11.10.15

प्रातः भ्रमण और फेसबुक स्टेटस


20 सितम्बर, 2015 

धमेख स्तूप सारनाथ के सामने बेंच पर लेटा बिन चश्मे के लिख रहा हूँ। 3-4 किमी सड़क पर और कुछ देर घास पर चलने के बाद यहाँ लेटने में खूब आनंद आता है। स्तूप पर बैठे तोतों के झुण्ड बेंच के ऊपर घने नीम के भीतर बैठ खूब टांय-टांय कर रहे हैं। बुलबुल,कोयल और भी दुनियां भर के पंछियों के कलरव के आलावा कुछ देसी आवारा कुत्तों की झाँव-झाँव भी सुनाई पड़ रही है। टहलने वालों की संख्या बहुत कम है। यहां आने के लिए 5 रुपिया टिकट का लगता है इसलिए सभी नहीं आते। तोतों का झुण्ड अभी उड़कर फिर स्तूप पर जा कर चिपक गया। हर तरफ आनंद ही आनंद बिखरा पड़ा है। कुछ मन में उतार रहा हूँ, कुछ आपसे बांट रहा हूँ। शुभ प्रभात।

धूप निकल आई है। घने नीम के वृक्षों से छन छन कर हरे घास में चिपके ओस कणों को चुपके-चुपके पी रही है। एक तिब्बत्ती लड़की अपनी छोटी बहन के साथ मेरी बेंच और स्तूप के बीच में लॉन पर बैठी योगा कर रही है। हर आसन के बाद देर तक अपनी छोटी चोटी को खींचती/  संवारती जा रही है। छोटी बहन लगातार टिपिर-टिपिर आँख हाथ नचा नचा कर तिबती भाषा में जाने क्या बतिया रही है। बड़ी भी खुश है। धूप तेज हो रही है। अब चलता हूँ। कुल्हड़ वाली मस्त चाय की तलाश में। सन्डे सारनाथ की सुबह आनंद दायक रही।

25 सितम्बर, 2015 

घने नीम के नीचे लेटना ही सुखद है, यहाँ तो नीम के कई वृक्ष हैं। दायें बाएं, दूर और दूर। नीम की शाख में तोतों के झुण्ड के झुण्ड तंय-टांय कर रहे हैं। और भी कई पंछियों के कलरव गूँज रहे हैं।  मैं घूमने, ओस में डूबे घांस में नंगे पाँव टहलने के बाद यहां धमेख स्तूप सारनाथ के लॉन में बने लम्बे चबूतरे पर लेटा हूँ। काफी देर हो चुकी है लेकिन यहां से उठने का मन नहीं कर रहा। 

एक पंछी ने जल तरंग छेड़ा है। मैं इनका नाम नहीं जानता। तोता, मैना, कौआ,कोयल,बुलबुल बस यही सब गिने चुने नाम ही जानता हूँ। जल तरंग के बीच कोयल की कूक और कौओं की काँव-काँव भी सुनाई पड़ रही है।सतियानास!  धमेख स्तूप के पीछे बने जैन मंदिर से लाऊड स्पीकर से भजन बजने लगा! उनका ईश्वर प्रसन्न हो रहा होगा लेकिन मेरे आनंद में अब खलल पहुँच रहा है। सवा सतियानास! पीछे बुध्द मंदिर से भी लाउडस्पीकर बजने लगा! बुद्धम शरणम् गच्छामी! जय हो... बुद्ध कितने प्रसन्न हो रहे होंगे! 
अब चलता हूँ। सुप्रभात।

27 सितम्बर, 2015

पंडी जी पिंजड़ेे के तोते को रटा दिए हैं-गोपी कृष्ण कहो। लाउडस्पीकर में रोज बजता रहता है लेकिन धमेख स्तूप सारनाथ के तोते नहीं कहते -"बुद्धम शरणम् गच्छामी"। गुलामी और आजादी के बीच कितना फर्क है! लॉन में दिखा भक्तों का झुण्ड। ये कह रहे थे-बुद्धम शरणम् गच्छामी।

