3.4.11

मूर्ख दिवस की यादें, विश्व कप की बधाई व नवसंवत्सर की ढेरों शुभकामनाएँ....सब एक साथ।


आज आनंद का दिन था। बहुत दिनों के बाद वह दिन आया जब दफ्तर में छुट्टी थी, श्रीमती जी ने अत्यंत जरूरी गृह कार्य भी नहीं सौंपा था और न ही मुझे ब्लॉग से अच्छा दूसरा कोई मिला था। विश्वकप जीतने के दृश्य आखों के सामने ताजा थे। चारों दिशाओं से बधाई संदेशे आ जा रहे थे। ब्रश करने और चाय पीने के बाद से ही नई पोस्ट लिखने का इरादा हो रहा था। आनंद की यादें भी पुकार रही थीं। कमी थी तो बस यह कि विषय ही तय नहीं कर पा रहा था।

विश्व कप से एक दिन पहले 1 अप्रैल को राजेंद्र प्रसाद घाट पर बिताये महामूर्ख सम्मेलन की यादें भी ताजा थीं। दूर-दूर से बड़े-बड़े मूर्ख कवि पधारे थे। सभी में महामूर्ख बनने की होड़ लगी थी। हजारों की संख्या में घाट पर बैठे मस्त श्रोता खुद को मूर्ख कहे जाने पर खुश हो, जोर-जोर से ताली पीट रहे थे। अद्भुत दृश्य था। मेरे मित्र मुझे स्वयम से श्रेष्ठ मूर्ख स्वीकार कर चुके थे इसलिए मुझे भी मंच पर चढ़ा देखना चाहते थे मगर मैं उनके बीच बैठा हर हर महादेव का नारा लगाते कविता सुनने के मूड में बैठा था। एक से बढ़कर एक मूर्खता पूर्ण कार्य हो रहे थे। सम्मानित वृद्ध, दुल्हन का जोड़ा पहन सज संवर कर बैठे थे तो भद्र डाक्टर महिला, दूल्हा बन शादी रचाने को तैयार थी। बड़े-बड़े, दूर से ही पहचाने जाने वाले जाली नोट न्यौछावर किये जा रहे थे। अशुभ मुहुर्त में अगड़म-बगड़म स्वाहा के जोरदार मंत्रोच्चार के साथ शादी के फेरे हो रहे थे। मंच संचालक हा..हा करता तो घाट की सीढ़ियों पर बैठे बुद्धिमान श्रोता और भी जोर से हा..हा..हा...के ठहाके लगाकर बड़े लंठ होने का दावा पेश कर रहे थे। मैं भीड़-भाड़ में कैमरा-वैमरा नहीं ले जाता वरना एकाध फोटू जरूर खींच कर चस्पा कर देता। वैसे यदि आप बड़े पाठक हों तो गूगल में सर्चिया के देख सकते हैं। कहीं न कहीं तो आ ही गया होगा । दूर-दूर से बड़े बुद्धिमान कवि खुद को महामूर्ख सिद्ध करने आये थे। जोकरनुमा हाव-भाव व अपने कोकिल कंठ से फिल्मी गाने की पैरोडी को अपने कवित्त के गोबर में सानकर अनवरत उगल रहे थे। जो जितनी बड़ी मूर्खतापूर्ण कविता सुनाता वह उतनी अधिक तालियाँ बजवाता। वाह ! क्या गज़ब की लंठई चल रही थी ! मुझे याद आ रहा है...लखनऊ से पधारे श्री सूर्य कुमार पाण्डेय ने महिलाओं को कुहनी मारने की हूबहू एक्टिंग करते हुए सुनाया था....

वो मेरी बगल से गुजरी तो मैने मार दी कुहनी
कहा उसने
बुढ़ौती में यह हाल होता है ?
कहा मैने
वन डे क्रिकेट के रूल को समझो
वहीं पे फ्री हिट मिलता है
जहाँ नो बॉल होता है।

इतना सुनते ही सभी श्रोता उछल-उछल कर हो….हो….हो… करने लगे। उसके बाद आईं संगीता जी ने मस्त अंदाज में उनकी छेड़छाड़ का उत्तर दिया…...

