10.4.11

डाल में आ गए जब टिकोरे बहुत......( री पोस्ट )



डाल में आ गए जब टिकोरे बहुत
बाग में छा गए तब छिछोरे बहुत

पेड़ को प्यार का मिल रहा है सिला
मारते पत्थरों से निगोड़े बहुत

धूप में क्या खिली एक नाजुक कली
सबने पीटे शहर में ढिंढोरे बहुत

एक दिन वे भी तोड़े-निचोड़े गए
जिसने थैले शहद के बटोरे बहुत

वक्त पर काम आए खच्चर मेरे
हमने रक्खे थे काबुल के घोड़े बहुत

फूल खिलने लगे फिर उसी ‌शाख में
आंधियों ने जिन्हें कल हिलोरे बहुत
............................

37 comments:

  1. पेड़ को प्यार का मिल रहा है सिला
    मारते पत्थरों से निगोड़े बहुत
    पाण्डेय जी फल वाले पेड़ की किस्मत में यही लिखा है व्यंग्य के पत्थर मार रहे है आप , अच्छी लगी रचना बधाई

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  2. क्या कहने हैं -कवितायी आपके जींस में है !
    लगता है कुछ आपसे कुछ जीन उधार मांगने होंगे !
    और यह दानियों का देश है इसलिए आश्वस्त हूँ !
    पेड़ के टिकोरे अब बड़े हो रहे हैं..
    बचाने उन्हें लोग खड़े हो रहे हैं
    आपकी कवितायी संक्रामक भी है :)

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  3. बहुत खूब देवेन्द्र भाई,

    "पेड़ को प्यार का मिल रहा है सिला
    मारते पत्थरों से निगोड़े बहुत"

    सज्जनता का नाम लेकर पेड़ों की शुरू से ऐसी कंडीशनिंग कर दी जाती है कि पत्थर खाना और फ़ल देना ही उसकी नियति बन जाती है।

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  4. फूल खिलने लगे फिर उसी ‌शाख में
    आंधियों ने जिन्हें कल हिलोरे बहुत
    ............................bahut badhiyaa

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  5. डाल में आ गए जब टिकोरे बहुत
    बाग में छा गए तब छिछोरे बहुत
    रोचक है धन्यवाद |

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  6. बहुत खूबसूरत रचना ..

    पेड़ को प्यार का मिल रहा है सिला
    मारते पत्थरों से निगोड़े बहुत

    धूप में क्या खिली एक नाजुक कली
    सबने पीटे शहर में ढिंढोरे बहुत

    लाजवाब

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  7. वक्त पर काम आए खच्चर मेरे
    हमने रक्खे थे काबुल के घोड़े बहुत
    --
    सुन्दर गजल।

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  8. छिछोरों की संख्या तो टिकोरों से अधिक है।

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  9. डाल में आ गए जब टिकोरे बहुत
    बाग में छा गए तब छिछोरे बहुत...

    अरे वाह क्या खूब कहा है ...बहुत ही सुंदर गजल !

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  10. फूल खिलने लगे फिर उसी ‌शाख में
    आंधियों ने जिन्हें कल हिलोरे बहुत

    सभी शेर गहन अर्थों को अभिव्यक्त कर रहे हैं।
    इस सुंदर ग़ज़ल में जीवन की सीख भी समाहित है।

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  11. बेहतरीन शेर .....

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  12. बहुत अच्छी ग़जल। आभार।

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  13. बहुत बढ़िया....

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  14. धूप में क्या खिली एक नाजुक कली
    सबने पीटे शहर में ढिंढोरे बहुत
    बेजोड़, बहुत सुन्दर

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  15. आपकी रसीली रचना पढ़कर आभास हो गया कि आमों का सीज़न अब आने ही वाला है ।
    बहुत खूब ।

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  16. बहुते सुघर आम क पेड़ औरी टिकोरा वाली कविता .

