28.3.13

कहाँ गई होली...!


बसंत आया
सरसों के फूल खिले
गेहूँ की बालियाँ लहलहाईं
झूमने लगे अरहर
सूखी सनाठी को पकड़कर
इक-दूजे से
लिपटने लगीं लताएँ
धरती माँ ने
अपने दुलारे
सबसे बूढ़े पीपल को भी
उबटन लगाकर
लौटा दिया
उसका बचपन।

हर बार की तरह
इस बार भी
पकृति ने रंग जमाया
अंकुरित होती
जवान होती
खिलती-फूलती
नाचती-गाती
नखरे दिखाती
आ गई होली।

प्रकृति के बदलते तेवर देख
मन मचला
तन बहका
पुराने वस्त्रों को
नकली रंगों से
खूब किया मैला और..
छुड़ाते रहे देर तक
पुराने चमड़े की
नई कालिख!

नए वस्त्र पहने
गुलाल लगाया
एक ढूँढो
हजार मिलते हैं
कई थे
अपने जैसे
मस्ती में डूबे
सबसे गले मिले
खूब किया बचपना
लगा कि अपनी
हो गई होली।

हाय!
हम पीपल न हुए
न लगा पाये
उसके जैसा उबटन
न लौटा पाये बचपन
न हो पाये जवान
पचपन के थे
पचपन के ही रहे
जस के तस
महंगाई से परेशान
ब्लड प्रेशर और शुगर के मरीज
जवान होती बेटियों की चिंता में घुले रहने वाले
बाबूजी।
................ 

22 comments:

  1. बहुत ही उत्कृष्ट और मार्मिक रचना, शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  2. बहुत सुन्दर मर्मस्पर्शी रचना ..
    होली की हार्दिक शुभकामनायें...

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  3. बाबू जी का इसके सिवाय और कोई इलाज है भी नहीं फिलहाल :) Belated Happy Holi !

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शुक्रवार के  चर्चा मंच-1198  पर भी होगी!
    सूचनार्थ...सादर!
    --
    होली तो अब हो ली...! लेकिन शुभकामनाएँ तो बनती ही हैं।
    इसलिए होली की हार्दिक शुभकामनाएँ!

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  5. बहुत ही भावपूर्ण प्रस्तुति...
    होली पर्व की शुभकामनाएँ...

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  6. कहाँ से कहाँ तक सफ़र कर गयी रचना.....
    बहुत सुन्दर!!!!

    सादर
    अनु

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  7. होली के अवसर पर समूची प्रकृति को रंगों के खुबसूरत अहसास में पिरोती भावपूर्ण कविता...

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  8. वाह कवि जी।
    हमेशा की तरह बढ़िया रचना।
    होली की शुभकामनायें।

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  9. उत्कृष्ट लाजबाब रचना,,,बधाई
    आपको होली की हार्दिक शुभकामनाए,,,

    Recent post: होली की हुडदंग काव्यान्जलि के संग,

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  10. उत्स से शुरू और मर्मांतक पर खत्म!! बडी सम्वेदनशील रचना!!

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  11. बहुत अपील है इस होली में ।

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  12. सुंदर रचना के लिए आपको बधाई

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  13. गहरे भावों की उत्कृष्ट प्रस्तुति

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  14. सबकी होली बस सुख लाये..

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  15. तन धुला मन सूखा रह गया सी कविता !

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  16. बहुत सुन्दर अभिब्यक्ति ,प्रकृति ही वास्तव में होली खेलती है. आदमी क्या ख़ाक होली खेलता है !

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  17. क्षणिक सुख, कुछ पलों का बचपन, हल्का सा सुकून, बस हो ली होली| अब हर कोई पीपल तो नहीं हो सकता न|

    सादर

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  18. संवेदना के अंत में खड़ी थी होली ...

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