23.12.13

फेसबुक से..

इधर बहुत दिनो से कुछ अच्छा नहीं लिख पाया। थोड़ा बहुत फेसबुक में ही सक्रीय रहा। वहाँ लिखे अपने कुछ स्टेटस जो मुझे अच्छे लगे यहाँ सहेज रहा हूँ....


पतंग

उड़ रही हैं पतंगें
लगा रही हैं ठुमके
लड़ रहे हैं पेंचे
कट रही हैं
गिर रही हैं
लूटने के लिए
बढ़ रहे हैं हाथ
मचा है शोर…
भक्काटा हौsss

जब नहीं होती
हाथ में कोई डोर
हाथ मलते हुए ही सही
आपने भी महसूस किया होगा...
कि उड़ने में
ठुमके लगाने में
पेंच लड़ाने में
कटने में
और
कटकर फट जाने/लुट जाने में
पतंग का कोई हाथ नहीं होता ।
.......................

अकेले में...

अकेले में
चीनियाँ बदाम 
फोड़ता हूँ 
कभी कोहरा
कभी 
रजाई ओढ़ता हूँ।
तू 
‘दिसम्बर’ की तरह
नहीं मिलती मुझसे
मैं 
‘दिगम्बर’ की तरह
नाचना चाहता हूँ।

.....................

बसंत की आहट

इस पार से उस पार तक 
कोहरा घना था 
सूरज का 
आना-जाना मना था
उड़ रहे थे
साइबेरियन पंछी
सुन रहा था
मौन
आ रही थी
बसंत की आहट
बह रही थी नदी
कल-कल-कल।
........


18 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज मंगलवार (24-12-13) को मंगलवारीय चर्चा 1471 --"सुधरेंगे बिगड़े हुए हाल" पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. अच्छा बुरा कहाँ होता है लिखना कभी
    लिख रहें हैं कुछ क्या ये कम नहीं :)

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  3. पतंग का भविष्य डोरियाँ तय करती हैं , या फिर वे हाथ जो डोरियों को पकड़ते हैं।
    आत्मा -परमात्मा सा दर्शन हुआ यह तो !

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  4. बिना डोर , खुद कटी पतंग बन जाते हैं !!

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  5. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति.... कट कर फट जाने या लूट जाने में पतंग का कोई हाथ नहीं होता .......

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  6. सत्यापित और स्थापित तो कृति ब्लॉग में ही आकर ही होती है।

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  7. तीनों कविताएँ प्रशंसनीय हैं..सच है पतंग की किस्मत तो दूसरे के हाथ में होती है...

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  8. Blog ab facebook ki post ko surakshit karne ka locker ban gaya hai.. Aaiye Pandey ji fir se dhuni ramayi jaye..
    Kavitaayen teenon chakachak hain.. !!

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  9. आपकी इस प्रस्तुति को आज की बुलेटिन मोहम्मद रफ़ी साहब और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  10. बसंत की आहट जल्दी आ गयी -कवि हैं आप !यहाँ ठण्ड से हड्डियां तड़तड़ा रही है :p

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  11. वाह...बहुत ही अच्छी और भावपूर्ण रचनायें.....बधाई....

    नयी पोस्ट@ग़ज़ल-जा रहा है जिधर बेखबर आदमी

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  12. बहुत सुन्दर है तीनों ही |

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  13. दिगम्‍बर की तरह नाचने का मन क्‍यों है...

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  14. पहली कविता बड़ी अच्छी लगी

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  15. वाह, बहुत खूब

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  16. बहुत सुंदर ...
    पतंग तो डोर और हवा के हांथों कठपुतली है

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