31.3.14

नववर्ष।


हाड़ कंपाने वाली ठंड में
सूट-बूट पहनकर
ए.सी. में बैठकर
इस्की-व्हिस्की चढ़ाकर
किसी को हलाल कर
ओटी-बोटी चाभ कर
नाचते-झूमते
संपन्नता की नुमाइश करने के लिए आता है
अंग्रेजी नववर्ष।


बर्गर, पिज़्जा या फिर
टमाटर की चटनी के साथ
आलू या छिम्मी का परोंठा खा कर
मोबाइल में मैसेज भेज कर
देर रात तक जाग-जाग कर
टी.वी. में
सपने देखता
बजट बिगाड़ता
आज की नींद
कल की सुबह खराब करता 
मध्यमवर्ग
तब चौंकता है
जब हैप्पी न्यू ईयर कहकर
मुँह चिढ़ाते हुए 
भाग जाता है
अंग्रेजी नववर्ष।

अथक परिश्रम के बाद
जब गहरी नींद में
सो रहा होता है
मजदूर, किसान
मध्य रात्रि में
चोरों की तरह आता है
अंग्रेजी नववर्ष।

सूर्योदय की स्वर्णिम आभा बिखेरता
पंछियों के कलरव से चहचहाता
गेहूँ की लहलहाती बालियों में
सोना उगलते
बौराये आमों, गदराये फलों, खिलते फूलों
झर झर झरते पुराने,
फर फर हिलते नये कोमल पत्तों के बीच
वसंत के गीत गाता
नई उर्जा का संचार करता
जन-जन को
गहरी नींद से जगाता
हँसते हुए आता है
भारतीय नववर्ष।

सृष्टि का प्रथमदिवस
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा
नवसंवत्सर!
इसके आते ही
सुनाई देती है
उजाले की हुँकार
होने लगता है
अंधेरे का पलायन
दिन बड़े,
छोटी होने लगती हैं रातें
भरने लगते हैं
अन्न के भंड़ार
गरीब क्या,
मिलने लगते हैं दाने
पंछियों को भी!

नवदुर्गा का आह्वाहन
व्रत, तप, संकल्प और जयघोष के साथ
शुरू होता है
भारतीय नववर्ष।

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30.3.14

नवसंवत्सर


पत्ते झड़ते
झर झर झर
मन करे उड़ूँ 
फर फर फर
पूजा की थाली
डगर-डगर
क्या तेरा घर
क्या मेरा घर
नवसंवत्सर! नवसंवत्सर!

सोने-सी बाली
गेहूँ की
रक्तिम आभा है
गुड़हल की
समृद्ध धरा
हर्षित अम्बर
नवसंवत्सर! नवसंवत्सर!

कोहरे का सपना चूर हुआ
अंधकार अब दूर हुआ
चैत्र शुक्ल की प्रतिप्रदा
हँस कर निकल रहे दिनकर
दूज का चाँद तैयारा खड़ा
स्वागत करने को जमकर
नवदुर्गा का आह्वाहन
जय घोष कर रहा गगन
यह सृष्टि का प्रथम दिवस
विक्रमादित्य का विजय समर
मन क्यों न खुशी से पागल हो !
झूमे, नाचे, हर हर हर
नवसंवत्सर! नवसंवत्सर!


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आप सभी को गुड़ी पड़वा और नवसंवत्सर की पूर्व संध्या पर ढेर सारी शुभकामनाएँ, हार्दिक बधाई। नववर्ष मंगलमय हो।

