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17.12.17

सुबह की बातें-7

सुबह उठा तो देखा-एक मच्छर मच्छरदानी के भीतर! मेरा खून पीकर मोटाया हुआ,करिया लाल। तुरत मारने के लिए हाथ उठाया तो ठहर गया। रात भर का साफ़ हाथ सुबह अपने ही खून से गन्दा हो, यह अच्छी बात नहीं। सोचा, उड़ा दूँ। मगर वो खून पीकर इतना भारी हो चूका था क़ि गिरकर बिस्तर पर बैठ गया! मैं जैसे चाहूँ वैसे मारूं। धीरे-धीरे मुझे उस पर दया आने लगी। आखिर इसके रगों में अपना ही खून था। मैंने उसे हौले से मुठ्ठी में बंद किया और बाहर उड़ा दिया। इस तरह वह लालची अतंकवादी और मैं सहिष्णु भारतीय बना रहा।

संडे की नींद मोबाइल के अलारम से नहीं, मित्र के फोन काल से खुलती है। मोबाइल में नाम पढ़ा तो चौंक गया..रावत जी! बहुत दिनों बाद किसी शतरंज के खिलाड़ी ने याद किया। शतरंज खेलना तो वर्षों से छूट ही चुका है। अब लगता है ये हमको हरा के ही मानेंगे! कोई जमाना था जब शतरंज खेलते सुबह से शाम हो जाती थीं। गुलाब पान वाले की अडी में जब हम लोगों की बाजी जमती तो लोग खड़े होकर, मोमबत्ती जला कर भी शतरंज देखते। लेकिन आज इतनी सुबह!

नमस्कार! सब ठीक तो है?

संडे को तो आप मार्निंग वॉक करने जाते हैं न? हम भी चलेंगे।

हां, सूर्योदय के बाद चलेंगे अभी तो अंधेरा है।

सूर्योदय हो चुका पण्डित जी! सुबह के सात बज रहे हैं। रजाई से मुंह बाहर निकालिएगा तब ना।
तब निकलिए! गुलाब की दुकान पर मिलते हैं।

साइकल चला कर जब पान की दुकान पर पहुंचे तो वे सड़क किनारे खड़े हो, एक टक ताकते हुए मेरी ही प्रतीक्षा कर रहे थे। न मेरा आना जान पाए न साइकिल खड़ी करना। मैंने हाथ हिलाया..

उधर क्या देख रहे हैं?

अरे! किधर से आ गए!

रावत जी को देखकर झटका लगा। जिस्म ठीक ठाक था लेकिन पूरे बाल झक सफेद हो चुके थे!

आप के बाल तो पूरे सफेद हो चके हैं? बूढ़े हो गए आप तो!

आपके काले हैं क्या? जब से रिटायर हुए हैं हेयर डाई लगाना छोड़ दिए। आप छोड़ दीजिए आपके भी सफेद हो जाएंगे।

अब यह दूसरा झटका था। मतलब डाई लगाना छोड़ दें तो अपने बाल भी ऐसे ही सफेद दिखेंगे! हम कितने भ्रम में जीते हैं!

डाई न लगाते होते तो इतनी जल्दी सफेद न होते। लेकिन अब मन नहीं करता। क्या फ़र्क पड़ता है! बेकूफी किए जो डाई लगाना शुरू किए।

शतरंज ?

शतरंज भी छूट गया।

आज कैसे याद किए?

लोहे के घर के अलावा आप की और भी दुनियां है पण्डित जी। आप सब भूल चुके हैं। आप ने नहीं याद किया तो हमने सोचा संडे को तो मिलेंगे ही, उसी समय आपको पकड़ते हैं। सुबह की सैर भी हो जाएगी, आप से भेंट भी। कैसी रही ये वाली चाल?

अरे! इसका तो कोई जवाब ही नहीं। बढ़िया आइडिया है।

Image may contain: one or more people, people standing and outdoorखंडहर वाले लॉन में धमेख स्तूप के पीछे से निकलकर सूर्यदेव थोड़ा ऊपर आ चुके थे। खंडहरों के बीच एक अकेली विदेशी महिला सेल्फी लेते हुए अपना ही वीडियो बना रही थीं। इक्का दुक्का पर्यटक आने लगे थे। स्तूप पर कबूतर कम और कौए अधिक बैठे थे। अकेले घूमने में सिर्फ देखना और महसूस करना होता है, कोई मित्र साथ हो तो महसूस की हुई हर बात जुबां पे आ जाती है। मैंने रावत जी को छेड़ा..

