26.4.12

हमारी सरकार !


मंदिर के सामने
पीपल के नीचे
पक्के फर्श पर
वह
प्रतिदिन
निर्धारित समय पर
बिखेरता है
पंछियों के लिए दाना।

थोड़ी ही देर में
आते हैं
ढेर सारे कौए

काँव-काँव, काँव-काँव
चीखते, झपटते
चुग जाते हैं
पूरा का पूरा।

यदा कदा
घुस पाती है
एक गिलहरी भी
लेकिन छोटे पंछी
दूर खड़े
ललचाई नज़रों से
बस देखते/चहचहाते रह जाते हैं।

कौए
दाना चुगने के बाद
बूंद बूंद टपकते  
सरकारी टोंटी से
पीते हैं
पानी भी।

इन सबके बावजूद
वह
प्रतिदिन
बिखेरता है
पंछियों के लिए दाने
उसे देखकर
चहचहाने लगते हैं
निरीह पंछी  
मुझे लगता है
कह रहे हैं...
हमारी सरकार ! हमारी सरकार !

 ...................................

29 comments:

  1. पंछियों के लिए दाने
    गिराए जाते हैं समभाव से,
    पर उन्हें बलपूर्वक चुगता है कौवा,
    आदमियों के लिए दाने गिराने और
    समेटने वाले एक ही गुट के होते हैं
    इसलिए यहाँ केवल निर्बल रोते हैं !

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    1. (१) अपात्र की मदद करना अनुचित है ! उनके दाने अकारथ हुए !

      (२) संतोष जी ने नग्न चित्रों के सार्वजनिक प्रकाशन के विरूद्ध अभियान छेड़ा है फिर भी आपने वस्त्रहीनों के चित्र छापे हैं :)

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  2. ऊपर-ऊपर पी जाते हैं जो पीने वाले हैं,
    कहते ऐसे ही जीते हैं जो जीने वाले हैं..!!

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  3. वो बेदर्द है जालिम है
    जो दानों का हश्र देखकर
    भी रोज बिखरा जाता है दाने ...
    कहीं कौओं को उसी ने तो नहीं पाला है ?

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  4. बिम्बों के माध्यम से घातक प्रहार किया है..

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  5. दाने-दाने पे लिखा है खाने/पाने वाले का नाम.

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  6. मानों एक भोक्‍ता हो और एक दृष्‍टा (लेकिन निरपेक्ष नहीं)

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  7. बहुत सुन्दर प्रस्तुति ।

    सिस्टम पर सटीक चोट ।

    आभार भाई जी ।।


    कौवा मोती खा रहा, दाना तो है खीज ।

    वंचित वंचित ही रहे, ताकत की तदबीज ।


    ताकत की तदबीज, चतुर सप्लाई सिस्टम ।

    कौआ धूर्त दलाल, झपट ले सब कुछ हरदम ।


    काँव-काँव माहौल, जमाता कुर्सी-किस्सा ।

    है अपनी सरकार, लूट ले सबका हिस्सा ।।

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  8. जिसकी लाठी , उसी की भैंस .
    हालाँकि आखिरी पंक्ति में सन्देश कुछ और ही है .

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  9. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति |
    शुक्रवारीय चर्चा मंच पर ||

    सादर

    charchamanch.blogspot.com

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  10. .
    .
    .

    रोचक सुंदर कविता ।

    धन्यवाद!

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  11. वाह....................
    पर्यावरण से होते हुए खोखले आवरण पर आ गयी रचना....
    बहुत खूब...


    सादर

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  12. शायद वह बिखेरता हो दाने कौवो के लिए ही..कि कहीं उसकी मुडेर पर बैठ कर कांव काव न करें वो.और वह बच जाये कुछ अवांछित घर में घुसने वाले मेहमानों से :).

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  13. बेहतरीन और शानदार बिम्बों के सहारे अत्यंत ही सार्थक पोस्ट ।

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  14. कौव्वे तो दाने चुगने में व्यस्त है...नारे लगा कर शोर मचाने के लिए दाना डाल कर नन्हे पंछियों को बुलाना जरूरी है..
    अच्छी कविता

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  15. khubsurat bimbo ka prayog.... :)
    aisa hi kuchh ho raha hai ....

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  16. बहुत सुन्दर और सार्थक अभिव्यक्ति...!

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  17. बेध डाला ...
    बहुत गहन .. प्रतीकों के माध्यम से

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  18. हर जगह उअही स्थिति है, दाना तो कौआ चुग जाते हैं, छोटे पक्षी ताकते ही रह जाते हैं।

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  19. वाह ! बहुत सुन्दर रचना.ग़रीबों के नाम से बहुत कार्यक्रम चलते हैं मगर वे तो देखते रह जाते हैं.छोटे से उदाहरण से बहुत बड़ी बात कह दिया आपने.

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  20. बड़ों की धमक में छोटे यूँ ही ललचाकर रह जाती है ..
    बहुत ही सुन्दर यथार्थ चित्रण ...

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  21. बड़ी ऊंची बात कह दी सिरीमानजी ने।

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  22. फेंकती है दाने चार
    ले जाते मुखिया-सरदार
    जनता को सब कुछ बेकार
    जी सरकार, हाँ सरकार!

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  23. फर्ज तो पूरा निभ ही रहा है, और क्या जान लोगे सर..र की?

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  24. bahut gahan aur ek karara vyang bhi vastvik sthititiyon par....sarkar gareebon ke liye sekdo yojnaye banati hai par unka fayda utha lete hai bicholiye....
    मत भेद न बने मन भेद -A post for all bloggers

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  25. कभी कभी फ़र्ज़ कों इतिश्री समझ लेते हैं ... पूरा फर्ज शायद तभी पूर्ण होता है जब दाना पंछियों रक् पहुंचे ...

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