4.3.11

व्हाट इज योर मोबाइल नम्बर....?


मौज लेने के लिए लिखी गयी  हल्की-फुल्की छोटी कहानी। कृपया गंभीर साहित्यिक मूड में न पढ़ें....

दोनो साथ पढ़ते थे। लड़के के पिता एक कॉलेज के प्रिंसिपल थे तो लड़की की माँ दूरसंचार में अधिकारी। एक दिन लड़के ने लड़की से पूछा - व्हाट इज योर मोबाइल नम्बर ?  लड़की ने झट से अपनी माँ का मोबाइल नम्बर बता दिया जो वह कभी कभार रंग जमाने कॉलेज में लाया करती थी। फिर उसने लड़के से पूछा - व्हाट इज योर मोबाइल नम्बर ?  लड़के ने भी तुरंत अपने पिता का नम्बर बता दिया जो वह कभी कभार कॉलेज में रंग जमाने लाया करता था।

एक शाम ल़ड़की की माँ ने अपने मोबाइल में एक मैसेज पढ़ा - यू आर वेरी ब्युटीफुल ! पढ़कर वह शर्मा गई। सोंचने लगीं। जरूर अरोड़ा का काम होगा ! चार दिन से मुझे घूर रहा था। मन किया कि जोर की फटकार लगाऊँ मगर फिर रूक गई। चलो मजा लेते हैं। उत्तर दिया...थैंक्स ! यू हैंडसम ! इधर लड़के ने मैसेज पढ़ा तो मोबाइल फेंक नाचने लगा। रात में प्रिंसपल ने मैसेज बाक्स खोला तो पढ़कर दंग रह गया ! चिंतित हो गया। मैने क्या किया जो एक लड़की मुझे इस तरह धन्यवाद दे रही है ?  सेंट मैसेज खोला तो पाया....यू आर वेरी ब्युटीफुल !  समझ गया कि मेरा लड़का किसी लड़की के चक्कर में फंस गया है। फिर सोचा कि चलो लड़की देख लेते हैं। सुंदर सुशील होगी तो हर्ज क्या है ! बहुत से लड़के लव मैरिज करते हैं। मेरा लड़का भी करे तो क्या बुरा है ! लिखा....कल शाम छः बजे पार्क में मिलो। हाथ में गुलाब हो तो समझ जाऊंगा कि तुम भी मुझसे प्यार करती हो !

लड़की की माँ ने पढ़ा तो दो फीट उछल गई ! बड़बड़ाई...इस अरोड़ा के बच्चे को तो मजा चखाना ही पड़ेगा ! दूसरे दिन ऑफिस से छूटते ही पहुँच गई पार्क में। शाम का समय। हाथ में गुलाब। ठीक छः बजे प्रिंसपल साहब आये बहू देखने ! पूरा पार्क छान मारा। कहीं कोई षोड़शी न दिखी। दिखी तो एक प्रौढ़ महिला ! एक हाथ में गुलाब लिये ऐसे खड़ी थी मानो कृष्ण के मोरपंख में गुलाब टांकना चाहती हो ! उधर लड़की की माँ परेशान। कहाँ मर गया अरोड़ा का बच्चा ? आना नहीं था तो मुझे क्यों बुलाया ? लोग क्या सोचते होंगे ? वह बुढ्ढा तो मुझे ही घूर रहा है ! उंह..! झल्लाकर गुलाब झाड़ियों में फेंका और पैर पटकती जाने को हुई कि फोन कि घंटी बजी....हैलो..! कौन..?  उधर से आवाज आई.....तुम कहाँ हो ? मैं कितनी देर से पार्क में खड़ा तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ ? चौंककर पलटी तो कोई नहीं ! सिर्फ वही बुढ्ढा फोन में किसी से बात कर रहा था। अचानक ज्ञानचक्षु खुल गये ! पारा सातवें आसमान पर ! ओह…! तो ये हजरत हैं ! दनदनाती पहुँच गईं प्रिंसिपल साहब के पास ! बोलीं...ऐ मिस्टर ! व्हाट इज योर मोबाइल नम्बर ? प्रिंसपल सकपकाये। थोड़ा हकलाये...! क्यों ? क्यों पूछ रही हैं आप ? क..क..कहीं आपका मोबाइल नम्बर यह तो नहीं ? लड़की की माँ ने सुना तो तिलमिला कर बोलीं...हाँ...यही है ! मगर ज्यादा भोले बनने की जरूरत नहीं है। आपको शर्म आनी चाहिए ! किसी भद्र महिला को इस तरह परेशान करते हुए। प्रिंसिपल साहब भी तमतमा गये...शर्म ! मुझे आनी चाहिए ? आपको नहीं ? क्या जरूरत थी आपको मेरे मोबाइल में संदेश भेजने की ? मोबाइल में हैण्डसम ! सामने बद्तमीज ! लड़की की माँ सकपका गईं। उसे इस तरह के जवाब की उम्मीद न थी। बोली...जरूर हमलोगों को कुछ गलतफहमी हो गई है। आइए बैठकर बातें करते हैं। प्रिंसपल बोले...यह ठीक है। चलिए उस रेस्टूरेंट में चलकर एक कप कॉफी पीते हैं। एक घंटे के बाद दोनो जब उस रेस्टूरेंट से निकले तो उनके ठहाकों की गूँज दूर-दूर तक सुनाई दे रही थी।