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  17. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (11-4-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  18. पेड़ को प्यार का मिल रहा है सिला
    मारते पत्थरों से निगोड़े बहुत
    क्या बात है! अद्भुत लिखते हैं आप! हर शेर खूब बहुत खूब.

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  19. डाल में आ गए जब टिकोरे बहुत
    बाग में छा गए तब छिछोरे बहुत...

    टिकोरों की छिछोरों के साथ पुराणी सांठ गाँठ है. एहतियातन इन्तिजाम तगड़े करने पड़ेगें.

    बढ़िया रचना के लिए बधाई.

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  20. बहुत प्यारी ग़ज़ल .आभार.

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  21. देव बाबू,

    शानदार है पोस्ट....शेर उम्दा बन पड़े हैं ......प्रशंसनीय |

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  22. वाह सुंदर रचना है

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  23. फल की तो ना जाने मैं क्या कहूँ,गुठलियों को भी सबने निचोड़े बहुत
    डरावने कुत्ते की दरकार है,ये निगोड़े हैं होते भगोड़े बहुत.

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  24. कहने को रिपोस्ट है पर ताजगी अब भी बरकरार है ! कल ही तेज हवा में कुछ टपके सो पुदीने के साथ उनकी चटनी का आनंद लिया अब कविता पढ़ के टिप्पणी करना भी चाहूँ तो नहीं हो पायेगी , हर शेर पर कमबख्त मुंह में पानी आ जाता है :)

    यूं समझिए कि शेष सारे भाव साइड लाइन हो लिए !

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  25. फूल खिलने लगे फिर उसी ‌शाख में
    आंधियों ने जिन्हें कल हिलोरे बहुत...

    रसीले दशहरी आमों जैसी रसीली रचना।

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  26. डाल में आ गए जब टिकोरे बहुत
    बाग़ में chha गए तब छिछोरे बहुत
    ************************
    मुखड़े ने ही मन बाँध लिया ...........उम्दा ग़ज़ल .........हर शेर लाजवाब

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  27. बहुत प्यारी ग़ज़ल| आभार|
    राम नवमी की शुभकामनाएँ|

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  28. वक्त पर काम आए खच्चर मेरे
    हमने रक्खे थे काबुल के घोड़े बहुत

    फूल खिलने लगे फिर उसी ‌शाख में
    आंधियों ने जिन्हें कल हिलोरे बहुत
    bahut hi shaandaar rachna .bha gayi .

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  29. मुझे लगता है मैंने आपका पहला गीत पढ़ा है ! आनंद आ गया !
    बड़ा प्यारा लिखते हो देवेन्द्र भाई आप !

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  30. प्रिय बंधुवर देवेन्द्र पाण्डेय जी
    सादर सस्नेहाभिवादन !

    बहुत प्यारी है जनाब , आपकी लेखनी !
    पेड़ को प्यार का मिल रहा है सिला
    मारते पत्थरों से निगोड़े बहुत

    बहुत पसंद आया यह शे'र !

    …और क्या कहने है इसके -
    वक्त पर काम आए हैं खच्चर मेरे
    हमने रक्खे थे काबुल के घोड़े बहुत


    अछूता अंदाज़ है … सच !
    ख़ूबसूरत रचना के लिए बहुत बहुत मुबारकबाद !

    * श्रीरामनवमी की शुभकामनाएं ! *

    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  31. अपने बेशक रिपोस्ट की है मगर मैने पहली बार पढी। ये शेर तो बहुत ही अच्छे लगे----
    धूप में क्या खिली एक नाजुक कली
    सबने पीटे शहर में ढिंढोरे बहुत

    वक्त पर काम आए खच्चर मेरे
    हमने रक्खे थे काबुल के घोड़े बहुत
    वाह क्या शेर निकाले हैं। शुभकामनायें।

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  32. बहुत प्यारी ग़ज़ल .आभार.

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  33. मन बाँध लिया ख़ूबसूरत रचना ने ....आनंद आ गया ..आभार

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  34. शानदार! रिटीप है यह ! :)

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