4 अक्टूबर, 2015 

सुबह-सुबह घने नीम के वृक्षों से धमेख स्तूप तक अनवरत उड़ते रहने वाले तोते सन्डे नहीं मनाते। कोई ऑफिस नहीं, कोई छुट्टी नहीं। ये जब स्तूप से उड़कर वापस नीम की शाखों पर बैठते हैं तो कुछ कौए काँव-काँव करने लगते हैं। ऐसा लगता है जैसे नास्तिक पितृपक्ष में ब्राह्मणों के भोजन का उपहास उड़ा रहे हों! तोते भी टांय-टांय कर प्रतिरोध करते हैं। 

धूप तेज हो चली है। घने नीम से अनवरत एक-एक कर पीले पत्ते झर रहे हैं। कोयल के साथ पेड़की ने खूब समा बांधा है।  ये क्या कहते हैं, कुछ समझ में नहीं आता पर यह तो तय है कि बिहार के चुनावी दंगल में लालूजी और मोदी जी की तरह कोई राग नहीं छेड़ रहे।  गिलहरियों का फुदकना बदस्तूर जारी है। लॉन में कई प्रकार के पौधे हैं मगर कोई आपस में नहीं झगड़ते। कोमल लताएँ सूखे वृक्ष के सहारे ऊपर तक चढ़ जाती हैं। कोई किसी की टांग नहीं खींचता। 

झाडू लगाने वाला आ चुका है। अब चलना चाहिए। आज की सुबह रोज की तरह आनंद दायक रही।

5 अक्टूबर, 2015 
आज एक लड़का सारनाथ में हिरणों को ब्रेड खिला रहा था। एक बड़ा पैकेट ब्रेड लिए था और तोड़-तोड़ कर खिलाये जा रहा था। हिरण ब्रेड के लिए धीरे-धीरे जमा हो रहे थे। सुप्रभात।


6 अक्टूबर, 2015
आज सुरुज नारायण रोज की तरह लालम लाल, गोलमटोल निकले। मैंने देखा उन्हें खण्डहरों के उस पार धमेख स्तूप के पीछे। फूलों ने मेरी तेज चाल को देखकर छेड़खानी करी-हैलो! आज फ़ोटू नहीं खींचोगे? बांस के की पत्तियाँ थोड़ी सजग हुईं। मैं सबको मुस्कुराकर देखते हुए आगे बढ़ चला। देसी कुत्ते झुण्ड बनाकर सरसराते हुए बगल से गुजरे। अनार के पौधों के पीछे कुत्तों के जोड़े प्यार करने लगे। तोते टांय-टांय करते नीम से उड़ चले फिर स्तूप की ओर। हिरणों के झुण्ड उदास थे। आज नहीं दिखा उनको ब्रेड खिलाने वाला लड़का। मैं जल्दी में था। सबको देख मुस्कुराते हुए चलता बना। सुप्रभात।

7 अक्टूबर, 2015 

आज न फूलों से कोई बात हुई न चिड़ियों से। कुत्ते भी नहीं दिखे। पहली बार सुना सारनाथ मृगदाव के चीतलों को बोलते हुए। बाउंड्री की जालियों के पास जा कर देखा सभी एक लाइन में सावधान की मुद्रा में खड़े हो कर जोर-जोर से बोल रहे थे। ऐसा लग रहा था कि ये अपने राज्य का राष्ट्र गान गा रहे हैं! ध्यान से देखने पर समझ में आया कि ये अपने किसी भटके हुए साथी को आवाज लगा कर बुला रहे हैं। मैंने उनके आवाज की नकल की तो सब झटके से मेरी ओर देखने लगे। जब तक मैं फ़ोटू खींचता, मुँह फेर लिया।सूरुज नारायण लाल-लाल आँखे तरेरते हुए मुझ पर धूप की वर्षा करने लगे।



धमेख स्तूप पर तोते.कबूतर रोज की तरह उड़ रहे थे। मॉर्निंग वॉक वाले तेज-तेज चल रहे थे। तेज-तेज सीटी बजने की आवाज सुनाई दी तो देखा दो लड़के घास पर चलने वालों को मना कर रहे थे। पता चला इनकी ड्यूटी लगाई गई है कि लोग घास पर न चलें। सही भी है, लोगों के घास में चलने से उसकी ख़ूबसूरती बिगड़ जाती है। ख़ूबसूरती देखभाल मांगती है। यह दूर से देखने और आनंद लेने की चीज है। छेड़खानी किया तो ख़राब हो जायेगी। लोग फूलों को तो क्या, मिलने पर कलियों को भी अपने क्षणिक स्वार्थ में तोड़ कर मसल देते हैं।

इन्ही सब में खोया रहा। अभी घर आया तो याद आया कि आज तो न फूलों से कोई बात हुई न चिड़ियों से! न जाने क्या सोच रही होंगी मेरे बारे में!