धमेख स्तूप में भगवान बुद्ध की अस्थियां हैं क्या इसलिए स्तूप पर कबूतरों से अधिक कौए बैठे हैं?

रावत जी हंसने लगे...कौए कहां कम हैं पण्डित जी? हर जगह कबूतरों की तुलना में कौए अधिक पाए जाते हैं।
और गिद्ध? गिद्ध क्यों गायब हो गए?

गिद्ध जब जान गए कि आदमी के रहते मांस मिलना मुश्किल है तो कहीं मर/खप गए होंगे!

हमने एक दो चक्कर और लगाए। मौसमी फ़ूल खिल चुके थे। एक ग्रुप अब धर्मराजिका स्तूप के पास बैठकर पूजा अर्चना कर रहा था। अकेली विदेशी महिला अभी भी अपनी सेल्फी/वीडियो बनाने में मगन थी। मुझे लगा...
एक हम ही नहीं पागल, बेचैन हजारों हैं।

12.12.15

फर्क

जब कोई दूसरा रास्ता न हो...
आसान है
राह में झरे फूलों को देख हर्षित होना
और...
रौंदते हुए निकल जाना!
कठिन है
ठहरना,
झुकना,
पंजों के बल बैठ
एक-एक फूलों को
हौले-हौले चुनना
और उन्हें
दोनों हाथों से
अंजुरी-अंजुरी उठाकर
एक किनारे
माटी को सुपुर्द करने के बाद
आगे बढ़ना।
रौंद कर चले जांय या सहेज कर
आपकी मर्जी
फर्क
न फूलों पर पड़ेगा
न पौधों पर।

6.12.15

सुबह की बातें (गठरी वाले घुमक्कड़)


धमेख स्तूप सारनाथ वाले पार्क में प्रातः भ्रमण के समय हम हाथ फेंककर घूम रहे थे और कुछ लोग सर पर भारी बोझ लादे घूम रहे थे! मुझे आश्चर्य हुआ। एक को रोककर पूछा-भाई! आपलोग ये भारी बोझ सर पर लादे क्यों घूम रहे हैं? एक महिला ने जवाब दिया...'क्या करें? गेट पर हर एक का 10 रूपिया मांग रहा था!' मुझे लगा ये लोग तो आम आदमी से भी गरीब हैं! गरीब हो कर भी घूमने का शौक रखते हैं!!! फिर बोला-'अरे! तो सब सामान एक स्थान पर रख दीजिये। आपके साथ इतने आदमी हैं, किसी को सामान देखने के लिए लगा कर बाकी लोग आराम से घूम सकते हैं!!!' उन्होने मेरे बात सुनी अनसुनी कर दी और कन्नी काट कर आगे बढ़ गये। हमारे साथ मिर्जा भाई भी घूम रहे थे। हँसते हुए बोले- जाय दा मरदवा! ई तोहें बनारसी ठग समझत हउवन! इनके लग्गे जइबा त भागे-दौड़े लगीहें। तू इनहन का भलाई नाहीं करत हउआ, डरवावत हौआ! इनहने के अइसे मौज आवत हौ।' 

मिर्जा की बात सुनकर मैं सकपका गया-'का मिर्जा! हम तोहके बनारसी ठग लगत हई?' मिर्जा बोले-'त का तोहरे कपारे पे लिखल हौ कि तू बड़का ईमानदार हउआ?' फिर हिन्दी में समझाने लगे-'ये लोग नागपुर से आए सीधे-सादे तीर्थयात्री हैं। इन्होने सुन रख्खा होगा कि बनारसी ठग होते हैं। इसलिए ये अपना सामान कहीं रखना नहीं चाहते होंगे। सभी साथ होंगे तो कोई समान ले नहीं पाएगा। इसलिए ये घूमते हुए भी सामान सर पर ढो रहे हैं।' 

