2.5.12

गंगा चित्र-4

सुनिये ! क्या कहते हैं गंगा घाट के ये परिंदे।








देखा न ! हमारा परिवार कितना बड़ा है !! कितने बड़े महल में रहते हैं हम !!! तुम शायद नहीं जानते। यह महाराजा चेतसिंह का किला है। इसका निर्माण काशी राज्य के संस्थापक राजा बलवंत सिंह ने कराया था। घाट और महल शिवाला मोहल्ले में है इसलिए इसे शिवाला घाट भी कहते हैं। 1781 में अंग्रेजों से युद्ध में हारकर काशी नरेश चेतसिंह किला छोड़कर भाग गये थे। तब से लगभग सवा सौ साल तक यह अंग्रेजों के अधीन रहा। फिर 19वीं शती के उत्तरार्द्ध में महाराजा प्रभु नारायण सिंह ने यह किला पुनः प्राप्त कर लिया। है न शानदार ? सैकड़ों वर्षों से गंगा की बाढ़ झेल रहा है मगर जस का तस खड़ा है। तुमने वृक्षों को काट दिया। अब गंगा के घाट हमारे घर बने हैं। सुना है तुम सब गंगा मैया के भी पीछे पड़े हो ! कितने मूर्ख हो !! यह नहीं रहेंगी तो हम क्या, तुम भी नहीं बचोगे। 



28.4.12

नग्नता


एक समय था
जब
हम सभी नंगे थे

सभी के पास
पेट था
मुँह था
और थी
कभी न खत्म होने वाली
भूख

भूख ने श्रम
श्रम ने भोजन
भोजन ने जीवन
जीवन ने भय
और भय ने
ईश्वर का ज्ञान दिया।

तब
जब हमने वस्त्र नहीं देखे थे
तो हमारे भगवान कहाँ से पहनते !
वे भी
हमारी तरह
नंगे थे।

मनुष्य ने समाज
समाज ने सभ्यता
सभ्यता ने संस्कृति को जन्म दिया

धीरे-धीरे
सभी वस्त्रधारी हो गये
हम भी
तुम भी
हमारे भगवान भी।

हम अपने करिश्मे पर इतराने लगे
मगर हमारे भगवान
हम सभ्य लोगों को देख-देख मुस्कराने लगे
यदा कदा
मस्ती में
वंशी बजाने लगे

हममे कुछ ऐसे भी हुए
जिन्हें वंशी की धुन सुनाई पड़ी
सत्य का ज्ञान हुआ

जो हाथों में दर्पण लिए
सभ्य लोगों को बताने लगे
तुम नंगे हो ! तुम नंगे हो !! तुम नंगे हो !!!
तुम भी ! तुम भी !! तुम भी !!!

हम इतने सभ्य थे
कि हमने
दर्पण दिखाने वालों को
सूली पर चढ़ा दिया

मगर अफसोस
सब कुछ जानते हुए
आज भी मैं
दर्पण के समक्ष खड़े होने की
हिम्मत नहीं जुटा पाता
लगता है
वह
दिखा देगा मुझे
मेरी नग्नता !


नोटः- मुझे लगा कि यह कविता बिना किसी संदर्भ और पूर्वाग्रह के पढ़ी जानी चाहिए। संदर्भ देना गलत था। इसीलिए पहले दिया गया संदर्भ हटा रहा हूँ। आपको होने वाली असुविधा के लिए खेद है। कमेंट बॉक्स अपनी नादानी से बंद कर दिया था। अब खोल रहा हूँ।..धन्यवाद।

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26.4.12

हमारी सरकार !


मंदिर के सामने
पीपल के नीचे
पक्के फर्श पर
वह
प्रतिदिन
निर्धारित समय पर
बिखेरता है
पंछियों के लिए दाना।

थोड़ी ही देर में
आते हैं
ढेर सारे कौए

काँव-काँव, काँव-काँव
चीखते, झपटते
चुग जाते हैं
पूरा का पूरा।

यदा कदा
घुस पाती है
एक गिलहरी भी
लेकिन छोटे पंछी
दूर खड़े
ललचाई नज़रों से
बस देखते/चहचहाते रह जाते हैं।

कौए
दाना चुगने के बाद
बूंद बूंद टपकते  
सरकारी टोंटी से
पीते हैं
पानी भी।

इन सबके बावजूद
वह
प्रतिदिन
बिखेरता है
पंछियों के लिए दाने
उसे देखकर
चहचहाने लगते हैं
निरीह पंछी  
मुझे लगता है
कह रहे हैं...
हमारी सरकार ! हमारी सरकार !

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24.4.12

गंगा चित्र-2

कोई पूरब से आता है, कोई आता पश्चिम से.........
धुलते हैं सब पाप उसी के, जो होते मन के चंगे
हर गंगे, हर हर गंगे।

23.4.12

गंगा चित्र-1

तेरे आगे सब नंगे


हर गंगे, हर हर गंगे।



21.4.12

तेरे आगे सब नंगे



तेरे आगे सब नंगे
हर गंगे, हर हर गंगे।

कोई पूरब से आता है
कोई आता पश्चिम से
कोई उत्तर से आता है
कोई आता दक्षिण से

धुलते हैं सब पाप उसी के
जो होते मन के चंगे।

एक नदी के नहीं ये झगड़े
तुमने माँ को बाँध दिया!
देख सको तो देखो पगले
ईश्वर ने दो आँख दिया!

कहीं धर्म के, कहीं चर्म के
चलते हैं गोरख धंधे।

जमके धोये हाथ उसी ने
जिसने गंगा साफ किया!
जिसके जिम्मे पहरेदारी
उसने गोता मार लिया!

माँ की गरदन टीप रहे हैं
कलजुग के अच्छे बंदे।

तनकर देखो तो मैली है
झुककर देखो तो दर्पण
तुम न करोगे तेरे अपने
कर देंगे तेरा तर्पण।

आ जायेगा चैन कि जिस दिन
मिल जायेंगी माँ गंगे।

हर गंगे, हर हर गंगे 
तेरे आगे सब नंगे।

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