लोहे के घर में और भी यात्री हैं। कुछ युवा, कुछ प्रौढ़, कुछ बुढढे और कुछ महिलाएं। युवाओं के कान में तार ठूंसे हैं और हाथ में मोबाइल है। एक महिला साइड अपर बर्थ पर आराम से लेटी हैं। कुछ खिड़की झांक रहे हैं, कुछ बैठे बैठे ऊंघ रहे हैं। बनारस उतरने वाले यात्रियों में हलचल है। एक स्टेशन पहले ही सामान उठा कर जमा कर रहे हैं दरवाजे पर। जिन्हें दूर जाना है वे खाली जगह पा थोड़ा और फैलकर बैठ रहे हैं।
अधिक जगह मिलने से खुश हैं, पूड़ी खा कर भारी हुए प्रौढ़ दंपत्ति। उन्हें क्या पता कि और भीड़ चढ़ेगी बनारस स्टेशन पर, थोड़ा और सिकुड़ कर बैठना पड़ेगा आगे।
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दुर्जन पर उपदेश का प्रभाव नहीं पड़ता। बबूल के जंगल पर बदलते मौसम का कोई प्रभाव नहीं है। ये पहले की तरह कटीले हैं। भीषण गर्मी के बाद बारिश के मौसम ने हमें जरूर राहत पहुंचाई है। बारिश हो नहीं रही है लेकिन जारी है आकाश में बादलों की आवाजाही। बबूल के जंगल से आगे बढ़ चुकी है ट्रेन। खिड़कियों से मस्त आ रही है हवा।
कैंट स्टेशन के प्लेटफार्म से खरीद कर पापा लाए थे अमरूद। दादा जी के पास उछल-उछल खा रहे हैं बच्चे।
अभी प्यासे लेकिन हरे भरे दिख रहे हैं खेत। धूप नहीं है तो गोल बना कर खेतों के बीच बकरियों के झुंड की तरह बैठे हैं बच्चे भी। एक चिड़िया तेज गति से ट्रेन के साथ उड़ रही थी। लग रहा था जैसे कंपटीशन कर रही हो! शायद हराकर सबक सिखाती रहती हो रोज सुस्त चाल चलने वाली ट्रेनों को। यह वाली ट्रेन चिड़िया की उड़ान से तेज निकली। चूं चूं करती पिछड़ गई चिड़िया। कहीं किसी कोने में बैठे कछुए ने देख लिया होगा तो चिड़िया का मजाक उड़ाता होगा.. मैं हरा देता हूं ट्रेन को और तुम हार गई!!!
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सुबह की धूप तेज है। सही समय पर चल रही है फोट्टी नाइन। जम चुकी है तास की अड़ी। उज्जर गमछे में फेंके जा रहे हैं राजा, रानी, इक्के। कोई पत्ता कलर बन जाता है और सभी पर जमाता है रंग। आरक्षण या ऊँची जाति का तमगा मिल गया हो जैसे! दुक्की से कट जाता है इक्का!!!