मिर्जा की बात मेरे समझ में आ गई लेकिन नजर इनके सामानों पर ठहर गई! हँसते हुये बोला-गठरी में बहुत माल हौ का मिर्जा?  मिर्जा ने ठहाका लगाया-'नीयत खराब हो गयल बाबा! गेट पर समान रख्खे बदे 10 रूपिया जेकरे पल्ले ना हौ, ऊ का माल धरी हो?  चला! चाय पियावा बहुत मगजमारी क लेहला।'

 और हम हंसते हुए माटी के कुल्हड़ में जाड़े की धूप पीने लगे।


   

11.10.15

सुबह की बातें-1


20 सितम्बर, 2015 

धमेख स्तूप सारनाथ के सामने बेंच पर लेटा बिन चश्मे के लिख रहा हूँ। 3-4 किमी सड़क पर और कुछ देर घास पर चलने के बाद यहाँ लेटने में खूब आनंद आता है। स्तूप पर बैठे तोतों के झुण्ड बेंच के ऊपर घने नीम के भीतर बैठ खूब टांय-टांय कर रहे हैं। बुलबुल,कोयल और भी दुनियां भर के पंछियों के कलरव के आलावा कुछ देसी आवारा कुत्तों की झाँव-झाँव भी सुनाई पड़ रही है। टहलने वालों की संख्या बहुत कम है। यहां आने के लिए 5 रुपिया टिकट का लगता है इसलिए सभी नहीं आते। तोतों का झुण्ड अभी उड़कर फिर स्तूप पर जा कर चिपक गया। हर तरफ आनंद ही आनंद बिखरा पड़ा है। कुछ मन में उतार रहा हूँ, कुछ आपसे बांट रहा हूँ। शुभ प्रभात।

धूप निकल आई है। घने नीम के वृक्षों से छन छन कर हरे घास में चिपके ओस कणों को चुपके-चुपके पी रही है। एक तिब्बत्ती लड़की अपनी छोटी बहन के साथ मेरी बेंच और स्तूप के बीच में लॉन पर बैठी योगा कर रही है। हर आसन के बाद देर तक अपनी छोटी चोटी को खींचती/  संवारती जा रही है। छोटी बहन लगातार टिपिर-टिपिर आँख हाथ नचा नचा कर तिबती भाषा में जाने क्या बतिया रही है। बड़ी भी खुश है। धूप तेज हो रही है। अब चलता हूँ। कुल्हड़ वाली मस्त चाय की तलाश में। सन्डे सारनाथ की सुबह आनंद दायक रही।

25 सितम्बर, 2015 

घने नीम के नीचे लेटना ही सुखद है, यहाँ तो नीम के कई वृक्ष हैं। दायें बाएं, दूर और दूर। नीम की शाख में तोतों के झुण्ड के झुण्ड तंय-टांय कर रहे हैं। और भी कई पंछियों के कलरव गूँज रहे हैं।  मैं घूमने, ओस में डूबे घांस में नंगे पाँव टहलने के बाद यहां धमेख स्तूप सारनाथ के लॉन में बने लम्बे चबूतरे पर लेटा हूँ। काफी देर हो चुकी है लेकिन यहां से उठने का मन नहीं कर रहा। 

एक पंछी ने जल तरंग छेड़ा है। मैं इनका नाम नहीं जानता। तोता, मैना, कौआ,कोयल,बुलबुल बस यही सब गिने चुने नाम ही जानता हूँ। जल तरंग के बीच कोयल की कूक और कौओं की काँव-काँव भी सुनाई पड़ रही है।सतियानास!  धमेख स्तूप के पीछे बने जैन मंदिर से लाऊड स्पीकर से भजन बजने लगा! उनका ईश्वर प्रसन्न हो रहा होगा लेकिन मेरे आनंद में अब खलल पहुँच रहा है। सवा सतियानास! पीछे बुध्द मंदिर से भी लाउडस्पीकर बजने लगा! बुद्धम शरणम् गच्छामी! जय हो... बुद्ध कितने प्रसन्न हो रहे होंगे! 
अब चलता हूँ। सुप्रभात।