सूखे टहनी पर गुलाब आ रहे हैं
आखों में मोतिया बिंद है
फिर भी ख्वाब आ रहे हैं
जवानी में जो भेजे थे इन्होने खत
बुढ़ौती में अब उसके जवाब आ रहे हैं।

ऐसी ही अनगिन लंठई भरी कविताओं के साथ कभी कभार जोरदार व्यंग्य भी सुनने को मिल रहे थे। जिसे सुनकर दर्शकों की खुशी का पारा अचानक से कम हो जा रहा था। वैसे जितने भी कवि आये थे सभी बड़े-बड़े थे और उन्हें अच्छी तरह मालूम था कि कहाँ क्या सुनाया जाना चाहिए। और भी बहुत सी बातें हैं जिन्हे लिख कर आप को झेलाया जा सकता है मगर मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि लिखूं तो क्या लिखूं। विश्वकप में भारत की जीत अलग ही उचक मचा रही है लिखने के लिए। बहुत से विद्वान ब्लॉगर जो क्रिकेट कभी नहीं देखते मगर उन्होंने भी बच्चों की खुशी के लिए पूरा मैच देखा और एक अच्छी पोस्ट लिख डाली। इसे कहते हैं आम के आम गुठलियों के दाम। मजे भी लो और विद्वान भी बन जाओ। एक मैं मूरख सोच में पड़ा हूँ कि किस विषय पर लिखूँ !

लगता है आज कुछ खास रविवार है। बड़े आनंद का दिन है। हर तरफ खुशियाँ बिखरी हैं। घर में बिजली भी है पानी भी। निर्मला भी सही समय पर आ कर झाड़ू-पोछा कर रही है। श्रीमती जी भी बड़ी प्रसन्न हैं। हवा के झोंके से कुछ टिकोरे आंगन में झड़ गये हैं। चटनी की खुशबू सुबह से आ रही है। मोर उड़ कर अभी-अभी गया है। चिड़िया चह चहा रही हैं। अमूमन छुट्टियों में भोजन का समय 9 के बजाय 12 शिफ्ट हो जाता है। बच्चे भी समझदार हैं। 8 बजते-बजते कोई न कोई धीरे से कुछ न कुछ नाश्ते की डिमांड रख ही देता है..पापा जिलेबी ! या कुछ और। जानते हैं कि मैं इनकार नहीं करूँगा। श्रीमती जी पिच तैयार करना और बच्चे बैटिंग करना खूब जानते हैं। चूक में या सबकी खुशी के लिए बोल्ड होना ही पड़ता है। मगर आज का दिन ही बड़ा गज़ब का है। किसी ने नाश्ते की डिमांड नहीं करी ! लैपटॉप छोड़कर बच्चों से पूछ बैठा...क्या बात है भई ! आज कुछ नाश्त-वाश्ता नहीं किया तुम लोगों ने ? तीनो बच्चे उम्र के हिसाब से समवेत चहकने लगे....आप को भूख लग गई क्या ? लैपटॉप कैसे छोड़ दिये ! हम ले लें क्या ? आपको पिछले संडे की तरह आज भी ऑफिस जाना है क्या ? तब तक छोटका दौड़ा....ठीक है हम ले लेते हैं लैपटॉप... थैक्यू पापा ! मुझे पूरी दुनियाँ लुटती नज़र आई जोर से चीखा...अरे नहीं...मुझे कहीं नहीं जाना । मेरे लैपटॉप को हाथ मत लगाना।….खबरदार। तब तक श्रीमती जी चहकीं...भूख लगी हो तो भोजन तैयार है। मैं सातवें आसमान से गिरा इतनी जल्दी सुबह 9 बजे ही रविवार के दिन भोजन तैयार है ! क्या गज़ब चमत्कार है ! अभी तक मैने कुछ लिखा ही नहीं ! बच्चे चीखे...अरे आज टीवी पर फिल्म आयेगी न इसीलिए....तभी दरवाजे पर किसी के आने की आहट सुनाई पड़ी। पंडित जी...चलना नहीं है क्या ? कहाँ…? अरे आज सड़क निर्माण का उद्घाटन करने के लिए नेता जी आ रहे हैं ना...! धत्त तेरे की मैं तो भूल ही गया। ठीक है आप लोग चलिए मैं नहा धोकर आता हूँ। अभी तक नहाये नहीं...! आप भी गज़ब करते हैं...! पहले से बता दिया था तब भी....ठीक है जल्दी आइये।

