26.11.14

गंगा के तट पर...


मंदिर दिखता
पुजारी दिखते
पंडे दिखते हैं
मंदिर के ऊपर फहराते
झंडे दिखते हैं
भक्तों की लाइन लगती है
गंगा के तट पर
लोटे में गंगा
काँधे पर
डंडे दिखते हैँ।

कहीं गंजेड़ी
कहीं भंगेड़ी
कहीं भिखारी
कहीं शराबी
लोभी, भूखे, भोगी दिखते
बगुले भी योगी
गंगा तट पर भाँति-भाँति के
चित्तर दिखते हैं
सभी चरित्तर मार के डुबकी
पवित्तर दिखते हैं।

कोई पूरब से आता है
कोई पश्चिम से
कोई उत्तर से आता है
कोई दक्खिन से
सब आते हैं पुन्य लूटने
कुछ आते मस्ती में
कुछ सीढ़ी पर उड़ते दिखते
कुछ डूबे कश्ती में
देसी और विदेशी
जोड़े दिखते हैं
धोबी के गदहे भी आकर
घोड़े दिखते हैं।

मिर्जा भाई दाने देते
रोज़ कबूतर को
और रामजी के दाने
कौए खाते हैं
पुन्नू साव खिला रहे हैं
आंटे की गोली
मछली उछल-उछल कर खाती
है कितनी भोली!
उसी घाट पर एक मछेरा
जाल बिछाये है
पाप पुण्य की लहरें लड़तीं
गंगा के तट पर
रोज़ चिताएँ जलती रहतीं
गंगा के तट पर।

15 comments:

  1. बैचेन आत्मा
    बैचेन बैचेन से
    सब कुछ
    आँख के कैमरे में
    कब्जा कर के
    घर पर बैठे अपने
    लिखते दिखते हैं :)

    सुंदर ।

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  2. गंगा माई को मात्र एक सरिता के रूप में, एक पवित्र नदी के रूप में, एक संस्कृति के अंग के रूप में, एक राजनैतिक विषय के रूप में, एक आस्था के रूप में, एक जीवन पद्धति के रूप में न दिखाकर आपने अपने कैमरे की आँख से उसे चित्रित किया है जो आपके कवि-रूप के पीछे छिपे छाया-चित्रकार के व्यक्तित्व को उजागर करता है! सारा दृश्य आँख मूँदकर 'देखा' जा सकता है! यही आपकी विशेषता है देवेन्द्र भाई!!

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  3. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 27-11-2014 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1810 में दिया गया है
    आभार

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  4. गंगा केवल एक सरिता नहीं -एक पूरी जीवन-धारा को धारण करती है ,इतने में ही सब-कुछ कह दिया आपने !

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  5. कविता सटीक है.

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  6. गंगा तट का हूबहू चित्र खीँच कर रख दिया है आपकी कलम ने...

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  7. गंगा के तट पर होती विभिन्न क्रियाक्रमों का चित्रांकण मन को हर्षित करता है।

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  8. ग़ज़ब चित्रण है, सब घटित होते हुये दिखता है

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  9. सुन्दर प्रस्तुति

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  10. गंगा के अनेक रूपों के बीच गंगा की विशेषता यह है कि -
    सभी चरित्तर मार के डुबकी
    पवित्तर दिखते हैं

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  11. सुन्दर प्रस्तुति

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  12. गंगा हमारी जीवनरेखा है . इसकी पावनता को दिव्य और पापनाशिनी बनाकर बहुत से आडम्बरों को जन्म दिया है यही कारण है कि जय गंगा मैया बोलने वाले उसे मलिन बनाने के उपायों से जरा भी परहेज नहीं करते . आपकी कविता इन सभी बातों को साथ लेकर चली है .

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