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27.10.19

दिवाली की सफाई में....


पत्नी की रहनुमाई में,
दिवाली की सफाई में,
दृश्य एक दिखलाता हूँ
क्या पाया, बतलाता हूँ।

एक पुराना बक्सा था
जिसमें मेरा कब्जा था
जब बक्सा मैने खोला
धक से मेरा दिल डोला

एक गुलाबी रुमाल मिला
तीर चुभा दिलदार मिला
और टटोला भीतर तो
अक्षर अक्षर प्यार मिला

खत में प्यारी बातें थीं
धूप छाँव की यादें थीं
'रानू' की किताब भी थी
मर मिटने की बातें थीं।

बहुत पुराने पन्ने थे
पलटा मानों गहने थे
दिल मे अब फुलझड़ियाँ थीं
चूर-चूर  पँखुड़ियाँ थीं
खोया, हंसी खयालों में
मयकश डूबा, प्यालों में

बिजली चमकी, घन गरजे
कहाँ देर से हो उलझे?
अपना बक्सा बन्द करो,
चलो, उठो, अब वहाँ चढ़ो!

तुमसे काम नहीं होता
सब आसान नहीं होता
मकड़ी जाले साफ करो
यार! हमें तुम माफ करो

जब कुछ काम नहीं करना
व्यर्थ यहाँ क्यों बैठे हो?
दो-कौड़ी किताब है वह
उसमें अब क्यों उलझे हो?

मैने कहा.लो! खुद देखो
ये सब खत तुम्हारे हैं!
यह किताब तो मेरी है,
इसमें फूल तुम्हारे हैं

घर के जाले छोड़ो तुम
मन के जाले साफ करो
इस दीवाली में साथी
प्रेम दीप भी एक धरो।
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