भाड़ में जाये ब्लॉगिंग...! सड़क बन रही है यह कम खुशी की बात है ! विगत दस वर्षों से तो इसी का सपना देख रहे थे। क्या पता था कि अपनी सड़क पर काम तभी चालू होगा जब भारत वर्ल्ड कप जीत लेगा !

सड़क निर्माण के उद्घाटन की राजनीति पूर्ण हो चुकी है। खा-पी कर लैपटॉप खोला तो गहरी नींद आ गई। जागा तो सोचा वही लिखूँ जो आज सोच रहा था। कल से नव संवत्सर 2068 प्रारंभ हो रहा है। भारत की मान प्रतिष्ठा में वृद्धि का योग पहले से ही दिख रहा है। स्वागत की तैयारी करनी है मगर यह क्या ! बाहर तो बारिश के साथ ओले भी पड़ रहे हैं ! शाम से पहले मौसस कैसे अचानक से बदल गया ! आप के शहर में क्या हाल है ? सब ठीक तो है ! सभी को नव वर्ष की ढेरों शुभकामनाएँ....नमस्कार।

मूर्ख सम्मेलन के चित्र / समाचार यहाँ देख सकते हैं...... http://compact.amarujala.com/city/8-1-9756.html

26.3.11

आभासी दुनियाँ



एक ऐसी दुनियाँ
जहाँ
न कोई राजा न कोई रानी
न कोई मंत्री न कोई सैनिक
सभी मालिक
सभी प्रजा
न कोई भूखा न कोई नंगा
सभी मानते
मन चंगा तो कठौती में गंगा ।

एक से बढ़कर एक विद्वान
कुछ बड़े
कुछ औसत दर्जे के....
कवि, कहानीकार, पत्रकार, चित्रकार, व्यंग्यकार
कुछ अलग ढंग के फनकार
और कुछ
फनहीन चमत्कार
भौचक करती है जिनकी
औचक फुफकार !

क्या करना है
किसी की निजी जिंदगी में झांककर !
सब कुछ दिखाने वाला चश्मा क्या अच्छा होता है ?

वहाँ देखो !
वह
कितनी अच्छी
कितनी सच्ची बातें करता है
यूँ लगता है
विक्रमादित्य की कुर्सी पर बैठा है !

नहीं नहीं
शक मत करो
मान लो
वह वैसा ही है
जैसा कहता है

अरे याऱ….
एक दुनियाँ तो छोड़ो
चैन से जीने के लिए !

अच्छा  लिखने
अच्छा पढ़ते रहने में
अच्छे हो जाने की
प्रबल संभावनाएँ छुपी होती हैं

चार दिनो की तो बात है
फिर आभासी क्या
छूट जानी है
वास्तविक दुनियाँ भी
एक दिन
होना ही है हमें
स्वर्गवासी ।

......................................
 

18.3.11

आउट...! नॉट आउट...!


आज
ऑफिस से घर लौटते वक्त
दोस्तों ने छनाई है भांग
कहते थे
भांग छान कर जब लिखबा तs लिखबा ऊँची चीज !

पिलाना चाहते थे दारू भी
पर भाग आया हूँ
नहीं ला सकता घर में
अनपेक्षित गंध !

नशे में डूबा
नेट पर पढ़ता हूँ समाचार
संसद में हंगामा
विकिलीक्स की गेंद पर जोरदार अपील
विपक्ष ने कहा
आउट !
प्रधानमंत्री ने कहा
नॉट आउट !

