11.9.16

मैं न देखता तो....

एक चिड़िया बैठी
नीम की शाख पर
झर गया
एक पत्ता
न चिड़िया चहकी
न आवाज हुई
मैं न देखता तो
पता ही नहीं चलता
आप न पढ़ते तो
जान ही नहीं पाते
एक गिलहरी
ढूंढ रही है
डस्टबीन में
खाना
कुछ पा लिया है उसने
मुँह में दबाकर
भाग गई
खामोशी से
मैं न देखता तो
पता ही नहीं चलता
आप न पढ़ते तो
जान ही नहीं पाते
छांह
रेंगने लगी घांस पर
भाग रहा है
आकाश में
बादल का एक टुकड़ा
मैं न देखता तो
पता ही नहीं चलता
आप न पढ़ते तो
जान ही नहीं पाते
नंगे पांव
दौड़ती आई
एक बच्ची
बैठ गयी बेंच पर
देखने लगी
आँखें फाड़कर
तार पर बैठी चिड़िया को
चमकने लगा
उसका चेहरा
गजब थी
उसके चेहरे की
खुशी!
मैं न देखता तो
पता ही नहीं चलता
आप न पढ़ते तो
जान ही नहीं पाते
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9.9.16

लोहे का घर -19


लिटा कर अपने बर्थ में कहता है लोहे का घर-थके हो, आराम करो। खुशी न दे सको जमाने को तो दर्द के किस्से भी नहीं कहते।
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इंजन मजबूत हो, पटरियाँ सलामत तो तूफान से भी नहीं डरता। अंधेरे में भी चलता, प्यार से सुलाता, झूला झुलाता है 'लोहे का घर'। थके हो तो सो जाओ, ताकत है तो आपस में खूब बहस करो और मूड है तो जुड़ जाओ आभासी दुनियाँ से। जो मर्जी सो करो यह घर ऐसा, जिसमे नहीं कोई घर वाली, नहीं कोई घर वाला। कंकरीट का नहीं लोहे का है। यहाँ टिकट है तो कोई तंग नहीं करता।
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चलते-चलते धीमी हो रही है #ट्रेन की स्पीड। पटरियों की खटर-पटर सुनाई पड़ रही है। शायद कोई स्टेशन आने वाला है। यह सुपर फास्ट है, छोटे-मोटे टेसन को अंगूठा दिखाने के लिए धीमी होती है, ग्रीन सिगनल पाते ही हवा से बातें करने लगती है। रूकना तो कोई नहीं चाहता छोटे स्टेशनो पर मगर सब सुपर फास्ट नहीं होते । बहुतों की जिंदगी पैसिंजर की तरह रेंगने मे ही कट जाती है।
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कुछ दिनो की उमस भरी गर्मी के बाद मौसम सुहाना है। टिप-टिप बारिश का आनंद लेते हुए आ गये अपने 'लोहे के घर' में। पैसिंजर #sjv 50 मिनट विलम्ब से छूटी कैंट स्टेशन से। पूरी#ट्रेन में बिखरे हैं मूंगफली के छिलके। इसमे बैठो तो भारत के मिजाज का पता चलता है। दो बर्थ को अखबार से साफ कर बैठ गये रोज के यात्री। गमछा खुल गया। जम गई तास की चौकड़ी। #समय और #स्वच्छता ठेंगे पर। न तुम सुधरो न हम सुधरेंगे।
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खेत तो खेत स्टेशन भी डूबा है अंधेरे में! #ट्रेन चली तो किसी ने कहा -जफराबाद था। जफर आबाद कब हुआ भाई! दो गज जमी न मिल सकी....।
सत्तर साल की आजादी के बाद भी अंधेरे मे डूबे स्टेशन दिख ही जाते हैं। सारी रौशनी बड़े शहरों ने हड़प ली है शायद।
अंग्रेजों के जमाने का है जलाल गंज का पुल लेकिन थरथराता नहीं है। धड़धड़ा कर गुजर जाता है लोहे का घर। थोड़ी रौशनी है जलालगंज स्टेशन में। कोई अंधेरे मे डूबा, कहीं थोड़ी रौशनी और कोई रोशनी से चकाचौंध! बड़ी बेइंसाफी है यह। समाजवाद के झुनझुने मालगाड़ी पर लदे हैं क्या भाई! #किसान फिर अंधेरे में।