12 अक्टूबर, 2015 घर से मात्र 20 मिनट कदम चाल की दूरी पर है सारनाथ बुद्ध मंदिर। प्रातः भ्रमण के साथ लोग मंदिर मे,  मैं मंदिर के बाहर चारों ओर बिखरी प्राकृतिक सुंदरता में भगवान् बुद्ध के दर्शन करता रहता हूँ। मंदिर के सामने लान में एक बड़ा सा चबूतरा है जिसमें चढ़ने के लिए बनी सीढ़ियों की रेलिंग पर बच्चे झूल रहे थे। उनकी फ़ोटू खींची तो वे खुश हो गए। चबूतरे पर प्लास्टिक बिछा कर लोग योगा कर रहे थे। बहुत से लोग थे। ऐसा लग रहा था जैसे किसी भंडारे की भीड़ हो! यहाँ लोग सामूहिक योगा कर के तन की चर्बी घटा रहे थे और मन की भूख मिटा रहे थे।


वहां से चलकर धमेख स्तूप के खण्डहरों वाले पार्क में आये तो मुझे देख फूलों के चेहरे प्रसन्न हो गए या सूर्यदेव की सुनहरी किरणों के प्रभाव से खूबसूरत हो गए, ठीक-ठीक कह नहीं सकता। मैंने जब एक फूल से कहा तुम बहुत खूबसूरत हो लेकिन मुझे तुम्हारा नाम नहीं मालूम! तो वह खिलखिलाकर हंसने लगा। तुम लोग हमारा नाम भी रखते हो!!! मैं उन्हें हँसता छोड़ आगे बढ़ गया। इन्हें क्या मालूम कि मनुष्य जिसे देखता है पहले उसका नाम ही रखता है और जिससे डरता है उसे भगवान मान लेता है।

घूम कर थक गया तो अब मैं लान के पत्थर पर लेटा अपना योगा कर रहा हूँ। सुन रहा हूँ चिड़ियों की बोली,  लिख रहा हूँ मोबाइल से फेसबुक पर। सामने नीम के शाख पर एक गिलहरी काले कौए से फल के लिए झगड़ रही है। सामने दूसरे पेड़ पर एक तोता और एक तोती आपस में चोंच लड़ा रहे हैं। तोता मैना की प्रेम कथाएँ तो खूब पढ़ीं पर उनको चोंच लड़ाते मैंने तो नहीं देखा। अभी एक तोतों का दूसरा झुण्ड टें टें टें टें करते हुए घने नीम में घुस गया। उसमें कितने तोते कितनी तोती होंगे,  मैं नहीं जान पाया।

घर लौटते हुए खंडहरों पर नजरें टिकीं तो ऐसा लगा जैसे इन खण्डहरों में घूमती होंगी और भी  बेचैन आत्माएँ!  लेकिन मुझे कोई दूसरा या दूसरी नहीं मिली या यह भी हो सकता है कि मिली हों, साथ-साथ घूमी हों और हमने इक दूजे को पहचाना ही न हो!



धूप तेज हो गई, अब चलना चाहिए। आनंद दायक रही संडे की सुबह। सुप्रभात खतम हो गया। अब तो शुभ दिन बोलना पड़ेगा।





नोट: फेसबुक में लिखे कुछ स्टेटस को मिलाकर यह पोस्ट बना दिया। 

7 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (12-10-2015) को "प्रातः भ्रमण और फेसबुक स्टेटस" (चर्चा अंक-2127) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बहुत ख़ूबसूरत और भावपूर्ण प्रस्तुति...

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  3. वाह..सारनाथ की सुबहें और पंछियों का साथ..रोचक स्टेट्स..फूलों, हिरणों और बच्चों से मुलाकातें और वह भी बुद्ध की छत्रछाया में..बधाई !

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