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4.6.19

हे माँ शारदे !

कुछ शब्द दो

गूँथ कर 

सारे जहाँ के पाप 

हवन कर दूँ

बोल दूँ,

'स्वाहा!



कुछ शब्द दो

तट पर जा

अंजुरी-अंजुरी चढ़ाऊँ

फिर से 

स्वच्छ/निर्मल

कल-कल बहने लगे

सभी नदियाँ।


दूर हो

पर्यावरण का संकट

जीवित रहें

जल चर, थल चर, नभ चर

मर जायें सभी

वृक्षों को काटने वाले 

राक्षस।


चमत्कार करो माँ!

कुछ शब्द दो

उछालूँ जहरीली हवा में

नभ चीर कर बरसें बादल उमड़-घुमड़

भर जाए

ताल-तलैयों से

धरती का ओना-कोना

हरी भरी हो 

खुशी से 

खिलखिलाने लगे 

धरती माँ।

........

9.6.15

धूप

लोहे के घर में
खिड़की से बाहर
धूप है,
प्रचण्ड धूप....

झील-झरने, ताल-तलैया, नदियाँ-समुंदर
सब मिलकर भी
नहीं बुन पा रहे
बादलों की चादर
नहीं टाँक पा रहे इंद्रधनुष
बेलगाम हो चुकी हैं
आवारा किरणें

सूखी बंजर धरती और
खेतों में उग रहे कंकरीट के मकानों के बीच
भयभीत खड़े हैं
घने वृक्ष!

नीचे
कसाई वक़्त से बेखबर
उछल रही हैं
छोटी बकरियाँ। 

5.6.11

ये कोई और है.....!


प्रस्तुत है विश्व पर्यावरण दिवस को समर्पित एक नवगीत जो वर्ष 2002 में  उत्तर प्रदेश के नौ कवियों के काव्य संग्रह, काव्य स्वर में प्रकाशित है।

कहने लगीं अब बूढ़ी दादियाँ.....                                      


कहने लगीं अब बूढ़ी दादियाँ
बच्चों के हाथों में डोर है।

शहरों की आबादी जब बढ़ी
खेतों में पत्थर के घर उगे
कमरों में सरसों के फूल हैं
चिड़ियों को उड़ने से डर लगे।

कटने लगी आमों की डालियाँ
पिंजड़े में कोयल है मोर है।
[कहने लगीं अब बूढ़ी दादियाँ.....]

प्लास्टिक के पौधे हैं लॉन हैं
अम्बर को छूते मकान हैं
मिटा दे हमें जो इक पल में
ऐसे भी बनते सामान हैं।

उड़ने लगी धरती की चीटियाँ
पंखों में सासों की डोर है।
[कहने लगीं अब बूढ़ी दादियाँ.....]

सूरज पकड़ने की कोशिश ने
इंसाँ को पागल ही कर दिया
अपनी ही मुठ्ठी को बंद कर
कहता है धूप को पकड़ लिया।

दिखने लगीं जब अपनी झुर्रियाँ
कहता है ये कोई और है।
[कहने लगीं अब बूढ़ी दादियाँ.....]

............................................................
(चित्र गूगल से साभार)