अब रफ्तार पकड़ी है ट्रेन ने। पटरियाँ बदलती है तो ऐसा लगता है जैसे झूला झुला रही है। घर के भीतर रौशनी है। रौशनी मे दिख रहे हैं ऊंघते, मुर्झाये हुए चेहरे। पता नहीं कौन सी मंजिल है सबकी! सफर में दुखी हैं, मंजिल पर पहुँच कर क्या उखाड़ लेंगे! इनसे तो बाहर का अंधेरा ही भला। दूर दिखते टिमटिमाते दिए ही भले। अंधेरों से जूझती जुगनू की रौशनी अच्छी।
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लोहे के घर मे सुबह-सुबह, बैठे-बैठे सोते हुए आदमी को देख मन कैसा तो बेचैन हो गया। लगा कि गलत सीट पर बैठ गये। तभी संजय जी का फोन आया-आवा गुरू! डाक्टर साहब क वीडियो चालू हौ।
एस-2 मे बैठे हैं डाक्टर साहब। लोअर बर्थ में स्पीकर से मोबाइल टिकाये बजा रहे हैं पुराने फिल्मी गीत। आवाज दे कहाँ है, दुनियाँ मेरी जवाँ है। ....ले के पहला-पहला प्यार, भर के आँखों में खुमार, जादू नगरी से आया है कोई जादूगर...।
बाहर हरी-भरी थरती, पटरी पर चलता लोहे का घर और भीतर डाक्टर साहब का मस्त वीडियो। स्पीकर और फोन इतना बढ़िया कि लग रहा घर मे टी.वी देख रहा हूँ। कहाँ वह मनहूस सोता हुआ आदमी, कहाँ ये मस्ती बिखरते डाक्टर साहब!
दरअसल सभी तरह के लोग होते हैं दुनियाँ में, बात सिर्फ इतनी सी है कि आप किसके पास बैठे हैं!।
बज रहा है गीत.....
सब कुछ सीखा हमने ना सिखी होशियारी, सच है दुनियाँ वालों हम हैं अनाड़ी।
सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है....अकड़ किस बात की प्यारे, खुदा के पास जाना है।...
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बाहर वही अंधेरा, भीतर वही शोर। पटरी पर भागता 'लोहे का घर', घर जाते रोज के यात्री। कोई काहू मे मगन, कोई काहू मे मगन। कोई मोबाइल नेटवर्क मे व्यस्त, कोई फालतू की नोंक झोंक मे। कोई-कोई कान मे तार ठूँस देख रहा है फिलिम।
जलालगंज स्टेशन पर रुकी है #ट्रेन। स्टेशन में भी अंधेरा है। क्यों रूकी थी, नहीं पता। रूकी थी तो दुखी थे, चलने पर खुश हुए सभी। जिंदगी की गाड़ी भी जब रूकती है तो घबड़ा जाता है आदमी। समस्या खतम होते ही प्रसन्न हो जाता है। जितनी बड़ी समस्या, उतनी बड़ी खुशी। बड़े सुख की चाहत हो तो बड़े दु:ख को सहने के लिए कलेजा मजबूत करना होता है। यही नहीं कर पाता आम आदमी। पैसिंजर की तरह जो रेंग कर चलते हैं, बार-बार दुखी होते हैं। सुपर फास्ट वालों की जिंदगी में ठहराव की दूरी थोड़ी लम्बी होती है।
यात्री अब थोड़ी बेचैनी मे हैं। जो खुशी ट्रेन पकड़ते समय इनके चेहरों पर थी, खत्म हो चुकी है। अब व्यग्रता है। घर जल्दी पहुँचने की बेचैनी है। मंजिल पास आने का एहसास हो चुका है। आपस की हँसी-ठिठोली खतम हो चुकी है। घर के काम याद आ रहे हैं। आफिस की चिंता से मुक्त हुए अभी बहुत समय नहीं बीता कि घर की चिंता सवार हो गई! खुशी, पटरी के उस पार बिजली के तार पर बैठी शरारती चिड़िया की तरह, पल में ओझल हो जाती है। जिंदगी की ट्रेन/ खुशी के प्लेटफार्म पर/ अधिक देर रूक ही नहीं पाती है।
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30.8.16