ट्रेन हवा से बातें कर रही है। पटरी के उस पार धूप से चमकती उखड़ी-उखड़ी सड़क और सड़क के उस पार दूर दूर तक फैले खेत। खेतों में कहीं बारिश का जमा पानी, कहीं बंजर धरती। कहीं सब्जी, कहीं धान के बीज। मेढ़-मेढ़ धूप में दौड़ते नन्हें गदेले। खेतों के बीच खड़ा सूखा युग्लिप्टस का वृक्ष। धूप में चुंधियाई आंखों से आकाश में बादल निहारता बूढ़ा किसान। युग्लिप्टस और किसान में साम्य ढूंढता हूं। किसान में जीवन शेष है। माथे पर घास का बोझ लादे जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाती महिलाएं। पल- पल बदलते हैं दृश्य लोहे के घर में।
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सुबह फोट्टी नाइन अप, शाम फिफ्टी डाउन। हावड़ा अमृतसर एक्सप्रेस। सही समय पर चले तो रोज के यात्रियों के यह ट्रेन सबसे सूट करती है। सुबह दस से पहले पहुंचा देती है जौनपुर और शाम साढ़े पांच से छः बजे के बीच वापसी में मिल जाती है। आज अप, डाउन दोनों सही समय पर मिली। ट्रेन का सही समय पर चलना बड़ा सुकून देता है रोज के यात्रियों को।
काम भर की भीड़ है। बैठने भर की जगह है। हर बार खिड़की वाली सीट नहीं मिलती। खिड़की वाली सीट पर स्लीव लेस पीला सूट पहने एक युवती चाय बिस्कुट सुडुक रही है। बगल में टी शर्ट और जींस पहने बैठा उसका साथी भी साथ दे रहा है। चाय खत्म हुई अब युवक कहीं चला गया है। युवती पूरी टांगे फैलाए, कान में तार ठूंसे खिड़की की तरफ पीठ कर के मोबाइल में बातें कर रही है। मेरे बगल में बैठा एक आदमी लगातार मोबाइल में किसी से बातें कर रहा है। एक से बात खतम होती है तो दूसरे को मिलाने लगता है। जब से अन लिमिटेड कॉल का दौर शुरू हुआ लोग फालतू समय का उपयोग मित्रों से बात करने में करने लगे हैं। अपने व्यस्त समय में फोन आया तो जल्दी उठाते नहीं।
सामने के साइड लोअर में बच्चों और महिलाओं का दूसरा परिवार है। सभी पलेठी मार कर खिड़की से बाहर देख रहे हैं। बाहर के दृश्य देख बच्चे प्रश्न करते हैं और महिलाएं बताती जाती हैं। साइड अपर बर्थ उनके सामानों से भरा पड़ा है। अजीब अजीब आवाजें निकालते हुए वेंडर चाय, हरा मटर, मैंगो जूस और पानी बेच रहे हैं। बच्चे वेंडरों की आवाजें दोहराते हैं और हंसते हैं..च ई य्या!
खिड़की के बाहर का संसार अभी मन मोहक है। गोधूली की बेला है। खेत चर कर चौपाए घरों की ओर लौट रहे हैं। एक खेत में चार देसी कुत्ते भी आराम फरमाते दिखे। शायद ये आपस में बैठ कर यह तय कर रहे थे कि गांव में किसकी झोपड़ी से पहले धुआं निकलेगा? जिस घर से धुआं उठता दिखलाई पड़े, उधर ही कूच किया जाय! रोटी वहीं पहले मिलेगी।
एक खेत में आग जलता दिखा। ये खेत पर पड़े भूंसे ऐसे ही फूंक दे रहे होंगे। कौन काटे?, कौन भूसा तैयार करे?, कहां रख्खे? जितने का भूसा नहीं, उतना तो समय और श्रम बेकार। बारिश भी तो सर पर है। खेत तैयार नहीं किया तो धान की बोआई कहां होगी?
एक खेत पर झुंड से छूटी बकरी बड़ी तेज मिमियां रही थी। शायद खेलने में भटक गई हो। जैसे शहर में कोई अकेली बच्ची साथियों से छूट जाय और रोने लगे! वैसे ही चीख रही थी, खेत में अकेली छूटी बकरी। बकरी को नहीं पता होगा कि जमाना खराब आ गया है। लेकिन फिर भी रास्ता भटकी बच्ची की तरह चीख रही थी बार-बार।
अब दिन पूरी तरह ढल रहा है। रोशनी कम हो रही है और अंधेरा तेजी से बढ़ता जा रहा है। बाहर जब कुछ नहीं दिखेगा, लोहे के घर में भीतर की लाइट जलेगी। अभी बाहर धुंधुलकी रौशनी है, अभी भीतर पूरा अंधेरा नहीं हुआ। हमारा हाल भी लोहे के घर वाला है। जब तक बाहर दिखता है, बाहर ही देखते रहते हैं। बाहर से झटका लगे तो भीतर के उजाले की तलाश प्रारंभ हो। अप्प दीपो भव: ऐसे ही थोड़ी न कहा होगा बुद्ध ने।