15.10.10

उपदेश के दो हजार सात सौ साल बाद


सुबह
सारनाथ के लॉन में
कर रही थीं योगा
शांति की तलाश में आई
दो गोरी, प्रौढ़, विदेशी महिलाएँ
इक दूजे के आमने-सामने खड़ी
हिला रही थीं हाथ
नीचे से ऊपर, ऊपर से नीचे
बज रही थी धुन
ओम नमः शिवाय।

दो ग्रामीण महिलाएँ
एक स्कूली छात्र
कॉलोनी के एक वृद्ध
तोड़ रहे थे फूल
पूजा के लिए
चाहते थे पाना
कष्ट से मुक्ति।


घूम रहे थे गोल-गोल
मंदिर के चारों ओर
मार्निंग वॉकर।

कर रहा था
बुद्ध की परिक्रमा
श्रीलंकाई तीर्थ यात्रियों का जत्था
जप रहे थे श्रद्धालु
समझ में न आने वाले मंत्र
हाथों में ले
ताजे कमल के पुष्प
सुनाई दे रहा था उद्घोष....
सा.s.s.धु, सा.s.s.धु, सा.s.s.धु ।

कर रहे थे
फूलों की बिक्री का हिसाब
गिन रहे थे सिक्के
गाँव के किशोर।

मंदिर के बाहर
दुत्कारे जा रहे थे भिखारी
झुकी कमर, लाठी टेक
मुश्किल से चल पा रहा था
एक वृद्ध
गुजरा था जनाजा
अभी-अभी
चीख रहे थे लोग
राम नाम सत्य है।

मंदिर के भीतर
पीपल के वृक्ष के नीचे
बैठे थे
बुद्ध और उनके पाँच शिष्य
मूर्ति बन।

45 comments:

  1. इतना कड़वा यथार्थ दिखा दिया इस कविता में आपने तो
    अच्छी कविता बन पडी है
    साधुवाद

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  2. बहुत सुन्दर देवेन्द्र जी
    आपकी रचना यथार्थ को खंगाल रही है

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  3. मंदिर का नज़ारा --अद्भुत रूप में प्रस्तुत किया है आपने ।

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  4. सच दिखा दिया, सदियों से यही हाल रहा होगा।

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  5. चुक गया जो बताया था अंत, बुद्ध बस बैठे है मूर्तिमंत॥

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  6. यथार्थपरक रचना। बधाई।

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  7. और बैठे रहेंगे ऐसे ही ...

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  8. 6/10


    पठनीय
    सारगर्भित व मौलिक रचना

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  9. बुद्ध के जाने के बाद उनका पथ-प्रदर्शन भी खत्म हो गया.रह गई तो बस नासमझियाँ.प्रत्येक काल-खंड में नए सतगुरु की आवश्यकता होती है,हम नासमझ ब्यक्तियों के लिये.और कुछ लोग ही पहचान पाते हैं नए सतगुरु को.ये भी उन्ही की प्रेरणा से होता है.मगर ये बहुत आस्चर्य की बात है कि ,ये प्रेरणा भी कुछ लोगों को गुरु कृपा से ही प्राप्त होता है.

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  10. आप भी वहां थे। और हम यहां हैं।

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  11. बहुत दुखद लेकिन सत्या से भरपुर दर्शय खिंचा आप ने इस कविता मे , धन्यवाद

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  12. Panday Ji
    Kya kahun, sab kuch aise abhivyanjit kiya hai jaise ki samne ghatit ho raha ho, yathart ki abhibyaki aasan nahi hoti per aapne yeh kar dikhaya hai ......!
    Aati sunder

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  13. सच तो यही है की मंदिरों में अब बस मुर्तिया ही होती है |बहुत ही अच्छी रचना मेरे सामने तो पूरा सीन आ गया काफी साल हो गये वहा गये मेरे शहर की याद दिला दी | धन्यवाद |

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  14. यथार्थ दर्शन का आभार...उम्दा रचना के माध्यम से.

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  15. यही तो शाश्वत बिम्ब है जीवन के नैरन्तर्य का

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  16. शीर्षक बांचते ही कविता का अहसास होनें लगा था ! आपसे चिंतन का कुछ नाता सा जुड गया लगता है वर्ना कविता यूं महसूस कैसे होती ?