शाम जब बारिश हुई....

शाम जब बारिश हुई
झम झमा झम - झम झमा झम -झम झमा झम - झम।
मैं न भीगा - मैं न भीगा - मैं न भीगा
ओढ़ कर छतरी चला था
मैं न भीगा।
भीगीं सड़कें, भीगीं गलियाँ, पेंड़-पौधे, सबके घर आंगन
और वह भी, था नहीं, जिसका जरा भी, भीगने का मन
मैं न भीगा - मैं न भीगा - मैं न भीगा
ओढ़ कर छतरी चला था
मैं न भीगा।
चाहता था भीग जाऊँ------
झर रही हर बूँद की स्वर लहरियों में डूब जाऊँ----
टरटराऊँ
फुदक उछलूँ
खेत की नव-क्यारियों में
कुहुक-कुहकूँ बन के कोयल
आम की नव-डालियों में
झूम कर नाचूँ कि जैसे नाचते हैं मोर वन में
दौड़ जाऊँ
तोड़ लाऊँ
एक बादल
औ. निचोड़ूँ सर पे अपने
भीग जाऊँ
डूब जाऊँ---
हाय लेकिन मैं न भीगा।
ओढ़कर छतरी चला था
मोह में मैं पड़ा था
मुझसे मेरा मैं बड़ा था
मैं न भीगा - मैं न भीगा - मैं न भीगा।
सोचता ही रह गया
देखता ही रह गया
फेंकनी थी छतरिया
ओढ़ता ही रह गया
शाम जब बारिश हुई
प्रेम की बारिश हुई
मैं न भीगा - मैं न भीगा - मैं न भीगा
एक समुंदर बह रहा था
एक कतरा पी न पाया
उम्र लम्बी चाहता था
एक लम्हा जी न पाया
चाहता था युगों से
प्रेम की बरसात हो
भीग जाऊँ-डूब जाऊँ
और प्रीतम साथ हों
हाय लेकिन मैं न भीगा।
ओढ़कर छतरी चला था
मोह में मैं पड़ा था
मुझसे मेरा मैं बड़ा था
मैं न भीगा - मैं न भीगा - मैं न भीगा।
सोचता ही रह गया
देखता ही रह गया
फेंकनी थी छतरिया
ओढ़ता ही रह गया
शाम जब बारिश हुई
प्रेम की बारिश हुई
झम झमा झम - झम झमा झम - झम झमा झम - झम।
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http://kavita.hindyugm.com/2008/07/blog-post_6702.html वो भी क्या जमाना था जब हिन्द युग्म में अपनी कवितायेँ भेजते थे.

