महाशिवरात्रि के दिन 'बाबा' का दर्शन कर लौट रहा था. सुबह से बारिश हो रही थी और पूरी तरह भींग चुका था. गोदौलिया चौराहे पर एक मित्र मिल गया. वह जानता था कि मैं कविता लिखता हूँ और शतरंज भी खेलता हूँ. वह मुझसे भांग और ठंडाई पीने का अनुरोध करने लगा. मैं घबड़ा गया. बोला, " यह तो संभव ही नहीं है. भांग मुझे सूट नहीं करता." वह नहीं माना, मुझे जबरदस्ती ठंडाई की दुकान पर ले गया. भांग खिलाई, ठंडाई पिलाया और जो कहा वह हू-ब-हू यहाँ लिख रहा हूँ. आशा है आपको मजा आयेगा, बनारस की मस्ती और काशिका बोली से रू-ब-रू होने का अवसर मिलेगा. प्रस्तुत है कविता - भांग में बहुत मजा हौ. आप चाहें तो भांग छानकर भी 'वेलेंटाइन' का मजा ले सकते हैं.
भांग में बहुत मजा हौ

भांग छान के जब लिखबा तs लिखबा ऊँची चीज
जबरी खिलाइब भांग रजा तू हौवा ऊँची चीज
सुतबा तs सुतले रह जइबा उठबा तs नचबा राजा
उड़बा नील गगन में जा के परियन से मिलबा राजा
भांग में बहुत मजा हौ.
खेलबा जब शतरंज तs चलबा घोड़ा साढ़े तीन
हार के पाकिस्तानी भगलन अब पटकाई चीन
तोहरे मन शहनाई बाजी भौजी के लागी बीन
देर रात तक खेलबा तs पटकाई खाली टीन
भांग में बहुत मजा हौ.
लइकन के महतारी तोड़ी तू उनके पुचकरबs
उठा के गोदी बहुत प्यार से उनसे जब ई पुछबs
केकर बेतवा हौवा बोला पापा क कि अम्मा कs
तोहार नाम केहू ना लेई बोलिहैं खाली अम्मा कs
भांग में बहुत मजा हौ. ..