27 सितम्बर, 2015

पंडी जी पिंजड़ेे के तोते को रटा दिए हैं-गोपी कृष्ण कहो। लाउडस्पीकर में रोज बजता रहता है लेकिन धमेख स्तूप सारनाथ के तोते नहीं कहते -"बुद्धम शरणम् गच्छामी"। गुलामी और आजादी के बीच कितना फर्क है! लॉन में दिखा भक्तों का झुण्ड। ये कह रहे थे-बुद्धम शरणम् गच्छामी।

4 अक्टूबर, 2015 

सुबह-सुबह घने नीम के वृक्षों से धमेख स्तूप तक अनवरत उड़ते रहने वाले तोते सन्डे नहीं मनाते। कोई ऑफिस नहीं, कोई छुट्टी नहीं। ये जब स्तूप से उड़कर वापस नीम की शाखों पर बैठते हैं तो कुछ कौए काँव-काँव करने लगते हैं। ऐसा लगता है जैसे नास्तिक पितृपक्ष में ब्राह्मणों के भोजन का उपहास उड़ा रहे हों! तोते भी टांय-टांय कर प्रतिरोध करते हैं। 

धूप तेज हो चली है। घने नीम से अनवरत एक-एक कर पीले पत्ते झर रहे हैं। कोयल के साथ पेड़की ने खूब समा बांधा है।  ये क्या कहते हैं, कुछ समझ में नहीं आता पर यह तो तय है कि बिहार के चुनावी दंगल में लालूजी और मोदी जी की तरह कोई राग नहीं छेड़ रहे।  गिलहरियों का फुदकना बदस्तूर जारी है। लॉन में कई प्रकार के पौधे हैं मगर कोई आपस में नहीं झगड़ते। कोमल लताएँ सूखे वृक्ष के सहारे ऊपर तक चढ़ जाती हैं। कोई किसी की टांग नहीं खींचता। 

झाडू लगाने वाला आ चुका है। अब चलना चाहिए। आज की सुबह रोज की तरह आनंद दायक रही।

5 अक्टूबर, 2015 
आज एक लड़का सारनाथ में हिरणों को ब्रेड खिला रहा था। एक बड़ा पैकेट ब्रेड लिए था और तोड़-तोड़ कर खिलाये जा रहा था। हिरण ब्रेड के लिए धीरे-धीरे जमा हो रहे थे। सुप्रभात।


6 अक्टूबर, 2015
आज सुरुज नारायण रोज की तरह लालम लाल, गोलमटोल निकले। मैंने देखा उन्हें खण्डहरों के उस पार धमेख स्तूप के पीछे। फूलों ने मेरी तेज चाल को देखकर छेड़खानी करी-हैलो! आज फ़ोटू नहीं खींचोगे? बांस के की पत्तियाँ थोड़ी सजग हुईं। मैं सबको मुस्कुराकर देखते हुए आगे बढ़ चला। देसी कुत्ते झुण्ड बनाकर सरसराते हुए बगल से गुजरे। अनार के पौधों के पीछे कुत्तों के जोड़े प्यार करने लगे। तोते टांय-टांय करते नीम से उड़ चले फिर स्तूप की ओर। हिरणों के झुण्ड उदास थे। आज नहीं दिखा उनको ब्रेड खिलाने वाला लड़का। मैं जल्दी में था। सबको देख मुस्कुराते हुए चलता बना। सुप्रभात।

7 अक्टूबर, 2015 

आज न फूलों से कोई बात हुई न चिड़ियों से। कुत्ते भी नहीं दिखे। पहली बार सुना सारनाथ मृगदाव के चीतलों को बोलते हुए। बाउंड्री की जालियों के पास जा कर देखा सभी एक लाइन में सावधान की मुद्रा में खड़े हो कर जोर-जोर से बोल रहे थे। ऐसा लग रहा था कि ये अपने राज्य का राष्ट्र गान गा रहे हैं! ध्यान से देखने पर समझ में आया कि ये अपने किसी भटके हुए साथी को आवाज लगा कर बुला रहे हैं। मैंने उनके आवाज की नकल की तो सब झटके से मेरी ओर देखने लगे। जब तक मैं फ़ोटू खींचता, मुँह फेर लिया।सूरुज नारायण लाल-लाल आँखे तरेरते हुए मुझ पर धूप की वर्षा करने लगे।