    [ एक निवेदन इस सुन्दर कविता से इक दाग हटाया जाये ,आखिरी पंक्ति में "मुर्ती" के स्थान पर "मूर्ति" करियेगा ]

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  17. अली सा..
    ..कभी-कभी तो अपने आप पर क्रोध आता है..कैसी-कैसी बेवकूफियाँ हो जाती हैं!
    ..आभार।

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  18. कटु सत्य.

    दुर्गा नवमी एवम दशहरा पर्व की हार्दिक बधाई एवम शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  19. त्योहारी पे इस कविता को पढ़ते पढ़ते ऐसा लगता है कि उस धार्मिक स्थान का सजीव चलता-फिरता फोटो खींच कर सजा दिया हो..अलग-अलग कोणों से जीवन्त प्रेम जो उस समय के सारे शेड्स को समाये हो..कविता की गिरह आखिरी पंक्तियों मे खुलती है..

    ..उपदेश के दो हजार सात सौ साल किसी महापुरुष को मूर्ति मे बदल देने के लिये काफ़ी होते हैं..चीजें कर्मकांड मे बदलती जाती हैं...मगर हमारा भरोसा उन लोगों मे दृढ रहता है..जो सिर्फ़ मूर्तियों के परिक्रमा न कर के इतने सालों बाद भी उन्ही आदर्शों को जीते हुए चलते हैं..सारनाथ ऐसी जागती मूर्तियों मे जिंदा रहता है..
    सुंदर कविता के लिये आभार

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  20. बहुत ही कडवा सच
    पर ये उपदेशो का नही गलत मूलभूत शीख का असर है
    बहुत अच्छा लेख आभार
    हमारा भी ब्लॉग पड़े और मार्गदर्शन करे
    http://blondmedia.blogspot.com/2010/10/blog-post_16.

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  21. देवेन्द्र जी,

    शानदार रचना.....बहुत पसंद आई ये रचना..........ये इस देश का दुर्भाग्य ही है की इतने वर्ष बीत जाने पर भी ये देश को बुद्ध को वो सम्मान नहीं दे पाया, जिसके वो हकदार थे .....उन्होंने लोगों को वो मशाल दी जिससे अँधेरे में भटकते लोगो को रौशनी में ले जाया जा सके|

    आखिरी पंक्तियों ने दिल को छू लिया, मुझे नहीं पता की ये लिखते समय आपके मन में क्या रहा होगा.......लेकिन मेरा निष्कर्ष ये कहता है की ये सिर्फ बुद्ध हैं, जो जीवन-मृत्यु और सुख-दुःख से ऊपर उठ चुके हैं |

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  22. @उस्ताद जी-
    इससे अधिक अंक तो मैं किसी परीक्षा में नहीं ला सका...आभार।

    @प्रेम बल्लभ पाण्डेय जी—
    हर काल खण्ड ने सतगुरू दिए हैं, सत्य का ज्ञान कराया है, अफसोस यह कि जब तक वे रहते हैं हम उन्हें पहचान नहीं पाते उनके जाते ही उनके उपदेशों पर चलना छोड़, एक अलग धर्म की स्थापना कर, उनकी मूर्ति बना कर पूजना प्रारंभ कर देते हैं। दुःख, दर्द तो समाज में वैसे के वैसे ही रहते हैं जिनके लिए सतगुरू ने संघर्ष किया था।

    @राजेश जी- ठीक कहा आपने, हम जहाँ के तहाँ हैं।

    @अरंविद जी- यह शास्वत बिंब है. प्रश्न यही है कि यह क्यों है ? क्या कोई महापुरूष हमारी दशा और दिशा नहीं सुधार पाएंगे ? क्या जीवन अगले 2700 वर्षों तक ऐसे ही चलेगा ?

    अपूर्व भाई- महापुरूष मूर्तियों में बदल जाते हैं, उपदेश कर्मकाण्ड में, मनुष्य मात्र के दुःख कम नहीं होते।.. सुंदर पक्ष रखने के लिए आभार।
    ....इसके अतिरिक्त मैं उन सभी का आभारी हूँ जिन्होने मेरा उत्साह बढ़ाया और उनसे निराश जिन्होने कविता नहीं पढ़ी।

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  23. आज तक कुछ अभी नहीं बदला परिस्थितियां जैसी तब थी वैसी ही आज भी हैं. अच्छा सधा हुआ कटाक्ष

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  24. विजय दशमी की हार्दिक शुभकामनाएं.

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  25. काफी सुन्दर और अर्थपूर्ण.

