14.1.18

पुस्तक मेला और साहित्यकार

एक बार बलिया के पशु मेले में गए थे, एक बार दिल्ली के पुस्तक मेले में। दोनों मेले में बहुत भीड़ आई थी। जैसे पशु मेले में लोग पशु खरीदने कम, देखने अधिक आए थे वैसे ही पुस्तक मेले में भी लोग पुस्तक खरीदने कम, देखने अधिक आए थे। दर्शकों के अलावा दोनों जगह मालिकों की भीड़ थी। कहीं पशु मालिक कहीं पुस्तक मालिक। जैसे पुस्तकों के मालिक केवल लेखक नहीं, प्रकाशक भी होते हैं वैसे ही पशुओं के मालिक भी अपने अपने पशुओं को एक स्थान पर सुपुर्द किए दे रहे जो उन्हें सजा कर बेच रहा था। जैसे पशु मेले में अपना कोई पशु नहीं था वैसे ही पुस्तक मेले में भी अपनी लिखी कोई पुस्तक नहीं थी। दोनो मेले में एक ही प्रश्न देर तक मेरा पीछा करते रहे..आपकी कहां है?

आदमी अपने अनुभवों से ही कुछ सीखता है। यदि आपका थोपड़ा पशु मालिक या लेखक की तरह हो तो आप को दोनो ही मेले में नहीं जाना चाहिए। पशु मेले में जाएं तो आपके हाथ में लंबा पगहा हो और पीछे कोई दुधारू गाय लचक लचक कर चल रही हो। बिना पशु वाले किसान की पशु मेले में और बिना पुस्तक वाले लेखक की पुस्तक मेले में कोई इज्जत नहीं होती। पुस्तक मेले में तब तक न जाएं जब तक आपकी कोई पुस्तक प्रकाशित न हो चुकी हो। बिना अपनी पुस्तक लिए गए तो फिर आप दुकान-दुकान घूम कर पुस्तक खरीदते ही रह जाओगे, बेचने का सुख नहीं मिलेगा।

ईश्वर जानता है कि जो सुख ज्ञान देने में है वह लेने में कत्तई नहीं है। जेब खाली कर ज्ञान वही खरीद सकता है जिसका पेट भरा हुआ हो और घर में खजाना गड़ा हुआ हो। ज्ञान तो धीरे से चुरा लेने की चीज है। लाइब्रेरी में गए और नोट बना लिए। एक पुस्तक इशू कराए दूसरी दबा कर निकल लिए। पढ़ने लिखने वाले चेहरे से शरीफ दिखते हैं इसलिए इनकी चोरी कम पकड़ में आ पाती है। धरा भी गए तो पकड़ने वाले भी पढ़ने लिखने वाले होते हैं, जल्दी से माफी मिल जाती है। अब एक मल्लाह, दूसरे मल्लाह से क्या पार उतरवाई लेगा? लेखक बिरादरी राजनेताओं की तरह कृतघ्न थोड़ी न होती है कि मौका पाते ही विरोधियों के पीछे सी.बी.आई छोड़ दे! लेखक की चोरी पकड़ी भी गई तो भले उपेक्षा का शिकार हो जाय, सजा नहीं पाता।

पुस्तक मेले में घूमने आए लोग सभी स्टाल में जाकर सभी प्रकार की पुस्तकें ऐसे पलटते हैं जैसे सत्य की खोज में निकला फकीर ज्ञान तलाशने के लिए जंगल जंगल भटक रहा हो ! अंत में खरीदते वही दो चार पुस्तकें हैं जिनके लेखकों के नाम अपने पाठ्य पुस्तक से उन्होंने सुन रखे हैं। सब पलटने के बाद मासूमियत से पूछते हैं.. मुंशी प्रेम चंद की गबन है? दुकानदार भी आदतन उस कोने की तरफ इशारा करता है जिधर उसकी टाइप के लोग अधिक आये हैं और जहाँ अधिक भीड़ है। इस प्रश्न पर दुकानदार अधिक झल्लाते पाए जाते हैं.. दो बैलों की जोड़ी है? गनीमत है यह नहीं कहते..दो बैलों की जोड़ी लेनी हो तो पशु मेले में जाओ, यहां क्यों घूम रहे हो?