कुछ दिनो पश्चात। लड़की ने दुःखी होकर लड़के से कहा.....आजकल एक बुढ़ढा रोज मेरे घर आ रहा है। कल वह मेरी माँ से देर तक हंस-हंस कर बातें कर रहा था। मुझे भी देखा। बोला...यदि आपकी लड़की मेरे साथ रहने को तैयार है तो मुझे यह शादी मंजूर है। लड़का चौंका ! अच्छा ! परसों शाम मेरे घर भी एक महिला आई थी। मेरे पिताजी से खूब हिलमिल कर बातें कर रही थी। पूछ रही थी...आपके लड़के को तो कोई आपत्ति नहीं ? पिताजी बोले उसे क्या आपत्ति हो सकती है ! तो बोली...मुझे यह शादी मंजूर है।

लड़की....इसका मतलब तुम्हारे पिता जी दूसरी शादी करना चाहते हैं ?

लड़का...ठीक कह रही हो। तुम्हारी बातों से भी यही लगता है कि तुम्हारी मम्मी दूसरी शादी करना चाहती हैं !

लड़की...कहीं तुम्हारे पिता प्रिंसिपल तो नहीं ?

लड़का...कहीं तुम्हारी मम्मी दूर संचार विभाग में अधिकारी तो नहीं ?

दोनो एक दूसरे से लिपटकर देर तक रोते रहे। घंटो पश्चात दोनो ने फैसला किया कि अब इस दुनियाँ में जीने से कोई फायदा नहीं। कल सुबह राजघाट पुल से गंगा में कूद कर आत्महत्या कर लेते हैं। हाँ फिर हमारे मम्मी-पापा जैसा चाहें वैसा करें। सुबह ठीक छः बजे मिलने का वादा कर दोनो अपने-अपने घर लौट गये। दोनो ने अपना-अपना सुसाइट नोट तैयार किया....

लड़के ने लिखा...पिता जी ! आपको शादी मुबारक हो...गुड बाय !

लड़की ने लिखा..मम्मी ! आपको शादी मुबारक हो...गुड बाय !

दूसरे दिन। लड़की ने माँ को अंतिम बार देखा। माँ गहरी नींद में सो रही थी। टेबल पर शादी के कार्ड रखे थे। मारे गुस्से के तिलमिलाई....ओह ! तो इनलोगों ने शादी के कार्ड भी छपवा लिये ! इस उम्र में धूम धाम से शादी करेंगे ? आँसूओं को जब्त कर धीरे से एक कार्ड उठा लिया।

पुल पर लड़का उसी का इंतजार कर रहा था। लड़की ने लड़के के हाथ में कार्ड रख दिया। लड़का बोला..यह क्या है ? लड़की बोली...मरने से पहले अपने पिताजी के शादी का कार्ड नहीं देखना चाहोगे ? लड़के ने कार्ड खोला। कार्ड में सुनहरे अक्षरों में उसका और लड़की का नाम लिखा हुआ था ! उसने मारे शर्म के लड़की को कार्ड थमाते हुए कहा...मरने से पहले तुम भी देख लो ! कहीं इस बात का अफसोस न रहे कि जीते जी हम अपने माँ-बाप को ठीक से पहचान नहीं सके !

नीचे नदी के बीच धार में नाव पर बैठा बूढ़ा माझी युवा जोड़े को आपस में लिपटते, रोते, हँसते, खिलखिलाते देख झूम कर गाने लगता है....जै गंगा मैया तोहें पियरी चढ़ैबे.......

37 comments:

  1. मोबाइल को लेकर बहुत भड़िया व्यंग्य लिखा है आपने!

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  2. बेहतरीन...सटीक!!

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  3. वाह ये मोबाइल गाथा तो काफी मनोरंजक रही. एक अच्छी शिक्षा भी है इस लघुकथा में. बधाई.

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  4. बहुत रोचक कहानी है। ये मोबाइल भी क्या चीज़ है। शुभकामनायें।

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  5. मनोरंजक और नाटकीय है।

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  6. .जै गंगा मैया तोहें पियरी चढ़ैबे.......
    हमें तो केवल यही भाया.

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  7. वाह!!! बेहतरीन!!! बढ़िया लिखा है.....

