5.6.13

पाक गईल अमवाँ कि ना..?

चखे लागल छोटकी चिरैय्या!
मैय्या देखा तनि, पाक गईल अमवाँ कि ना..?

चार बूँद झरल बाटे अबहिन ले मुनियाँ
चार जून रूका तनि बरसे दs बुनियाँ
अमवाँ पाक जाई हो.....

भिनसहरे दाना-पानी चिरिया के देवलू
खाई के मोटाई गइल, बाज़ अस कोयलू
मैय्या देख तनि, पाक गइल अमवाँ कि ना..? 

पकलका पे हक होखे चिरिया कs पहिला
काहे घबरालू बिटिया, तोहें मिली डलिया
अमवाँ पाक जाई हो.....

काहे हक होखे पहिला चिरिया कs माई?
हम ताकत बाटी, सब कचवे ई खाई!
मैय्या देखा तनि, पाक गइल अमवाँ कि ना..?

मनई से पहिले रहल चारो ओरी जंगल
शेर, भालू, चिरई कs होत रहल दंगल
अमवाँ पाक जाई हो....

बूझ गइली माई काहे चिरिया कs हक बा
ओनहीं के पेड़ हउवे, ओनहीं क फल बा!
चिरई चखा तोहीं, पाक गइल अमवाँ कि ना..?

चखे लागल छोटकी चिरैय्या!
मैय्या देखा तनि, पाक गइल अमवाँ कि ना..?
...............................

27 comments:

  1. अहा, वाह, वैसे भोजपुरी आती नहीं, पर सब समझ में आ गया।

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  2. अब तो सिर्फ़ मनई ही रह गये हैं, शेर भालू चिरैया सब आये गये, बहुत भाव विह्ल करती भोजपुरी रचना, आभार.

    रामराम.

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  3. समझ में कुछ नहीं आया। लेकिन अम्बियाँ देखकर मज़ा आ गया।

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    1. बिटिया पूछ रही है माँ से..

      माँ, देखो जरा, छोटी चिड़िया भी आम चखने लगी! आम पक गया कि नहीं?

      माँ कहती है...

      अभी तक तो चार बूँद ही बारिश हुई है, चार दिन और रूको, जमकर बारिश की बूँदे गिरने दो, आम पक जायेगा।

      फिर बिटिया मारे जलन के कहती है....

      सुबह-सुबह चिड़िया को दाना-पानी देती हो, खा-खा के कोयल भी बाज़ जैसी मोटी हो गई है, आम तो जरूर पक गया होगा..पका कि नहीं?

      बिटिया के जलन को भांपकर माँ समझाती है...

      पके फल पर तो पंछियों का ही पहला हक होता है, तुम क्यों घबड़ाती हो, तुम्हें पूरे एक डाल का आम मिलेगा।

      माँ के उत्तर को सुनकर बिटिया शंका करती है..पहला हक पंछियों का कैसे? लालच के मारे कहती है..लगता है हम ताकते रह जायेंगे और चिड़िया कच्चा ही पूरा आम खा जायेगी।

      माँ फिर समझाती है..जब धरती पर आदमी नहीं था तो चारों ओर जंगल ही जंगल थे। ये वृक्ष तो इन्हीं जगंली जानवरों और पंछियों के हैं। हम तो अनाधिकार यहाँ कब्जा जमा बैठे हैं।

      बिटिया को माँ की बात समझ में आ जाती है। कहती है..

      हम समझ गये माँ, उन्हीं के वृक्ष, उन्हीं के फल। तब वह चि़ड़िया से ही कहती है...

      चिड़िया, तुम्हीं चखकर बताओ, आम पका कि नहीं?

      अब आप बताइये, डाक्टर साहब, समझ में आया कि नहीं? :)

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    2. वाह वाह ! समझ भी आ गया और ग्रहण भी कर लिया। सार्थक सन्देश देती बहुत बढ़िया उत्कृष्ट रचना है। अब तो हम भोजपुरी सीखने का प्रयास भी कर सकते हैं।

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    3. बहुत सुंदर! अनुवाद के लिए आभार!

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    4. एकदम प्राकृतिक कविता।

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  4. कमेंट्स दवारा आपने ठेठ हिंदी भाषा में समझा दिया है पूरी तरह से समझ में आ गया,,,आभार

    शानदार,बहुत उम्दा भोजपुरी गीत ,,,

    RECENT POST: हमने गजल पढी, (150 वीं पोस्ट )

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  5. लोक-जीवन की सारी मिठास समेटे ,प्रकृति-पर्यावरण से जुड़ी सुन्दर रचना !

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  6. पढ़कर मजा आया, और आपके समझाने के बाद समझ भी आया :)

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  7. कितना खूबसूरत पर्यावरणीय यथार्थ इन चंद लाईनों में छुपा है -मनुष्य तो बहुत बाद में धरा पर आया ही है

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  8. बहुत ही सुन्दर गीत है. मन मुग्ध हो गया पढ़कर. भोजपुरी में इसकी मिठास और बढ़ गई है.

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  9. .
    .
    .
    सुन्दर गीत, सुन्दर भाव...


    ...

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  10. वाह साहब! क्या जबरदस्त बात कह दी ! वह भी लोकगीत...

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  11. इस गीत को पढते हुए मैं चालीस-पैतालीस साल पीछे चला गया.. जब अपनी बूढ-पुरइन दादी-नानी को इस तरह गाते सुनता था.. आज भी धुन दिमाग में बजती है देवेन्द्र भाई!! शब्दों से शंड जोडकर छंद बनाती!!

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    1. जी..वैसे ही किसी धुन का प्रभाव रहा होगा जेहन में जो ऐसे लिखा गया।

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  12. सुन्दर रचना

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  13. हरियर भइल तुलसी के पतवा,
    बरसे लागल बुनिया,
    देखा तनि पाक गइल अमवाँ की ना ?
    बहुत सुन्दर रचना...

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  14. आपने लिखा....हमने पढ़ा
    और लोग भी पढ़ें;
    इसलिए कल 12/06/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
    धन्यवाद!

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  15. वाह .. गज़ब की रचना ... और आपने जो अर्थ भी बताया तो दुगना आनद आ गया ...
    भोजपुरी की बात अनोखी है ...

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  16. छोट रहनी त हमरो ढेरे गुस्सा आवत रहे ये देखेअ के कि सबसे निमन आमवा के पक्षी सब जातरअ सान
    आज सभेवे समझअ में आ गइलअ

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  17. पकलका पे हक़ होला चिरैया के पहिला... आ ह ह ह ... मन गदगद हो गया... बहुत मोहक रचना है ... बधाई !!

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  18. हमको भी लगता है कि आम पक ही गए!! सुन्दर रचना।। आभार।

    क्या आपको भी आते हैं इस तरह के ईनामी एसएमएस!!
    नया चिठ्ठा :- Knowledgeable-World

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  19. देवेन्द्र जी आपने तो मिटटी की खुशबू परोस दिया इस सुंदर भोजपुरी रचना के माध्यम से.
    अमवा त अब पक गयल होई ...

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