2.4.16

लोहे का घर -11


आज गोदिया मिली। अभी चली है जौनपुर से। ऑफिस में देर होने पर यह आख़िरी सहारा है। प्रायः सही समय पर छूटती है जौनपुर से। रोज के एक भी यात्री नहीं हैं ‪#‎ट्रेन‬ में या होंगे भी तो मुझसे नहीं मिले। मैं भागा-भागा आया और ट्रेन में बैठ गया। बैठते ही ट्रेन चल दी। सुबह भी यही हुआ था। 49 अप में बैठा और ट्रेन चल दी! आजकल मैं ट्रेन की तरह स्मार्ट हो गया हूँ! वक्त न मैं जाया करता हूँ न ट्रेन! एक मजेदार बात और हो रही है। न टीवी देख पा रहा हूँ न सोसल मीडिया। बड़े सुकून से कट रही है जिंदगी। काम, थकान, भोजन और गहरी नींद। एकदम कोल्हू के बैल की तरह मस्त!


50 डाउन धरा गई आज तो! मुझे लिए बिना भागी जा रही थी, दौड़कर पकड़ लिया। मौसम में जहरीली ठण्ड है। गेहूँ की फसल मछली की तरह खेतों में उलटी पडी है। मायावी काले बादल इंद्रजीत के इशारों पर नाच रहे हों जैसे! अँधेरा-अँधेरा ही दिखता है लोहे के घर की खिड़कियों से।
घर में उजाला है। एक बच्चा खिड़की से बाहर झाँकने का प्रयास कर रहा है। उसके पापा ने फटाक से खिड़की बन्द कर दी। वह भागकर सामने वाली बर्थ पर अपने भाई की पीठ पर लद कर खिड़की से झाँकने लगा। पापा ने वो खिड़की भी बन्द कर दी। अब माँ की गोद में चढ़कर बड़बड़ा रहा है-अबहिन न आई तोहार घर! हमे ठंडी न लगी।
संजय जी मोबाइल में वही पुराना गाना सुन रहे हैं- पद घुँघरू बाँध मीरा नाची थी और हम नाचे बिन घुँघरू के....। ‪#‎ट्रेन‬ स्पीड सें चल रही है। जलालगंज का पुल बीत गया। बारिश से पटरियों में जान आ गई हो जैसे।
दूसरों के गम के प्रति उदासीनता और अपने गम का मातम मनाना हम इंसानों की फितरत है। इंसान क्या शायद प्रकृति में ही यह गुण विद्यमान है। भारत में तो यह उदासीनता और भी गहरी दिखती है। 'कोई नृप होय हमें का हानी!' वाला भाव खूब दिखता है। आम, गेहूँ, सरसों के तेल की मँहगाई का मातम मीडिया अभी कुछ समय बाद मनाएगी, अभी तो वे रो रहे हैं जिनकी खड़ी फसल बरबाद हुई है।

किस्मत अच्छी है। रात 9 बजे प्लेटफॉर्म में आ पाया और सामने 7 बजे आने वाली किसान खड़ी मिली! शायद ‪#‎ट्रेन‬ लेट इसलिये ही होती है कि हम जैसे मजदूर मालिक के बन्धन से मुक्त होने के बाद घर जा सकें। ट्रेन में लेटने के बाद घर की याद आई। फोन से पूछा तो बोला -क्या हाल होगा! जैसी सुबह वैसी शाम। मित्र भी व्यस्त लगते हैं। परेशान या अधिक प्रसन्न होते तो फोन करते। मेरी तरह सभी की गाड़ी पटरी पर चल रही होगी।
ऑफिस से छूटते ही अपनी दूसरी दुनियाँ शुरू होती है। एक नकाब उतरता है, दूसरा चढ़ जाता है। नौकर से आदमी बन जाते हैं। याद आता है कि हमारा भी कोई घर है, पत्नी है, बच्चे हैं। हकीकत की दुनियाँ और आभासी दुनियाँ दो जहाँ के वासी हैं हम। हिंदू हैं, ब्राह्मण है, मस्त हैं, बेचैन हैं हम। खण्ड-खण्ड अखण्ड भारत में पटरी पर तेजी से भागता यह लोहे का घर एहसास कराता है कि भारत के नागरिक हैं हम।


थोड़ी बहुत अंगरेजी भी पढ़ी है हमने। कहीं लिखा था -हू एंज्वॉय ऑन फ्राइडे विल वर्क ऑन संडे। शायद एंट एंड ग्रासोफेर वाली कहानी थी जिसमे मेहनती चींटी आलसी टिड्डे को चेतावनी दे रही थी मगर ग्रासोफर नहीं मानता और बारिश के दिनों में भूखे मरता है।
बनारसी मजा लेने में बहुत आगे हैं। 'घर फूँक तमाशा देख' वाले। बहुत मजा लिया होली का, अब उसका रंग छुड़ाना है। मजदूर का मजा डबल मजदूरी के प्रायश्चित से ही कटता है लेकिन मालिक का मजा गंगा में डुबकी लगाने से कट जाता है। मालिक डबल मजा उड़ाता है। पहले पाप करने का मजा लेता है फिर पाप कटाने के नाम पर गंगा स्नान का मजा लेता है। मजदूर जैसे ही मजा लेता है, रोटी के लाले पड़ जाते हैं। उसके लिये मजा लेना ऐसा पाप है जो गंगा स्नान से नहीं डबल मजदूरी से ही कटता है।
मनुष्यों के मामले में आलसी ग्रासोफर और मेहनती चींटी के फार्मूले में कई अपवाद हैं।

पहले भिखारी को देख दया आती थी। हाथ झट से चला जाता था जेब में और उँगलियाँ टटोलने लगती थीं सिक्के। बड़ा सुकून मिलता था पैसा मिलने के बाद उसके चेहरे की मुस्कान देख कर। पहले दया का सागर हिलोरे मारने लगता था लेकिन अब ‪#‎ट्रेन‬ में आते जाते रोज जाने पहचाने चेहरों को भीख मांगते देखने का असर यह हुआ कि भिखारियों को देख दया के भाव नहीं जगते। सब चेहरे धंधेबाजों के लगते हैं।
हाथ में त्रिशूल लिए शंकर का भेष बनाये ढोंगी बाबा हो या झोले में सांप दबाये नाग देवता के दर्शन कराता धूर्त। किसी मजार का चादर फैलाये मौलवी हो या जवान लड़की को साथ लिये बेटी की शादी के नाम पर मदद की गुहार लगाती प्रौढ़ा। गोवा जाना है, सब सामान चोरी हो गया 'हेल्प मी प्लीज!' कहने वाला ठग हो या हाथ में कटोरा लिये घूमता कोई अपाहिज। सभी चेहरों को बार-बार देखने का परिणाम यह हुआ कि अपने भीतर के दया भाव में ही गहरी सेंध लग गई! दया का सागर सूख कर वरुणा नदी की तरह नाले में बदल गया।
अपने इस ह्रदय परिवर्तन को देख एक और बात समझ में आई कि मुसीबत में दया का पात्र बनकर शरीफ आदमी से भी अधिक दया कि अपेक्षा नहीं करनी चाहिये। वह आपको ठग समझ सकता है!

3 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (04-04-2016) को "कंगाल होता जनतंत्र" (चर्चा अंक-2302) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " सिरियस केस - ब्लॉग बुलेटिन " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. रोजमर्रा के जीवन में भी कितनी रोचकता हो सकती है..यह कोई आँख वाला ही देख सकता है..

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