22.1.17

दल बदल या दिलबदल

बीहड़ में किसी डाकू का दिल बड़े गिरोह पर आ जाय और वह लूट में अधिक हिस्से के लोभ में अपना दल बदल कर बड़े गिरोह में शामिल हो जाय तो किसी को कोई अचरज नहीं होता। जंगल का अपना क़ानून होता है। ताकत की सत्ता होती है। अस्तित्व का संघर्ष होता है। सत्ता की छाया में अधिक माल लूटने या जान बचाने के लिये डकैत दल बदलते रहते हैं। आश्चर्य तब होता है जब किसी लोकतांत्रिक देश में जन सेवा के लिये काम करने वाले नेता जी का दिल एन चुनाव के समय बड़े गिरोह पर आ जाता है और वे झट से अपना दल बदल कर दूसरे दल में शामिल ही नहीं हो जाते बल्कि चुनाव लड़ने का टिकट भी पा जाते हैं!

दल बदलू के दल बदलने से दोनों दलों के वे कार्यकर्ता खुद को दल दल में फँसा समझते हैं जिन्होंने उनसे उम्मीदें पाल रखी थीं। सामान्य को पूछता ही कौन है? दलबदलू कोई साधारण तो होता नहीं। वही हो सकता है जिसके पास जन बल और धन बल दोनों हो। इन बादशाली दलबदलुओं के अपना दिल बदलने से ये नरक में नहीं जाते बल्कि इनके इस आचरण से कितने स्वर्ग में जाने की तैयारी करने लग जाते हैं!

दिल दोनों तरफ टूटते हैं। जिस दल में थे उसके कार्यकर्ता निराश होते हैं कि अब अपनी ताकत और कम हो गई। जिस दल में गये उसके कार्यकर्ता निराश होते हैं कि जीवन भर मेहनत हमने किया और जब हाथ सफाई का मौका मिला तो टिकट कोई बाहरी ले उड़ा! ये उस मजनू की तरह मायूस होते हैं जो लड़की पटाये और उसका टिकट छीन कर फिलिम दिखाने कोई और ले कर चला जाया! कुछ दिन तक तो 'दिल के टुकड़े हजार हुए। कोई यहां गिरा, कोई वहाँ गिरा।' वाला हाल होता है, इरोध-विरोध होता है फिर 'हरि इच्छा' बलवान की तरह 'हाई कमान बलवान' मान कर सभी अपने पार्टी में ही अपने विलेन की जय जयकार करने लगते हैं!

प्रश्न उठता है कि आदमी दिल बदलता ही क्यों है?

कंजूस की पत्नी डाक्टर से मन्नत कर अपने पति का दिल धोखे से बदल दे और राजा का दिल लगवा दे। बाद में जब राजा उसे बेगम समझ कर रोज शाही कबाब बनाने का हुक्म देने लगे तब जा कर पत्नी को एहसास हो कि इससे अच्छा तो अपना कंजूस पति ही था!

किसी लड़की का दिल अपने रामू को छोड़ सलमान खान पर आ जाय और बाद में पता चले कि सलमान तो पहले से बहुतों का दिल तोड़ चुका है!

अच्छी भली पत्नी छोड़ कोई अधेड़ पड़ोस के लड़के से पूछे-भाभी जी घर पर हैं? और घर से पहलवान भैया निकलकर उसका सर तोड़ दें!

कोई चमचा, चम्मच की तरह एक अधिकारी के जाते ही नये वाले अधिकारी से तुरंत घुल मिल जाय और उनके प्याली में भी पुराने की तरह फिट बैठे!

ये सब बातें तो आम आदमी के लिए पुरानी सामान्य घटनाएं हैं। सब चलता है। यही दुनियाँ है, यहाँ यही होता है, मान कर हँसते हुए स्वीकार कर लेता है। मगर किसी सिद्धांत की दुहाई देने वाले का दिल, किसी दूसरे उस सिद्धान्त की दुहाई देने वाले दल पर आ जाय जिसकी जीवन भर बुराई करके नेता बना है तो दोनों दलों के अलावा जन सामान्य का भी दिल टूटना स्वाभाविक है।

एक प्रश्न के बाद कई प्रश्न उठते हैं। आखिर नेता जी ने अपना दिल क्यों बदला ? क्या सत्ता की चौकीदारी में ही होशियारी है? सत्ता सुख के सामने सब सुख ओछे हैं? क्या सिद्धांत, सत्ता प्राप्त करने की अलग-अलग सीढ़ियाँ हैं जिसमे पीढी दर पीढ़ी चढ़ती-उतराती रहती है? क्या सेवा भाव इतना प्रबल होता है कि आदमी मुँह मांगे भाव में उसे खरीद लेना चाहता है। अंत में यह कि यदि देश में इतने सारे सेवक हैं तो आम आदमी इतना दुखी क्यों है?

सिद्धार्थ ने आम आदमी के दुःख दूर करने के लिए सत्ता सुख का त्याग किया और नेता जी आम आदमी का दुःख दूर करने के लिये सत्ता पाना चाहते हैं! दोनों में सही कौन? वो जो बुद्ध बन गये या वो जो राजा बनना चाहते हैं?

5 comments:

  1. मस्त व्यंग की धार ... पर नेताओं का दिल ऊपर से बदलता है सुविधानुसार ...

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (24-01-2017) को "होने लगे बबाल" (चर्चा अंक-2584) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जी की 120वीं जयंती और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  4. दलबदलू नेताओं को सबक सिखाने का अधिकार जनता के पास है, उन्हें उसका उपयोग करना चाहिए

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