19.12.12

शुक्र है...


नज़र अंदाज़  कर देते हैं हम
छेड़छाड़
दहलते हैं दरिंदगी पर
शुक्र है...
अभी हमें गुस्सा भी आता है!

देख लेते हैं
आइटम साँग
बच्चों के साथ बैठकर
नहीं देख पाते
ब्लू फिल्म
शुक्र है...
अभी हमें शर्म भी आती है!

करते हैं भ्रूण हत्या
बेटे की चाहत में
अच्छी लगती है
दहेज की रकम
बहू को
मानते हैं लक्ष्मी
बेटियों का करते हैं
कंगाल होकर भी दान
शुक्र है....
चिंतित भी होते हैं
लिंग के बिगड़ते अनुपात पर!

गंगा को
मानते हैं माँ
प्यार भी करते हैं
चिंतित रहते हैं हरदम
नाले में बदलते देखकर
शुक्र है...
मूतते वक्त
घुमा लेते हैं पीठ
नहीं दिखा पाते अपना चेहरा!

यूँ तो
संसद में करते ही रहते हैं
अपने हित की राजनीति
लेकिन शुक्र है...
दुःख से दहल जाता है जब
समूचा राष्ट्र
एक स्वर से करते हैं
घटना की निंदा!

शुक्र है...
अभी खौलता है हमारा खून
किसी की पशुता पर
चसकती है
किसी की चीख
अभी खत्म नहीं हुई
इंसानियत पूरी तरह

मानते ही नहीं अपराध
तय नहीं कर पाते अपनी सजा
शुक्र है...
जानते हैं अधिकार
मांगते हैं
बलात्कारी के लिए
फाँसी!

छोड़ नहीं पाये
दोगलई
लेकिन शुक्र है...
अभी नहीं हुये हम
पूरी तरह से
राक्षस।
................

34 comments:

  1. सच्चाई से कही गयी बात अच्छी लगी

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  2. हाँ शुक्र है कि सांस ले रहे हैं हम अब भी. ज़िंदा हैं.:(

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  3. शुक्र है अभी
    कच्चा नहीं चबाते हम
    मसलते हैं मांसल देह
    खरोंचते हैं नाखूनों से
    चबाते नहीं हड्डियाँ
    पीते नहीं रक्त
    भागकर छुप जाते हैं,
    इस पहचान से
    मनुष्य हैं अभी !

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  4. पशुता धीरे धीरे ही पाली जाती है और अंत यह होता है।

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  5. बेहतर लेखनी !!!

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  6. शुक्र है नहीं अभी हैवानियत सभी में,
    इंसानियत भी जग जाती कभी कभी.

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  7. शुक्र है... कि अभी भी हम दो पैर पर चलते हैं और अपने दोनों हाथ आज़ाद रखते हैं.. ताकि इन हाथों से लूट सकें आबरू.. नोच, खसोट और चीर सकें बदन, बहा सकें खून.. शुक्र है कि इतना होने पर भी हम कह पाते है कि जज साहब हमने ये गंदा काम किया है, हमें फाँसी दे दो! हाथ हैं न दो दो.. जोडकर माफी माँग लेते हैं.. अभी जानवर नहीं हुए हैं भाई साहब, ध्यान से देखिये, हम सभ्य हैं और अभी भी दो पैरों पर खड़े होकर चलते हैं और दो हाथों से काम करते हैं.. चौपाये कहाँ हैं हम!!

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  8. शुक्र है.......
    वाकई.

    अनु

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  9. शुक्र है अभी मानवता साँस ले रही है

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  10. शुक्र है कि अभिव्यक्ति में इतनी चुभन तो है ।

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  11. मानवीय मूल्यों के अवमूल्यन को समय के ठहराव के बिम्ब पर प्रवाहित यह कविता मन को बहुत झकझोड़ती है।

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  12. खून खौलता है शुक्र है , यह उबाल कितने समय रहता है , देखना यह है !

