटाओगे बच्चू। अभी बेगमपुरा का नाम बिगाड़ कर ..बेगम पूरा बेवफा हो गई! कह रहे हो न? जब घर पहुंचोगे तब तक बेगम तुम्हीं को पूरा बेवफा सिद्ध कर देंगी। क्या जरूरत थी ट्रेन में चढ़कर किसी को पहुंचने का समय देना! भारतीय रेल के भरोसे पत्नी से घर पहुंचने का वादा!!! यह बेवकूफी नहीं तो और क्या है? बीबी क्या तुम्हारी बॉस है जो बहाना सुनकर सिर्फ चेतावनी देकर छोड़ देगी?
अब चली है। चलती है तो उतनी ही मस्ती से चलती है जितने इत्मीनान से रुकती है। लगता है बन्दा आज पिटने से बच जाएगा।
..............................................................
भण्डारी स्टेशन में इत्मीनान से खड़ी है
#दून और बेचैनी से बैठे हैं यात्री। भीड़ नहीं है इस बोगी में। बगल के साइड लोअर बर्थ पर बैठा एक रसियन जोड़ा बेचैन है। उनका कहना है..it's not possible in Rasia. Four hours late... it's too much! चैन से बैठे हैं बनारसी। सामने बर्थ पर अखबार में लाई चना बिछाकर आराम आराम से खाए जा रहे हैं। मेरे बगल में बैठा हरिद्वार से चला अकेला आदमी भी कुछ निकाल निकाल कर खाए जा रहा है। रसियन जोड़ा आपस में नहीं बतिया रहा है, दोनों अपनी अपनी मोबाइल में जुटे हुए हैं। लड़की का ब्लू जीन बाएं घुटने से फटा हुआ है। जब वह पलेठी मार कर बैठती है तो घुटना छलक कर बाहर आ जाना चाहता है। जब वह टांगे फैलाती है तो चुपचाप सो रहता है। लड़का काली जीन और काली फुल टी शर्ट पहने है। गले में एक तुलसी की माला भी है। हरिद्वार से लिया जान पड़ता है। बनारस घूमेगा तो और भी माला पहनेगा। कोई टोपी भी पहना सकता है, कोई मामा भी बना सकता है। बनारस में बड़े बड़े विद्वान रहते हैं।
ट्रेन देर से रुकी होने से बेचैन हो लड़का प्लेटफॉर्म पर टहल कर एक पानी की बोतल कीन लाया है। अब दोनो हाथ साफ कर बिस्कुट खा रहे हैं। हम होते तो लप्प से खा लेते, ये सावधानी बरतते हैं, हाथों में लोशन लगा कर साफ़ करने के बाद ही खाते हैं।
आधे घंटे से अधिक रुकने के बाद ट्रेन फ़ाइनली चल ही दी। ट्रेन के चलने मात्र से चहकने लगे सभी यात्री। भारतीय रेल सुख देना जानती है। अब सभी के अच्छे पल आ गए, पटरी पर चल रही है ट्रेन।
सामने बैठ कर लाई चना खाने वाले खा पी कर अपने अपने धंधे में लग गए। मेरी तरह मोबाइल में कुछ कर रहे हैं। रसियन जोड़ा भी पानी पी कर अपने-अपने धंधे में लग गए। मोबाइल में कुछ कर रहे हैं। बोगी में आगे एक परिवार के बतियाने कि आवाजें आ रही हैं। उनके पास आभासी दुनियां से परे अपनी दुनियां भी है।
ताली बजाकर पैसा मांगने वाले हिजड़ों का दल आया है बोगी में। हम लोगों को पहचानता है। रसियन जोड़े के सामने देर तक ताली पीटता रहा। वे नो नो कहते रहे। ये क्यों नो नो? करते रहे। अंत में थक कर आगे बढ़ गए। विदेशी अभ्यस्त लगते हैं कि भारतीय रेल में मांगने वाले चढ़ते हैं। इनको देखते ही नो नो ही कहना है।
अभी एक स्टेशन आगे बढ़ी है ट्रेन। जफराबाद से कुछ और लोग चढ़े हैं। वे लेट ट्रेन में चढ़ पाने से खुश हैं। लेट न होती तो न मिलती। ट्रेन का लेट होना लोगों को जितना दुःख पहुंचाता है, उतने ही लोगों को खुश भी कर देता है। अब सभी मना रहे हैं कि ट्रेन तेज चले और जल्दी से बनारस पहुंचा दे।
मोबाइल और नेट वर्क ने लोगों की बेचैनी को और कम कर दिया है। शायद इसीलिए प्लेटफार्म पर फ्री वाई फाई और रंगीन टेलीविजन की व्यवस्था है कि ट्रेन की प्रतीक्षा में लोग क्रोध न करें। जैसे घरेलू समस्या से घबडा कर घर का मुखिया शराब या दूसरे नशे में खुद को झोंक कर गम कम करता है वैसे ही अफीम के नशे की तरह आभासी दुनियां में खोए लोग अपना गुस्सा, अपनी बेचैनी, अपना दर्द भुलाए रखते हैं। दुष्यंत कुमार ने शायद इसी खतरे को भांप लिखा था...
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग लेकिन, आग जलनी चाहिए।
अब लोगों को क्रोध तो आता है लेकिन समाज की बुराइयों को सुधार करने के लिए नहीं। लोग किसी धार्मिक मुद्दे पर गरीबों की झोपड़ी जलाने के लिए तो एक हो सकते हैं लेकिन ट्रेन लेट होने या सड़कों के गढ्ढे पाटने के लिए आंदोलन नहीं कर सकते। अपना गुस्सा आभासी दुनियां में उतारे या फिर कोई बढ़िया मूवी देख ली बस हो गया। कॉलोनी में जा कर पड़ोसी से पूछो.. शर्मा जी कहां रहते हैं? तो जवाब मिलता है.. कौन शर्माजी? मैं नहीं जानता। जब भीतर से पत्नी चीखती है..अरे! चिंटू के पापा.. वही तो शर्मा जी हैं! तब जा कर होश आता है..ओह, अच्छा! कहने का मतलब यह कि लोग खुद से और अपने पास पड़ोस से कटे कटे रहने के आदी हो चुके हैं।
बोगी में आगे की ओर बैठे परिवार का शरारती बच्चा खूब उधम मचा रहा है। सर पर टोपी और नन्हें नन्हें पैरों में कपड़े के जूते पहन रखे हैं उसने। बार बार बर्थ पर लेटी मोटी अम्मा के पेट पर चढ़ता है और सर्र से फिसल कर फर्श पर गिर जाता है। उसको इसमें खूब मज़ा आ रहा है। अब रसियन लड़की के साथ खेल रहा है। उसे भी खूब मज़ा आ रहा है। प्रेम देश और भाषा का मोहताज नहीं होता।