3.10.15

मुर्दों की बस्ती में....

मुर्दों की बस्ती में
सुबह-सुबह शोर है
सत्य बोलो गत्य है
राम नाम सत्य है!

पुरुष
अत्महत्या का खयाल छोड़
जनाजे को कांधा देने
आगे-आगे दौड़े

औरतें
रुदाली बन
मृत्यु के गीत गाने लगीं

युवा
एक पल के लिए भूल गए
बेरोजगारी का दंश

किशोर
बस्ते का बोझा फेंक
पीछे-पीछे दौड़े

वर्षों पहले मर चुके डाक्टर ने
उनके एक साथी को
मृत क्या घोषित किया
सभी अपने को
जिंदा समझने लगे !
  

4 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (05-10-2015) को "ममता के बदलते अर्थ" (चर्चा अंक-2119) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. वाह पांधे जी एक अलग अंदाज़े बयाँ ...बहुत ही उम्दा | कम शब्दों में बहुत सारा

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  3. सुन्दर प्रस्तुति बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत ही सुन्दर रचना.बहुत बधाई आपको . कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |

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