18.3.14

रंगों का इंद्रधनुष


होली में बाबा देवर लागें। जैसे ही यह वाक्य कान में पड़ा मैं पूरी तरह ज़वान हो गया। जब बाबा देवर हो सकते हैं तो हम क्यों नहीं? हम तो अभी वैसे भी ज़वान हैं। अब समस्या यह थी कि ज़वान तो हो गये मगर ज़वानी दिखाई कहाँ जाय पुरानी बीबी को ज़वानी दिखाने से क्या लाभ ? नई मिले तो कैसे मिले ? पड़ोस में ताका-झांकी ठीक नहीं। समय भी कम था। बहुत समय तो यही समझने में चला गया कि मैं ज़वान हूँ। वैसे भी पाँच दिन की होली एक दिन में सिमट चुकी है। होली के जाते ही जवानी कहीँ चली न जाय। बुढ्ढे हो चले दोस्तों को बताया तो वे मारे खुशी के चहकने लगे। कहने लगे.. हाँ यार! कुछ हमको भी ऐसा ही महसूस हो रहा है। हम भी नई ताकत महसूस कर रहे हैं। सब भोलेनाथ की कृपा है। चलो पहले उनका आशीर्वाद ले लिया जाय। उनको थैंक्यू बोल दिया जाय। 

हम बाबा के दरबार में पहुँचे तो वहाँ भीड़ अधिक नहीं थी लेकिन आरती की तैयारी चल रही थी। शिवलिंग की सफाई हो रही थी। दर्शन हुआ मगर लिंग पकड़ने का क्या, छूने का भी अवसर नहीं मिला। पुजारियों का एकाधिकार था। दोस्त गिड़गिड़ाते रहे मगर उन्होने एक न मानी। उनसे उलझने की हिम्मत नहीं थी। गोरे-गोरे मुष्टंडे। हों भी क्यों न! हम एक बार पर भर के लिए छू कर नई उर्जा का एहसास करते हैं, वे तो हरदम उसी में डूबे रहते हैं। 

वहाँ से निकलकर दालमंडी गये। धर्म से काम की गली। जैसे विश्वनाथ गली धर्म की गली है वैसे दालमंडी कभी वेश्याओं, मुजरेवालियों के लिए जाना जाता था। अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष सभी की गलियाँ चौक से होकर निकलती हैं। यह आप पर निर्भर है कि आप किस गली मुड़ना चाहते हैं। हम बाबा की कृपा से जवान हुए थे। सो उनका आशीर्वाद लेकर धर्म गली से काम गली की ओर मुड़ गये। वैसे अब यहाँ न मुजरा होता है न मुजरेवालियाँ मिलती हैं। काम गली, अर्थ गली में परिवर्तित हो चुकी है। बड़ा बाजार लगता है। सभी प्रकार के सामान उचित दाम पर मिल जाते हैं। बनारस में टोपी पहनी और अपनी दूसरे को पहनाई जाती है। हमे होली के लिए नई टोपियों की तलाश थी। 

गली में घुसते ही किशोरावस्था की नादानियाँ कौंध जाती हैं। यार दोस्त होली के दिन रंग खेलते-खेलते इस गली में घुस जाते थे। वे भी नये लौंडों को देखकर मस्त होती थीं। न वे नीचे उतरतीं न हममे सीढ़ियाँ चढ़ने की औकात थी। बस खिड़की से ही गालियों, इशारों का आदान-प्रदान होता था। जब पानी सर से ऊपर हो गुजरने लगता झट से कई खिड़कियाँ एक साथ खुलतीं और हम पर रंगों की बरसात हो जाती। हम और मस्ती में किलकते-उछलते । हम तब हटते जब खिलड़कियाँ पूरी तरह से बंद हो जातीं या फिर हमसे जोशिले ताकतवर लड़कों का बड़ा झुंड हमे वहाँ से भागने के लिए मजबूर कर देता। 