लोहे का घर-18

फिर बेतलवा डाल पर, फिर बेचैन #ट्रेन पर। किससे क्या प्रश्न करूँ! किसको क्या उत्तर दूँ? कोई नहीं है आज जो मुझे सुने या सुनाये। सभी अजनबी हैं। सबसे पहले जिस डाल पर बैठा, बोल बम की भीड़ थी। उनके हाव-भाव, बातचीत में सब दुनियादारी थी। नहीं थी तो बस एक भक्ति नहीं थी। मन किया पूछूँ-क्यों समय व्यर्थ करते हो? क्या मिलेगा तुम्हें? फिर सोचा, छोड़ो! इनके मौज में खलल होगा। जल्दी ही मन उचट गया और दूसरी डाल, मेरा मतलब बोगी ढूँढने लगा।
यहाँ सुकून है। पूरी बर्थ खाली है। लोग लेटे हुए हैं अपनी-अपनी बर्थ पर। बस एक आदमी लेटा-लेटा, फोन पर जोर-जोर से बतिया रहा है। उसे लग रहा है कि जोर से बोलेंगे तभी अगला सुनेगा। बात करता-करता पूरा हाल बताये जा रहा है। बात खतम होने के बाद अजनबी की तरह लेट गया। अपनी पूरी कलई खोलने के बाद 'अजनबी से सावधान" वाला मंत्र किस काम का?
सावन में झूला झुला रही है ट्रेन, पटरियों पर झूम कर चल रही है ट्रेन। मन करता है, इसी से पूछूँ - तू चलते-चलते बोर क्यों नहीं होती ? क्या दूसरों की सेवा करने से इतनी ताकत मिलती है!
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बिछी-बिछाई पटरी पर चलती है और इतना रंग जमाती है! कभी पटरी छोड़ कर चलने का मन नहीं करता ? प्रश्न का सही-सही उत्तर दे, वरना मैं तो चला।
तू जायेगा तब जब मैं पटरी छोड़ दूँगी। चुपचाप बैठा रह। एक दूसरे के सहारे ही चलती है जीवन की गाड़ी। बेपटरी चलने की मत सोच। अपनी राह खुद बनाने वाले सदा बेचैन रहते हैं। नई राह मिल भी गई तो क्या फायदा? तुम्हें भी जाना तो वहीँ है न! जहाँ सब जाते हैं?
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आफिस से छूटने के बाद लोहे के घर में लेट कर ठंडी हवा का स्पर्श सुख ही कुछ और है। यह बात वे क्या जाने जो खूँटा छुडा़कर नाद में मुँह घुसेड़ने सीधे घर पहुँच जाते हैं। मनसुख लाल को न यहाँ सुख न वहाँ सुख, खाली मन में सुख। अपन तो फुल इंज्वाय करते हैं लोहे के घर में।
जलाल गंज का पुल पुराना है लेकिन मजबूत है। रोज थरथराता तो है मगर कभी धोखा नहीं देता। #ट्रेन भले इतराती हो- कांप गया मेरे आने से! इसे जरा भी फर्क नहीं पड़ता। आज भी यही हुआ। ट्रेन ने कांपना समझा, पुल ने हाथ उठा कर दुआ किया-जा! तेरी यात्रा मंगलमय हो, सुखी रह।
संजय जी और अशोक जी तार का एक-एक सिरा अपने कान में घुसेड़कर दो सहेलियों की तरह मोबाइल में भोजपुरी फिल्म देख रहे हैं-राजा बाबू। कभी ये ठहाका लगाते हैं, कभी वे। विनय भाई अपने मोबाइल में कुछ देख रहे हैं। एक आदमी और था। उसे मैने अपनी कविता सुनाई तो वह खतरा भांप कर चला गया। मुझे पूरी बर्थ मिल गई लेटने के लिए। कौन कहता है कविता कुछ नहीं देती! ट्रेन में पूरी बर्थ दे सकती है। लोहे के घर का आनंद वे क्या जाने जो.....
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सुखी रहे संसार, दुखी रहे न कोय...सिया वर रामचंद्र जी की जै। भोले के भक्त जौनपुर-भंडारी स्टेशन के मंदिर में इधर यह भजन समाप्त करते हैं उधर बलिया से चलकर हारन बजाती आती है गोदिया। सोचता हूँ कभी 10 मिनट पहले आती तो सुन लेती भजन यह भी। फिर सोचता हूँ ...उसको भजन गा कर दुआ मांगने की क्या जरूरत, जिसका कर्म ही दूसरों की सेवा करना है! 
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लोहे के घर में सुफेद चादर बिछाये-ओढ़े, श्वान निद्रा में सोये लोगों को देखने का सौभाग्य कम ही मिलता है। मोबाइल में कुछ देखते, पढ़ते या सुनते-सुनते अचानक से उठकर फोन मे बातें करने लगते हैं। दूर से खर्राटे भरनेे की आवाजें भी आ रही हैं। लोहे का घर खटर-पटर करता पटरियाँ बदलता भागा चला जा रहा है। कुल मिलाकर बड़ा तिलस्मी माहौल है।
एक ही ट्रेन में कितने घर, कितने रंग जिंदगी के! जनरल मे खड़े-खड़े, आपस में सटे-सटे, लड़ते-झगड़ते चल रहे होंगे। स्लीपर में न कोई चादर, न कोई तकिया पंखे न चलने की शिकायत करते आपस बतिया रहे होंगे। यहाँ ए.सी. में सब कुछ है मगर आपस में कितने कटे-कटे रह रहे हैं लोग! अपने साथ पूरा भारत लिए चलती है #ट्रेन !

