21.11.10

मुट्ठी भर धूप

..................................


एक प्रश्न करना था

बूढ़ी होती जा रही संध्या से

न कर सका


एक प्रश्न करना था

उषा की लाली से

न कर सका


न जाने कैसे

दुष्ट सूरज

जान गया सब कुछ

किरणों से मिलकर

लगाने लगा ठहाके

उत्तर आइनों से निकलकर

जलाने लगे

मेरी ही हथेलियॉं।


सहज नहीं है

कैद करना

धूप को

मुट्ठियों में।

34 comments:

  1. सूरज को मुट्ठियों में बंद करना है कठिन
    पर
    दीप कोई बालकर देखें ज़रा
    दो हाथ उसके पास रखकर
    उसको बुझने से बचाएँ..
    प्रश्न का उत्तर मिलेगा बस वहीं से!!
    .
    देवेंद्र जी ये तो तुकबंदी है, पर आपकी कविता बड़ी ही सुंदर लगी!!हर बार की तरह अनोखी!!

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  2. सहज नहीं है
    कैद करना
    धूप को
    मुट्ठियों में।
    देवेन्द्र जी, आपकी रचना हमेशा अपना प्रभाव छोड़ती हैं...ये कविता भी बहुत अच्छी लगी.

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  3. बहुत ही लाज़वाब रचना.

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  4. यह तपती धूप क्यों तपाती है? सुन्दर प्रश्न और कविता।

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  5. badiya kavita Devendra jee........

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  6. सहज नहीं है

    कैद करना

    धूप को

    मुट्ठियों में।
    सच है न मुमकिन है धूप को मुठ्ठियों में कैद करना

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  7. सहज नहीं है
    कैद करना
    धूप को
    मुट्ठियों में।
    हथेलिया गरम हो रही हैं लोगो की, शायद अपने हिस्से का सूरज कैद कर रहे होंगे

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  8. सहज नहीं है
    कैद करना
    धूप को
    मुट्ठियों में।
    sunder abhivyakti............

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  9. कविता पसंद आई। :-)

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  10. सहज नहीं है
    कैद करना
    धूप को
    मुट्ठियों में ...

    बहुत ही लाजवाब पंक्तियाँ हैं ... सच है इस तरक्की को भी प् कर भी सहज रहना आसान नहीं है ....

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  11. देवेन्द्र जी,

    बहुत खूब...हर बार की तरह कम शब्दों में एक बेहतरीन पोस्ट.....सच है जी धूप को बंद करना मुश्किल है....पर एक सवाल ये भी है की क्यूँ धूप को पकड़ना चाहते हैं लोग......क्या वो संसार के हर प्राणी के लिए नहीं है ?

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  12. hmm. suraj ka intelligence department agar govt. of india copy kar le to...:)
    thoda sa majak kar raha tha.
    kavita sunder lagi

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  13. वाह !!!!

    मन को छूती प्रभावशाली रचना/चिंतन !!!!

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  14. कहाँ मुमकिन है?…………शानदार रचना।

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  15. बहुत कठिन है.कुछ समझ न पाया की इस कविता में कवि कहना क्या चाहता है.

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  16. देवेन्द्र जी, इस बार की रचना तो बहुत ही बढ़िया है...सुंदर भावपूर्ण रचना के लिए हार्दिक बधाई..

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  17. हमेशा की तरह अनोखे बिम्ब गढे हैं आपने ! खूबसूरत अंदाजे बयान !

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  18. सहज नहीं है
    कैद करना
    धूप को
    मुट्ठियों में ...

    waahhhhh....bahut sunder abhivyakti

    kavita to khubsurat hai hi, aag (dhoop) se khelne ka andaaz bhi...

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  19. सहज नहीं है

    कैद करना

    धूप को

    मुट्ठियों में।
    बहुत खूब। अच्छी लगी रचना। बधाई।

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  20. हार्दिक बधाई ! एक खूबसूरत अनुभव की खूबसूरत अभिव्यक्ति !!

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  21. सहज नहीं है
    कैद करना
    धूप को
    मुट्ठियों में।
    बहुत खूब, बधाई

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  22. ये घड़ी कहाँ से चुराई आपने ......???
    सुना था पिछली बार आपका कुछ प्लान बन रहा था उड़ाने का ......

    उत्तर आइनों से निकलकर
    जलाने लगे
    मेरी ही हथेलियॉं।

    ये जीवन प्रश्नों से भरा है और उत्तर यूँ ही हथेलियाँ जलाते रहते हैं .....ठहाकों के साथ ....
    ये आग का दरिया ही तो लांघना है .....!!

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  23. रचना में
    भाव छिपे हैं ...
    पढने से सुकून मिलता है .

    शुभकामनाओं के लिए शुक्रिया .

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  24. सहज नहीं है

    कैद करना

    धूप को

    मुट्ठियों में
    क्या बात है देवेन्द्र जी. आपकी कवितायें पढती हूं, तो देर तक सोचती भी हूं, उनके बारे में.

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  25. एक असहज अहसास की सहज अभिव्यक्ति !

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  26. दुष्ट सूरज जान गया सब, किरणों से मिलकर.......सुन्दर रचना. मैंने आपको प्रथम बार पढ़ा है, काफी अच्छा लगा, सुन्दर रचना के लिए आपका, धन्यवाद

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  27. बेहतरीन एवं भावपूर्ण अभिव्यक्ति के लिए सादर बधाई एवं आभार स्वीकार करें |

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  28. सुन्दर रचना।

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  29. सुन्दर अभिव्यक्ति ... असम्भव चाहत पर .... सुन्दर कल्पना . .. आनंद आया पढ़कर ...शुभकामनाएं

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