पहले लेखक बनने और एक पुस्तक छपवाने के लिए भूखे पेट रहकर किसी बड़े साहित्यकार के दरबार में वर्षों खुद को तपाना और लेखक सिद्ध करना पड़ता था। प्रतिष्ठित साहित्यकार का आशीर्वाद मिलने के बाद ही कोई प्रकाशक किसी नए लेखक की कोई पुस्तक छापने की हिम्मत जुटा पाता था। अंतर्जाल के प्रचलन और आभासी दुनियां ने इस पूरे पटल को ही बदल कर रख दिया है। सभी की डायरियां अब ब्लॉग/फेसबुक में लिखी जाने लगी हैं। जेब में पैसा हो, प्रशंसक हों तो आप सीधे प्रकाशक से बात कर सकते हैं.. कित्ता लोगे? और कित्ती दोगे? पुस्तक न बिकनी है न रायल्टी मिलनी है. यह बात आप भी जानते हैं, प्रकाशक भी। एकमुश्त सौदा तय हो जाता है। इत्ती लेंगे और प्रकाशन के बाद इत्ती पुस्तकें देंगे। आपको लेखक बन ख्याति अर्जित करनी है, अगले को प्रकाशक बन पैसा कमाना है। ख्याति और पैसे के इसी सुखद संजोग ने पाठक शून्यता के हाहाकारी जुग में भी चमत्कारिक ढ़ंग से नए लेखकों और प्रकाशकों की नई पौध का सृजन किया है। पुस्तक मेला और कुछ नहीं छुट्टे शब्दों की भीड़ है जो पशुओं की तरह अपने अपने मालिकों के साथ पुस्तक रूपी पगहे में बंधी कुछ पाने की लालसा लिए एक स्थान पर जमा होती है। इस भीड़ में कोई निराला, कोई धूमिल कोई गालिब अपने झोले में अपनी पांडुलिपी दबाए भूखे पेट, प्रकाशक-प्रकाशक घूम रहा हो तो भला उसे कौन पहचानेगा? यह दौर लेखक बन कर नाम कमाने का है तो यह दौर अच्छे लेखकों के बिना प्रकाशित हुए गुम हो जाने का भी है।

13 comments:

  1. Hamare liye to Baliya door hai, Dilli bhi...so pashu ya pustak ke deedar hamare naseeb me kahan!

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    1. अपनी लेखनी में कुछ कमी रह गई। दीदार तो मैंने दोनों के कराए है। :)

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    2. Aapki lekhani to bejod hai bhai

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (15-01-2018) को "डोर पर लहराती पतंगें" (चर्चा अंक-2849)) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हर्षोंल्लास के पर्व लोहड़ी और मकर संक्रान्ति की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधातिवारी (राधेश्याम)

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  3. सत्य वचन महाराज!

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  4. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन मकर संक्रांति पर ब्लॉग बुलेटिन की शुभकामनायें करें स्वीकार में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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  5. आपकी लिखी रचना  "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 17जनवरी2018 को लिंक की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  6. बिल्कुल सत्य एवं सटीक ! बहुत खूब आदरणीय ।

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  7. यह दौर अच्छे लेखकों के बिना प्रकाशित हुए गुम हो जाने का भी है ।

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  8. एकदम अच्छी और सच्ची .....रचना।

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  9. देवेन्द्र जी बहुत ही मजेदार व्यंग है आपका | लगता है व्यंग जगत को एक प्यारा सा हंसमुख व्यंगकार मिल गया | अच्छे दिनों की दस्तक है | सस्नेह शुभकामनाएं

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    1. बड़ा प्यारा कमेन्ट है आपका. आभार.

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