    दशहरा की ढेर सारी शुभकामनाएँ!!

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  26. देवेन्द्र जी ,
    सात चित्र आपने दिखाए ..
    पहला दो गोरी, प्रौढ़, विदेशी महिलाओं का योगा ....
    दूसरा पूजा के फूल तोडना ...
    तीसरा मार्निंग वॉक...
    चौथा बुद्ध की परिक्रमा...
    पांचवां फूलों की बिक्री, सिक्कों का हिसाब ...
    छठा ....दुत्कारे जा रहे भिखारी...
    और जनाजा...

    मैं अभी तक समझ नहीं पाई हूँ बुद्ध और उनके पाँच शिषयों से इनका क्या ताल्लुक है ....
    स्पष्ट कीजियेगा ....भाव क्या हैं ....

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  27. विजय दशमी की बहुत बहुत शुभकामनाएं और बधाई

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  28. @हरकीरत जी-
    ...इसे कहते हैं, समझ के न समझने का अभिनय करना ! आप चाहती हैं कि इस बारे में मैं कुछ और लिखूं..जितना ऊपर लिखा जा चुका है उतना पर्याप्त है। मेरा और मेरे कमेंट में अंकित विद्वान साथियों का कमेंट पढ़ें और आपकी सजा यही है कि पढ़ने के बाद एक बार फिर अपने विचारों से सभी को अवगत कराएँ। अपनी कविता के बारे में कवि को स्वयं अधिक नहीं लिखना चाहिए..मैं यह गलती पहले ही कर चुका हूँ ..अब तो आलोचकों, समीक्षकों का कार्य प्रारंभ हुआ है। अपने कर्तव्यों से मुख मोड़ना अच्छी बात नहीं है।

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  29. बहुत सुन्दर कविता है देवेन्द्र जी, हमेशा की तरह.
    विजयादशमी की अनन्त शुभकामनाएं.

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  30. बहुत सुंदर रचना ... ताज़ी ताज़ी सुबह का एहसास ...

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  31. दिखावे की दुनिया में यह भी एक भय युक्त अज्ञानी दिखावी प्रक्रिया है, और इसी के साक्षात दर्शन मिलते हैं आपकी इस कविता में...........

    संवाहक कथ्य पर हार्दिक बधाई...........

    चन्द्र मोहन गुप्त

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  32. देवेन्द्र जी फिर आई थी .....
    आपका जवाब पढ़ा और शीर्षक से लेकर सारी कवितायेँ भी .....
    सवाल इसलिए पूछा था आपकी और एम् वर्मा जी की कवितायेँ हमेशा गहरे अर्थ लिए होती हैं ....
    कविताओं का सम्पूर्ण अर्थ तो शीर्षक में ही छिपा है ...

    @ओम नमः शिवाय.....की धुन में ....'योग' ....

    @ समझ में न आने वाले मंत्र.....
    सा.s.s.धु, सा.s.s.धु, सा.s.s.धु ।

    @ मंदिर के बाहर...
    दुत्कारे जा रहे थे भिखारी झुकी कमर, लाठी टेक मुश्किल से चल पा रहा था एक वृद्ध....
    और मंदिर के भीतर बुद्ध के उपदेश थे ........
    आपकी कलम हमेशा गंभीर व सशक्त विषयों पर ही चलती है ....

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  33. सुन्दर कविता है।
    सब अपनी अपनी आवश्यकता की वस्तु ढूँढ रहे हैं, जिसके पास जो नहीं है वही।
    एक बार फिर से सारनाथ ले जाने के लिए आभार।
    घुघूती बासूती

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  34. Mandir ke saare nazare tatha aaspaas ghatne waalee ghatnayen aankhon ke aage se ghoom gayeen. Badee hee chitrmay shaili hai aapki.

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  35. बहुत ख़ूब देवेन्द्र जी! आपके ब्लॉग पर आना सार्थक हुआ...भाई!

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  36. सत्य सॉफ, सपाट और कड़ुवा भी होता है .... बहुत प्रभावी लिखा है ... गहरी छाप छोड़ता है ... बहुत ख़ूब देवेन्द्र जी ...

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  37. 2700 सौ साल बाद मूर्ति भी बची है,यही बहुत है।

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  38. जो भगवान हुआ मूर्ति बन कर रह गये जाने क्यों!
    वचन उनके बस छप कर रह गये जाने क्यों

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