दूर
मन मंदिर से
पास आ रहे हैं भजन के बोल....

तू ही खिलाड़ी
अंपायर तू ही
तू है कृपानिधान
हे राम !  हे राम !

देखना चाहता हूँ
टी0वी0 पर समाचार
बच्चे कहते हैं
बोर मत कीजिए
आ रहा है
होली पर रंगारंग प्रोग्राम
क्रिकेट
और मेरा मस्त सीरियल
समाचार में क्या है ?
राष्ट्रपति ने दी है
देशवासियों को
होली की शुभकामनाएँ !

सोचता हूँ
अपना ब्लॉग ही अच्छा है
यहाँ मिल जाते हैं मुझे
अपने !

क्यों न देखूँ
यहीं कुछ
नये सपने ।

…………………………..

17.3.11

काहे हौआ हक्का-बक्का !


काहे हौआ हक्का-बक्का !
छाना राजा भांग-मुनक्का !

इहाँ कहाँ सुनामी आयल
काहे हौवा तू घबड़ायल
कल फिर उठिहैं सीना ताने
आज भले जापानी घायल

देखा तेंदुलकर कs छक्का
काहे हौआ हक्का-बक्का !

प्रकृति से खिलवाड़ हम करी
नदियन के लाचार हम करी
धरती के दूहीला चौचक
सूरज कs व्यौपार हम करी

खड़मंडल होना हौ पक्का
काहे हौवा हक्का-बक्का

मर गइलन सादिक बाशा
रोच सबेरे 2 जी बांचा
सूटकेस में मिलल प्रेमिका
का खिंचबा जिनगी कs खांचा
 
ऐसे रोज चली ई चक्का
काहे हौवा हक्का बक्का

रमुआं चीख रहल खोली में
आग लगे ऐसन होली में
कहाँ से लाई ओजिया-गोजिया
प्राण निकस गयल रोटी में

निर्धन कs नियति में धक्का
काहे हौआ हक्का-बक्का !

रोज समुंदर पीया बेटा
सुख सुविधा में जीया बेटा
बिजुरी खेत उगावा चौचक
दिल टूटल जिन सीया बेटा

घड़ा पाप कs फूटी पक्का
काहे हौआ हक्का-बक्का !

.........................


हक्का-बक्का = आश्चर्य चकित होना।
मुनक्का = नशे की मीठी गोली जिसे बनारसी खाना खिलाना जानते हैं।
सादिक बाशा = ए. राजा के सहयोगी जो कल मरे पाये गये।
खांचा = स्केच, तश्वीर।

15.3.11

हौ पुराना....!



एक आदमी कुएँ की जगत पर बैठकर रो रहा था । पूछने पर कहने लगा......अभी-अभी नीचे एक कवि कूद गया ! तो..? तुम उसके मरने पर दुःखी हो ? उसने कहा, नहीं...मैं इसलिए रो रहा हूँ कि इसने अपनी कविता सुना दी मगर जब मेरी सुनाने की बारी आई तो कुएँ में कूद गया।

कविता भी पढ़ ला । हौ पुराना.....!

फागु का त्यौहा

जले होलिका भेदभाव की, आपस में हो प्यार
तब समझो आया है सच्चा, फागुन का त्यौहार

हो जाएँ सब प्रेम दीवाने
दिल में जागें गीत पुराने
गलियों में सतरंगी चेहरे
ढूँढ रहे हों मीत पुराने
 
अधरों में हो गीत फागुनी, वीणा की झंकार
तब समझो आया है सच्चा, फागुन का त्यौहार
 
बर्गर, पीजा, कोक के आगे
दूध, दही, मक्खन को खाये !
कान्हां की बंसी फीकी है
राधा को मोबाइल भाये !
 