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  13. शुक्र है अभी कुछ तो शर्म और संस्कार बची है...

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  14. गहन.........कड़वा सच........शुक्र है कि मुँह में जबान और हाथ में कलम है अभी........खुद से शुरुआत करनी होगी.........हैट्स ऑफ इसके लिए।

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  15. शुक्र है कि शुक्र है।
    मर्म है,वेदना है।

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  16. भाई पाण्डेय जी बहुत ही धारदार कविता |

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  17. सिर्फ खून एक बार खौलने की नहीं उसका उबाल बनाए रखने की जरूरत है

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  18. शुक्र है कि
    बची है शर्म ....

    झकझोर देने वाली रचना ।

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  19. अपने समाज, अपने धर्म
    की रक्षा के लिए
    रोज ही मांगते हैं दान
    लेकिन ऐसी बर्बरता पर
    ये ठेकेदार, मौन हो जाते हैं
    हमे भी केवल दान देने की ही आदत है
    नहीं पूछते इनसे भी कोई सवाल।

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  20. नारी हो न निराश करो मन को - ब्लॉग बुलेटिन आज की ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  21. शुक्र है अभी हम पूरी तरह राक्षस नहीं हुए हैं...गहरा कटाक्ष।।।

    सुंदर रचना।।

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  22. शुक्र है अभी हममें कुछ संवेदना बची है!

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  23. वाह ! कमाल कर दिया ,बहुत सुन्दर रचना.
    मगर हम यैसे ही रहेंगे,समाज भी यैसा ही रहेगा न जाने कब तक !
    शायद तबतक ,जबतक सारे लोग ओशो द्वारा बताया हुआ डाइनेमिक ध्यान करना शुरू नहीं करेंगे.
    शायद पशुता और भी बढ़गी.क्योंकि आदमी भी येक पशु ही है.मगर वो इन्शान भी बन सकता है,उसमे वो छ्यमता भी छुपी है.

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  24. इश्वेर पूरा राक्षस ना होने दे.

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  25. देर ही क्या बची है अब राक्षस होने में ... नहीं हुवे कर कभी कभी जाग जाता है वो राक्षस हमारे अंदर ....
    आक्रोश जायज है ...

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  26. शानदार लेखन, बधाई !!!

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  27. विचित्र लीला है लीलाधर की। हम पूरी तरह इंसान भी नहीं बन सके ...राक्षस भी नहीं बन सके। बन सके तो केवल अवसरवादी ...परफ़ेक्ट अवसरवादी। किंतु हमारे अन्दर जो कुछ भी ...जितना भी अधूरापन है वही प्रकाश की किरणों को आमंत्रित करने के लिये पर्याप्त है .........और इसी उम्मीद में हम जिये जा रहे हैं। बड़ी संवेदनशील रचना है पांडे जी! गंगा जी के किनारे जाना छोड़ दिया .......क्योंकि बहुत गुस्सा आता है। अब जाऊँगा कभी तो सीधे गोमुख ही .......

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  28. का हो मर्दे ! टिप्पनियों पर पहरेदारी लगा दिहल?

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    1. ढेर क बिलाब बन गयल बा त समझे मे न आवला कि केहमे का कही के निकस गयल..रहींली त हटा देइला ना रहीला त..

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  29. शुक्र तो वस्तुतः नहीं ही है ..लेकिन अब क्या कीजियेगा !!!!

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  30. bahut khoob !
    shukr hai aaj kee peedee doglai hargiz nahee hai .
    mujhe poora vishvas hai desh ka bhavishty inke hatho surkshit rahega....
    young nation kee category me hum hai hee......
    sarthak lekhan
    Aabhar

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  31. दुखद है , हम से अच्छा तो वो जानवर है जो कम से कम अपनी हरकतों से ये साफ़ साफ़ बता तो देता है कि 'भैया हम से बच के रहना , हम जानवर हैं |'
    हमारा तो कोई भरोसा ही नहीं , कब जानवर बन जाएँ , कब इंसान |

    सादर

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