धमेख स्तूप पर तोते.कबूतर रोज की तरह उड़ रहे थे। मॉर्निंग वॉक वाले तेज-तेज चल रहे थे। तेज-तेज सीटी बजने की आवाज सुनाई दी तो देखा दो लड़के घास पर चलने वालों को मना कर रहे थे। पता चला इनकी ड्यूटी लगाई गई है कि लोग घास पर न चलें। सही भी है, लोगों के घास में चलने से उसकी ख़ूबसूरती बिगड़ जाती है। ख़ूबसूरती देखभाल मांगती है। यह दूर से देखने और आनंद लेने की चीज है। छेड़खानी किया तो ख़राब हो जायेगी। लोग फूलों को तो क्या, मिलने पर कलियों को भी अपने क्षणिक स्वार्थ में तोड़ कर मसल देते हैं।

इन्ही सब में खोया रहा। अभी घर आया तो याद आया कि आज तो न फूलों से कोई बात हुई न चिड़ियों से! न जाने क्या सोच रही होंगी मेरे बारे में!


12 अक्टूबर, 2015 घर से मात्र 20 मिनट कदम चाल की दूरी पर है सारनाथ बुद्ध मंदिर। प्रातः भ्रमण के साथ लोग मंदिर मे,  मैं मंदिर के बाहर चारों ओर बिखरी प्राकृतिक सुंदरता में भगवान् बुद्ध के दर्शन करता रहता हूँ। मंदिर के सामने लान में एक बड़ा सा चबूतरा है जिसमें चढ़ने के लिए बनी सीढ़ियों की रेलिंग पर बच्चे झूल रहे थे। उनकी फ़ोटू खींची तो वे खुश हो गए। चबूतरे पर प्लास्टिक बिछा कर लोग योगा कर रहे थे। बहुत से लोग थे। ऐसा लग रहा था जैसे किसी भंडारे की भीड़ हो! यहाँ लोग सामूहिक योगा कर के तन की चर्बी घटा रहे थे और मन की भूख मिटा रहे थे।


वहां से चलकर धमेख स्तूप के खण्डहरों वाले पार्क में आये तो मुझे देख फूलों के चेहरे प्रसन्न हो गए या सूर्यदेव की सुनहरी किरणों के प्रभाव से खूबसूरत हो गए, ठीक-ठीक कह नहीं सकता। मैंने जब एक फूल से कहा तुम बहुत खूबसूरत हो लेकिन मुझे तुम्हारा नाम नहीं मालूम! तो वह खिलखिलाकर हंसने लगा। तुम लोग हमारा नाम भी रखते हो!!! मैं उन्हें हँसता छोड़ आगे बढ़ गया। इन्हें क्या मालूम कि मनुष्य जिसे देखता है पहले उसका नाम ही रखता है और जिससे डरता है उसे भगवान मान लेता है।

घूम कर थक गया तो अब मैं लान के पत्थर पर लेटा अपना योगा कर रहा हूँ। सुन रहा हूँ चिड़ियों की बोली,  लिख रहा हूँ मोबाइल से फेसबुक पर। सामने नीम के शाख पर एक गिलहरी काले कौए से फल के लिए झगड़ रही है। सामने दूसरे पेड़ पर एक तोता और एक तोती आपस में चोंच लड़ा रहे हैं। तोता मैना की प्रेम कथाएँ तो खूब पढ़ीं पर उनको चोंच लड़ाते मैंने तो नहीं देखा। अभी एक तोतों का दूसरा झुण्ड टें टें टें टें करते हुए घने नीम में घुस गया। उसमें कितने तोते कितनी तोती होंगे,  मैं नहीं जान पाया।

घर लौटते हुए खंडहरों पर नजरें टिकीं तो ऐसा लगा जैसे इन खण्डहरों में घूमती होंगी और भी  बेचैन आत्माएँ!  लेकिन मुझे कोई दूसरा या दूसरी नहीं मिली या यह भी हो सकता है कि मिली हों, साथ-साथ घूमी हों और हमने इक दूजे को पहचाना ही न हो!



धूप तेज हो गई, अब चलना चाहिए। आनंद दायक रही संडे की सुबह। सुप्रभात खतम हो गया। अब तो शुभ दिन बोलना पड़ेगा।





नोट: फेसबुक में लिखे कुछ स्टेटस को मिलाकर यह पोस्ट बना दिया।