इन्टरनेट में शादी हो पर, रहे उम्र भर प्यार
तब समझो आया है सच्चा, फागुन का त्यौहार
 
अपने सोए भाग जगाएँ
दुश्मन को भी गले लगाएँ
जहाँ भड़कती नफ़रत-ज्वाला
वहीं प्रेम का दीप जलाएँ


भंग-रंग पर कभी चढ़े ना, महंगाई की मार
तब समझो आया है सच्चा, फागुन का त्यौहार.

..........................................


का कहबा ? कमेंट बाक्स बंद हौ ! जब कोई ऐसी चालाकी करे । अपनी सुना दे, दुसरे को कुछ कहने का मौका ही न दे तो बनारस में कहते हैं ....... हौ पुराना...! वैसे भी चुटकुला, गीत दुन्नो....हौ पुराना ।


बुरा न मानो होली है।
 

8.3.11

चिड़िया

चिड़ि़या उडी
उसके पीछे दूसरी चिड़िया उड़ी
उसके पीछे तीसरी चिड़िया उड़ी
उसके पीछे चौथी चिड़िया उड़ी
और देखते ही देखते पूरा गांव कौआ हो गया !

कौआ करे कांव-कांव
जाग गया पूरा गांव
जाग गया तो जान गया
जान गया तो मान गया
कि जो स्थिति कल थी वह आज नहीं है
अब चिड़िया पढ़-लिख चुकी हैं
किसी के आसरे की मोहताज नहीं है ।

अब आप नहीं कैद कर सकते इन्हें किसी पिंजडे़ में
ये सीख चुकी हैं उड़ने की कला
जान चुकी हैं तोड़ना रिश्तों के जाल
अब नहीं फंसा सकता इन्हें कोई बहेलिया
प्रेम के झूठे दाने फेंक कर
ये समझ चुकी हैं बहेलिये की हर इक चाल
कैद हैं तो सिर्फ इसलिये कि प्यार करती हैं तुमसे
तुम इसे
इनकी नादानी समझने की भूल मत करना

इन्हें बढ़ने दो
इन्हें पढ़ने दो
इन्हें उड़ने दो
इन्हें जानने दो हर उस बात को जिन्हें जानने का इन्हें पूरा हक़ है ।

ये जानना चाहती हैं
क्यों समझा जाता है इन्हें 'पराया धन' ?
क्यों होती हैं ये पिता के घर में 'मेहमान' ?
क्यों करते हैं पिता 'कन्या दान' ?
क्यों अपने ही घर की दहलीज़ पर दस्तक के लिए
मांगी जाती है 'दहेज' ?
क्यों करते हैं लोग इन्हें अपनाने से 'परहेज' ?
इन्हें जानने दो हर उस बात को
जिन्हें जानने का इन्हे पूरा हक है ।

रोकना चाहते हो
बांधना चाहते हो
पाना चाहते हो
कौओं की तरह चीखना नहीं
चिड़ियों की तरह चहचहाना चाहते हो....
तो सिर्फ एक काम करो
इन्हें प्यार करो

इतना प्यार करो कि ये जान जायँ
कि तुम इनसे प्यार करते हो !

फिर देखना...
तुम्हारा गांव, तुम्हारा घर, तुम्हारा आंगन,
खुशियों से चहचहा उठेगा।

4.3.11

व्हाट इज योर मोबाइल नम्बर....?


मौज लेने के लिए लिखी गयी  हल्की-फुल्की छोटी कहानी। कृपया गंभीर साहित्यिक मूड में न पढ़ें....

दोनो साथ पढ़ते थे। लड़के के पिता एक कॉलेज के प्रिंसिपल थे तो लड़की की माँ दूरसंचार में अधिकारी। एक दिन लड़के ने लड़की से पूछा - व्हाट इज योर मोबाइल नम्बर ?  लड़की ने झट से अपनी माँ का मोबाइल नम्बर बता दिया जो वह कभी कभार रंग जमाने कॉलेज में लाया करती थी। फिर उसने लड़के से पूछा - व्हाट इज योर मोबाइल नम्बर ?  लड़के ने भी तुरंत अपने पिता का नम्बर बता दिया जो वह कभी कभार कॉलेज में रंग जमाने लाया करता था।

