25.6.17

वही घर है, वही माँ हैं, वही बाबूजी

लोहे के घर में
पापा
बेटे को सुला रहे हैं कंधे पर
हिल रहे हैं, हिला रहे हैं
बेटा
ले रहा है मजा
खुली आंखों से!
पापा
सोच रहे हैं
सो चुका है बेटा
लिटाना चाहते हैं बर्थ पर
बेटा हँसता है
पापा
मुस्कुराकर डाँटते हैं..
नहीं मानेगा?

धरती पर
जब तक बच्चे हैं
बचपना है
जब तक युवा हैं
जवानी है
कोई कहीं नहीं गया
वही गलियाँ हैं
वही घर है
वही
माँ हैं

वही
बाबूजी।
................

6 comments:

  1. वाह, बहुत सुन्दर

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  2. वाह सारा संसार इसी में जीवित है

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (27-06-2017) को
    "कोविन्द है...गोविन्द नहीं" (चर्चा अंक-2650)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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