टोपियाँ लेकर गोदोलिया चौराहे से भाँग-ठंडई छानकर, मलाई रोल चाभते जब हम दशाश्वमेध घाट गये तो वहाँ का नजारा बड़ा फीका-फीका नजर आया। हम होरियाये मूड में दशाश्वमेध घाट पहुँचे थे मगर कुछ को छोड़कर बाकी गंगा आरती के बाद वाले सन्नाटे में डूबे हुए थे। दूसरे यात्री गंगा आरती के बाद लौट रहे थे। कुछ विदेशी घाट की सीढ़ियों पर रंग पोताये बैठे, बतियाते दिखे। महिलाएँ भी दिख रही थीं। हम जब छोटे थे, रंगभरी एकादशी से होली के दिन तक महिलाएँ घर से बाहर नहीं निकलती थीं। गली-गली में माहौल इतना गाली-गलौज, होली के हुड़दंग का रहता था कि वे चाहकर भी नहीं निकल पाती थीं। घर के मुखिया भी निकलने की इजाजत नहीं देते थे। अब दृष्य काफी बदल चुका है। महिलाएँ जमकर खरीददारी करती हैं, कहीं-कहीं बाहर निकलकर रंग भी खेलती हैं। 

माहौल देखकर मुझे लगा कि होली को राजनीति की नज़र लग चुकी है। टेढ़ीनीम पर भाजपाई थालियों में गुझिया, मगही पान पर मोदी के छोटे-छोटे चित्र सटाये, दुकान सजाये बैठे थे। अस्सी भी पूरी तरह राजनैतिक माहौल में डूबा हुआ था। पिछले साल की तरह होली के मूड में नहीं था। रास्ते में होलिका सजी थी। बाजार खूब सजे थे। भीड़ थी। मुझे लगा होली को सभी ने अपनी-अपनी मर्जी से बांट लिया है। कुछ बाजार ले गये हैं, कुछ राजनीतिज्ञों को चढ़ा आये हैं, कुछ आभासी दुनियाँ में सिमट गये हैं, कुछ कवि सम्मेलन के नाम पर नौटंकी कर रहे हैं और कुछ हमारे जैसे जबरी जवान बने, किसी अंग्रेज बुढ़िया के बालों जैसी टोपी लगाये गली-गली घूम रहे हैं। सात रंग अलग-अलग दिखें तो समझ में नहीं आते, मिल जायं तो इंद्रधनुष बन जाते हैं। रंगों का इंद्रधनुष मुझे तो नहीं दिखा..आपको दिखा हो तो आपको बहुत बधाई। 


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8.3.14

मच्छर और आदमी


वैसे तो मुझे सभी प्यार करते हैं मगर सबसे अधिक मच्छर करते हैं। मैं किसी को मच्छर की तरह प्यार नहीं कर पाता। मैं जब भी किसी को प्यार करने जाता हूँ आदमी बन जाता हूँ। आदमी के घर पैदा होने के बावजूद आदमी बने रहना मेरी कमजोरी मान लीजिए। वैसे धरती में कई आदमी हैं जो मुझे मच्छर की तरह प्यार करते हैं मगर मुझे मच्छर का प्यार अधिक अच्छा लगता है। इसके प्यार में कोई शंका नहीं रहती। जब मुझे प्यार करवाने का मन नहीं करता मैं आसानी से खुद को मच्छरदानी में छुपा सकता हूँ। आदमी के प्यार में यह सुख नसीब नहीं होता। आदमी जब प्यार करके उड़ जाते हैं तभी मैं  जान पाता हूँ कि वे मुझे मच्छर की तरह प्यार कर रहे थे!

जैसे मच्छर मच्छर से प्यार नहीं करता वैसे मुझे लगता है आदमी भी आदमी से प्यार नहीं करता।  मच्छर आदमी से, आदमी निरीह जानवरों से अधिक प्यार करते हैं। अब आप कहेंगे मच्छर आपको कैसे प्यार करते हैं? इसका उत्तर बड़ा आसान है। आप एक ही उदाहरण से समझ जायेंगे। जैसे नेता जनता से प्यार करता है वैसे ही मच्छर मुझसे प्यार करते हैं। एक नेता दूसरे नेता को शक की नज़रों से देखता है मगर जनता से बहुत प्यार करता है। मुझे ही नहीं आम आदमियों को भी नेता का प्यार अच्छा लगता है। तभी आम आदमी आजकल नेता बनने की जुगत में लगे हैं।