लोहे के ए.सी. खिड़की से देख रहा हूँ पानी भरे धान और भुट्टे के खेत। चर रही बकरियों के साथ मेढ़ पर बैठा एक लड़का। धान और रेलवे ट्रैक के किनारे उगे गाजर घास के हिलते पौधों को देख अनुमान लगा रहा हूँ कि बाहर तेज हवा चल रही है। ऊपर आकाश में दक्षिण दिशा से आ रहे हैं काले बादल। देखना है कि उनके बरसने से पहले आगे निकल जाती है ट्रेन या नहायेगी इंजन के साथ झूमकर!
बक्सर आने वाला है। सामने से एक ट्रेन तेजी से निकल गई। कोई शोर नहीं। शायद ए.सी कमरों का यही मजा है। न बाहर की चीख सुनाई पड़ती है, न भीतर का आनंद ही बाहर जा पाता है। #ट्रेन चल दी। जमीन गीली है मतलब बारिश हो रही है। खिड़की के बंद शीशे पर दौड़ने लगीं बूँदें। मैं इन्हें भीतर बुलाकर अपने गालों पर नहीं बिठा सकता। कुछ कमरे ऐसे होते हैं जिनकी खिड़कियाँ नहीं खुलतीं।
गुजरी है करमनासा नदी। कहते हैं यहाँ नहाने से सभी करम नास हो जाते हैं। अपने कर्मो के सत होने का कितना गुमान है लोगों में! पता नहीं सत्य क्या है! यहाँ से उत्तर प्रदेश की सीमा शुरू होती है। ट्रेन, इंजन के साथ बारिश मे भीग रही है। शायद इसे भीगने में अधिक मजा आने लगा। भीगते-भीगते रूक कर भीगने लगी। कोई स्टेशन नहीं दिखता। निछद्दम में रूक कर बारिश का मजा ले रही है। मुझे कोई जल्दी नहीं, मन मर्जी रूक। प्रभु की कृपा है..आनंद ले।
चाय वाला आया है। बोल रहा है-पी लो, राम प्यारी चाय! मैंने पूछा-इसे पीने के कितने दिनों बाद मैं 'राम प्यारा' हो जाऊँगा? मेरा प्रश्न सुन हँसने लगा...हे,हे,हे,हे..राम प्यारे थोड़ी न होंगे, सौ साल जीयेंगे साहेब! मैं बोला-तब लाओ, जल्दी पिलाओ। मैने अपनी बुढ़िया को सदा सुहागन रहने का आशीर्वाद दिया है।
इधर मैने चाय खतम किया, उधर ट्रेन चल दी। बारिश भी थम चुकी है। शीशे पर चिपकी हुई हैं वर्षा की बूँदें। इन बूँदों के उस पार, झिलमिला रहे हैं, पानी में डूबे, धान के खेत।
फिर शीशे पर दौड़ने लगीं बूँदें। फिर होने लगी बरसात। अच्छी फसल होगी धान की इस बार। खेतों के ऊपर उड़ रहे हैं पंछी। इन्हें दाने कहाँ मिलते होंगे इस समय! फलों और कीड़े-मकोड़ों पर करते होंगे गुजारा।
गहमर निकल गया, अब आयेगा अपना पड़ाव-मुगल सराय। पूरी होने को है 18 घंटे की लम्बी यात्रा। जाते समय बिटिया साथ थी, आते समय ये नजारे साथ हैं। बिटिया रूक गई अपने घर। चली भी अपने घर से थी, पहुँची भी अपने घर। समझा रहा है लोहे का घर- मत हो बेचैन! बेटों के केवल एक, बेटियों के होते दो-दो घर।