एक शाम ल़ड़की की माँ ने अपने मोबाइल में एक मैसेज पढ़ा - यू आर वेरी ब्युटीफुल ! पढ़कर वह शर्मा गई। सोंचने लगीं। जरूर अरोड़ा का काम होगा ! चार दिन से मुझे घूर रहा था। मन किया कि जोर की फटकार लगाऊँ मगर फिर रूक गई। चलो मजा लेते हैं। उत्तर दिया...थैंक्स ! यू हैंडसम ! इधर लड़के ने मैसेज पढ़ा तो मोबाइल फेंक नाचने लगा। रात में प्रिंसपल ने मैसेज बाक्स खोला तो पढ़कर दंग रह गया ! चिंतित हो गया। मैने क्या किया जो एक लड़की मुझे इस तरह धन्यवाद दे रही है ?  सेंट मैसेज खोला तो पाया....यू आर वेरी ब्युटीफुल !  समझ गया कि मेरा लड़का किसी लड़की के चक्कर में फंस गया है। फिर सोचा कि चलो लड़की देख लेते हैं। सुंदर सुशील होगी तो हर्ज क्या है ! बहुत से लड़के लव मैरिज करते हैं। मेरा लड़का भी करे तो क्या बुरा है ! लिखा....कल शाम छः बजे पार्क में मिलो। हाथ में गुलाब हो तो समझ जाऊंगा कि तुम भी मुझसे प्यार करती हो !

लड़की की माँ ने पढ़ा तो दो फीट उछल गई ! बड़बड़ाई...इस अरोड़ा के बच्चे को तो मजा चखाना ही पड़ेगा ! दूसरे दिन ऑफिस से छूटते ही पहुँच गई पार्क में। शाम का समय। हाथ में गुलाब। ठीक छः बजे प्रिंसपल साहब आये बहू देखने ! पूरा पार्क छान मारा। कहीं कोई षोड़शी न दिखी। दिखी तो एक प्रौढ़ महिला ! एक हाथ में गुलाब लिये ऐसे खड़ी थी मानो कृष्ण के मोरपंख में गुलाब टांकना चाहती हो ! उधर लड़की की माँ परेशान। कहाँ मर गया अरोड़ा का बच्चा ? आना नहीं था तो मुझे क्यों बुलाया ? लोग क्या सोचते होंगे ? वह बुढ्ढा तो मुझे ही घूर रहा है ! उंह..! झल्लाकर गुलाब झाड़ियों में फेंका और पैर पटकती जाने को हुई कि फोन कि घंटी बजी....हैलो..! कौन..?  उधर से आवाज आई.....तुम कहाँ हो ? मैं कितनी देर से पार्क में खड़ा तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ ? चौंककर पलटी तो कोई नहीं ! सिर्फ वही बुढ्ढा फोन में किसी से बात कर रहा था। अचानक ज्ञानचक्षु खुल गये ! पारा सातवें आसमान पर ! ओह…! तो ये हजरत हैं ! दनदनाती पहुँच गईं प्रिंसिपल साहब के पास ! बोलीं...ऐ मिस्टर ! व्हाट इज योर मोबाइल नम्बर ? प्रिंसपल सकपकाये। थोड़ा हकलाये...! क्यों ? क्यों पूछ रही हैं आप ? क..क..कहीं आपका मोबाइल नम्बर यह तो नहीं ? लड़की की माँ ने सुना तो तिलमिला कर बोलीं...हाँ...यही है ! मगर ज्यादा भोले बनने की जरूरत नहीं है। आपको शर्म आनी चाहिए ! किसी भद्र महिला को इस तरह परेशान करते हुए। प्रिंसिपल साहब भी तमतमा गये...शर्म ! मुझे आनी चाहिए ? आपको नहीं ? क्या जरूरत थी आपको मेरे मोबाइल में संदेश भेजने की ? मोबाइल में हैण्डसम ! सामने बद्तमीज ! लड़की की माँ सकपका गईं। उसे इस तरह के जवाब की उम्मीद न थी। बोली...जरूर हमलोगों को कुछ गलतफहमी हो गई है। आइए बैठकर बातें करते हैं। प्रिंसपल बोले...यह ठीक है। चलिए उस रेस्टूरेंट में चलकर एक कप कॉफी पीते हैं। एक घंटे के बाद दोनो जब उस रेस्टूरेंट से निकले तो उनके ठहाकों की गूँज दूर-दूर तक सुनाई दे रही थी।

