16.12.15

गौरैया


जब से 
गायब हुई हैं गौरैया
मेरे शहर के घरों ने
सुबह-शाम चहकना
रात भर
गहरी नींद सोना 
छोड़ दिया है।

देर से उठना
दिन भर
धूल-धुएँ में जीना
जाम सड़क पर
एक हाथ नचाते हुए
दूसरे हाथ से
कान दबाकर
पागलों की तरह बड़बड़ाना
रात भर 
उल्लुओं की तरह जागना
शुरू कर दिया है।

जब से 
गायब हुईं हैं गौरैया
कम हुआ है
धरती का जल स्तर
मैली हुई हैं 
नदियाँ
गायब हो चुके हैं
जलाशय
मरने लगी हैं
तालाब की मछलियाँ।

कई वर्षों बाद
दूसरे शहरों से लौटकर
अजनबी की तरह
गली-गली भटकते
दुखी हो
मित्रों से पूछते
यहाँ के पुरनिये-
यार!
कहाँ चली गई
बनारस की गौरैया ?
साइबेरियन पंछियों के सामने
मुँह दिखाने लायक नहीं रहा
अपना शहर!

5 comments:

  1. apki kavita ne bachpan ki yaad taza kar di jab hamare gharo me gauraiya ka jhund garmiyo me apne ghar banakr kuchh dino ke liye aa jati thi..dhanyawad apko itni khubsurat kavita post karne ke liye.aisi hi kavitaye post karte rahiye.

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    1. आभार सुंदर कमेन्ट के लिए।

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  2. गौरैया के बहाने बदलते हुए समय का प्रभावशाली चित्रण..जलवायु परिवर्तन का कुप्रभाव धरती पर स्पष्ट देखा जा सकता है.. इसका कारण काफी हद तक हम मानव ही हैं

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  3. very sad to know the birds r not there.

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