लोग जातिवाद और धर्मवाद की दुहाई देते नहीं थकते। एक दूसरे पर जातिवाद का, धार्मिक पक्षधरता का आरोप लगाते हैं मगर मैं जानता हूँ कि जैसे मच्छर मच्छर से प्यार नहीं करते, आदमी आदमी से प्यार नहीं करते, नेता नेता से प्यार नहीं करते वैसे ही कोई जाति अपने जाति से प्यार नहीं करती। जाति और धर्म का लबादा ओढ़े आदमी साधारण आदमी से कुछ ज्यादा खतरनाक, कुछ ज्यादा हिंसक हो जाता है। कभी-कभी मुझे शक लगने लगता है कि आदमी अपनी मक्कारी छुपाने और असुरक्षा के भय से धर्म और जाति का लबादा ओढ़े रहता है। वरना क्या कारण है कि अवसर मिलते ही अपनी जाति पर भी अमानवीय हरकत करने से बाज नहीं आता?

आपने कौओँ को लड़ते देखा होगा। कुत्तों को एक हड्डी के लिए आपस में गुर्राते देखा होगा। पंडों को आपस में जजमान के लिए झगड़ते देखा होगा। इतने उदाहरण होने के बावजूद पता नहीं क्यों लोग एक दूसरे पर जातिवादिता का, सांप्रदायिकत का आरोप लगाते हैं! जिस्म, भूख और भोजन के बीच परस्पर जो संबंध है, वही संबंध एक जीव का दूसरे जीव से होता है। आदमी से इतर दूसरे प्रकार के जीव इस संबंध को खुलेआम उजागर कर देते हैं मगर आदमी नहीं कर पाता। वह सोचता है मैं इन जीव जंतुओं से महान एक खास जीव हूँ जो सिर्फ खा ने और मैथुन के लिए नहीं बना है। गर्व कहता है-हम खाने के लिए नहीं जीते, जीने के लिए खाते हैं। मगर जब करने में आता है तो कभी निठारी, कभी निर्भया कांड कर डालता है! शर्मिंदा भी होता है। एक पकड़े जाने पर शर्मिंदा होता है, दूसरे जो पकड़े नहीं जाते वे आदमी होने पर शर्मिंदा होते हैं। झूठ का पकड़ा जाना हमेशा शर्मिंदगी का कारण होता है लेकिन कभी-कभी अपवाद भी होते हैं। झूठ पकड़े जाने पर भी कुछ लोग स्वीकार करने में पूरी उमर गुजार देते हैं। कानूनन जब उनका व्यभिचार सिद्ध हो जाता है तो वे स्वीकार करके दूसरे आरोप से वंचित, इज्जतदार आदमियों पर एहसान करते हैं। कुछ निर्लज्ज मरते दम तक लड़ते रहते हैं। पकड़े जाने के बावजूद आशा नहीं छोड़ते, जेल में ही राम-राम जपते रहते हैं। दूसरे जीव इन सभी अपराध बोध से मुक्त हो जीवन का आनंद लेते हैं।  न महानता का दंभ भरते हैं न शर्मिंदा होते हैं।

मुझे आदमी से अधिक इन जीव-जंतुओ पर प्यार आ रहा है। इनकी कथनी और करनी में कोई फर्क नज़र नहीं आता। सांप देखते ही सावधान हो जाता हूँ, मुर्गा देखते ही लालच लगने लगता है। मुझे खुद से मच्छरों की नीयत साफ़ दिख रही है। गली के कुत्ते का रोटी के लिए दौड़ना और मोहल्ले में किसी अजनबी के आने पर देर तक भौंकना याद आ रहा है।

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