कुछ दिनो पश्चात। लड़की ने दुःखी होकर लड़के से कहा.....आजकल एक बुढ़ढा रोज मेरे घर आ रहा है। कल वह मेरी माँ से देर तक हंस-हंस कर बातें कर रहा था। मुझे भी देखा। बोला...यदि आपकी लड़की मेरे साथ रहने को तैयार है तो मुझे यह शादी मंजूर है। लड़का चौंका ! अच्छा ! परसों शाम मेरे घर भी एक महिला आई थी। मेरे पिताजी से खूब हिलमिल कर बातें कर रही थी। पूछ रही थी...आपके लड़के को तो कोई आपत्ति नहीं ? पिताजी बोले उसे क्या आपत्ति हो सकती है ! तो बोली...मुझे यह शादी मंजूर है।

लड़की....इसका मतलब तुम्हारे पिता जी दूसरी शादी करना चाहते हैं ?

लड़का...ठीक कह रही हो। तुम्हारी बातों से भी यही लगता है कि तुम्हारी मम्मी दूसरी शादी करना चाहती हैं !

लड़की...कहीं तुम्हारे पिता प्रिंसिपल तो नहीं ?

लड़का...कहीं तुम्हारी मम्मी दूर संचार विभाग में अधिकारी तो नहीं ?

दोनो एक दूसरे से लिपटकर देर तक रोते रहे। घंटो पश्चात दोनो ने फैसला किया कि अब इस दुनियाँ में जीने से कोई फायदा नहीं। कल सुबह राजघाट पुल से गंगा में कूद कर आत्महत्या कर लेते हैं। हाँ फिर हमारे मम्मी-पापा जैसा चाहें वैसा करें। सुबह ठीक छः बजे मिलने का वादा कर दोनो अपने-अपने घर लौट गये। दोनो ने अपना-अपना सुसाइट नोट तैयार किया....

लड़के ने लिखा...पिता जी ! आपको शादी मुबारक हो...गुड बाय !

लड़की ने लिखा..मम्मी ! आपको शादी मुबारक हो...गुड बाय !

दूसरे दिन। लड़की ने माँ को अंतिम बार देखा। माँ गहरी नींद में सो रही थी। टेबल पर शादी के कार्ड रखे थे। मारे गुस्से के तिलमिलाई....ओह ! तो इनलोगों ने शादी के कार्ड भी छपवा लिये ! इस उम्र में धूम धाम से शादी करेंगे ? आँसूओं को जब्त कर धीरे से एक कार्ड उठा लिया।

पुल पर लड़का उसी का इंतजार कर रहा था। लड़की ने लड़के के हाथ में कार्ड रख दिया। लड़का बोला..यह क्या है ? लड़की बोली...मरने से पहले अपने पिताजी के शादी का कार्ड नहीं देखना चाहोगे ? लड़के ने कार्ड खोला। कार्ड में सुनहरे अक्षरों में उसका और लड़की का नाम लिखा हुआ था ! उसने मारे शर्म के लड़की को कार्ड थमाते हुए कहा...मरने से पहले तुम भी देख लो ! कहीं इस बात का अफसोस न रहे कि जीते जी हम अपने माँ-बाप को ठीक से पहचान नहीं सके !

नीचे नदी के बीच धार में नाव पर बैठा बूढ़ा माझी युवा जोड़े को आपस में लिपटते, रोते, हँसते, खिलखिलाते देख झूम कर गाने लगता है....जै गंगा मैया तोहें पियरी चढ़ैबे.......