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  8. मजेदार कहानी,मगर बहुत साफ़-सुथरा,थोड़ा गडबड भी होता कभी-कभी तो और मजा आता .फिल्म वालों को चाहिए कि कुछ मसाला मिला के एक मजेदार फिल्म बनायें.

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  9. ये कहानी उमड़ती घुमड़ती सुखान्त हो ही गयी !

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  10. आनंद आ गया यार ! सुखद और सुखांत ....
    शुभकामनायें

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  11. देवेन्द्र जी,

    बहुत ही अच्छी लगी ये छोटी सी कहानी......सुन्दर|

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  12. बहुत प्‍यारी और अच्‍छी कहानी।
    आपकी लेखनी ने तो दिल ही जीत लिया।
    आपको FOLLOW किया।

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  13. कल्पना की बढिया उडान...

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  14. आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (05.03.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
    चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

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  15. ये तो मजेदार कथा हो गयी। जय हो टाइप!

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  16. उसने मारे शर्म के लड़की को कार्ड थमाते हुए कहा...

    अब लड़का इतना शर्मीला होगा तो यही होगा ना ।
    खैर बच गए दोनों ।

    दिलचस्प कहानी ।

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  17. बहुत सटीकता पूर्वक धाराप्रवाह लिखा आपने, कहानी एक संदेश भी छोडती है कि जो दिखाई दे रहा है जरा उसको कसौटी पर देख लो कि असलियत क्या है? अगर बिना कार्ड देखें लडका लडकी नदी में कूद जाते तो इस बार होली का मूड खराब हो हाता.:) बहुत सुंदर.

    रामराम.

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  18. हमें भी झुमा दिये देवेन्द्र भैया:)

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  19. बहुत सुंदर कहानी मस्त कर दिया आप ने जी, काश बच्चे भी ऎसे हो ओर मां बाप भी ऎसे हो. धन्यवाद

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  20. मजेदार कहानी, बहुत ही अच्छी लगी ....

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  21. कमाल का सटायर. सुपर्व. बधाइयां.

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  22. मोबाइल गाथा..लाजवाब है..... सर जी!

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  23. हो सकता है आपने मौज लेने के लिए लिखी हो, पर मुझे ये बहुत खूबसूरत कहानी लगी.. साहित्य की समझ तो नहीं लेकिन पढ़कर बहुत अच्छा लगा.. ऐसा लगा जैसे इस पर तो एक शोर्ट फिल्म बनायीं जा सकती है.. वाकई में बहुत अच्छा आईडिया है

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  24. देवेन्द्र पाण्डेय जी ,

    व्हाट इज योर मोबाइल नम्बर....? हल्की-फुल्की छोटी कहानी....
    लेकिन...
    बहुत दिलचस्प ....
    बहुत रोचक ....

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  25. चलिये समझ तो आ गयी, सुखान्त।

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  26. .जै गंगा मैया तोहें पियरी चढ़ैबे....

    jai ho jai ho...mobile baba ki ..:D

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  27. जय और गंगा बड़े खूबसूरत नाम हैं उस युवा जोड़े के :)
    वैसे माहिया , तुहिन तथा प्यारी ( मैया और तोहें ,पियरी ) कौन हैं ? और वे किसे चिढाना चाहते हैं / क्या चढाना चाहते हैं ? :)

    बस एक बात समझ में नहीं आई वो बूढा मांझी कैसे जानता था इन सबको , कहीं वो लड़के का पिता प्रिंसिपल साहब ही तो नहीं था ? फिर उसने नाव चलाना कब सीखा :)

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  28. अच्छी ,सार्थक सोच देती है आपकी कहानी ।

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  29. इस कहानी से एक सीख तो मिलतीं है--अपना मोबाइल किसी के साथ शेयर मत करो…बढ़िया कहानी

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  30. बधाई हो। सुंदर और रोचक कहानी । पढ़ने में मजा आया। कहीं इसलिए तो नहीं कि आपने ऊपर पहले ही लिख दिया है कि गंभीरता से न पढ़ें।

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  31. बहुत दिलचस्प .. व्यंगात्मक शैली में लिखी मोबाइल गाथा ....

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  32. देवेन्द्र जी,
    बहुत दिलचस्प कहानी....
    मजेदार लघुकथा !

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  33. आजकल के बच्चे भावनाओं में जल्दी बह जाते हैं । अगर माता-पिता पर विश्वास कर सकें तो हर ख़ुशी उनके कदमों में होगी।

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  34. यह तो बहुत ही बढ़िया कहानी थी...मूड फ्रेश कर गयी...शुक्रिया

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  35. लगा जैसे अभी अभी फिल्म देखकर उठी हूँ...

    इसे यदि थोडा और विस्तार दे दिया जाए न,तो इतनी जबरदस्त फिल्म बन सकती है इसपर कि पूछिए मत...

    इतने छोटे कलेवर में ही लाजवाब थ्रिल भर दिया आपने...

    बेजोड़ कथा वाचन...बेजोड़...

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