29.8.16

जन्माष्टमी

हे कृष्ण!

इस बार भी
जिन्हे जन्माष्टमी का मजा लेना था
खूब लिया
झांकी सजाई तुम्हारी
गाई रासलीला भी
जिन्हे बाढ़-बारिश में परेशान होना था
खूब हुए
बच्चा भी जन्मा
नदी पार करते
नाव में
करते रहे क्रंदन
बचा लो अब हमे ईश्वर!

कंस
दिखाई नहीं दिया
मगर
सुनाई देता रहा
अट्टाहास

एक होता तो
दिखाई देता शायद
सभी के
अपने-अपने कृष्ण
सभी के
अपने-अपने कंस।

7.8.16

सुदामा के कृष्ण

हे कृष्ण!
आज भी हैं कालिया नाग
आज भी दरिद्र हैं
सुदामा पाण्डे
महुअर का मंत्र फूँक
कुछ नई लीला कर।
मैं भुने चने लेकर चढ़ जाऊँ डाल पर?
तू आयेगा भूखा-प्यासा?
पूछेगा?
क्या खा रहे हो यार!
आ!
मैं झूठ नहीं बोलुँगा
खा लेना
जितना जी चाहे।
न जाने कब से
डूबी हुई है
बच्चों की गेंद
एक नहीं,
अनेक हैं कालिया नाग
हवा में तैरती
उफनाई नदी में
आ कृष्ण आ!
चावल के दाने के दिन गये
मित्रता संकट में है
बहने भी
घबड़ाई हुई हैं।
..............

29.7.16

लोहे का घर -17

June 10
लोहे के घर में आज एक सदस्य आया. नाम...जुबेर खान। बनारस से चढ़ा था और इसे मुजफ्फरनगर जाना था. इसके साथ इसका जीजा भी सफ़र कर रहा था जो इसे यहाँ ले आया था. यह एक कारीगर था जो आटा बनाने वाली फैक्टरी में छप्पर डालने के काम के सिलसिले में बिहार गया था और काम करने के दौरान छत से गिर जाने के कारण पैर की हड्डी टूट गई थी. वहां डाक्टरों ने बनारस ले जाने की सलाह दी. इसका जीजा मुजफ्फर नगर से सब काम छोड़-छाड़ कर भागा-भागा आया और इसे बनारस के एप्पेक्स हास्पिटल में २९मई को एडमिट कराया.८ जून तक इसका ईलाज चला और इसे डिस्चार्ज कर दिया गया. ईलाज इनकी उम्मीदों से इतना मंहगा पड़ा कि चुकाने के लिए पैसे पूरे नहीं पड़े. आपरेशन सहित कुल खर्च का बिल ६००००/- से अधिक का आया. पैसे जुटाने में इन्हें दो दिन और रुकना पड़ा. ८ के बदले १० जून को अस्पताल से मुक्त हो पाये.
सब ठीक था लेकिन इनको कष्ट इस बात का था कि ईलाज चाहे जितना भी मंहगा हो. वह उनका रेट था, उन्होंने लिया. दो दिन रुकने का रूम का किराया भी ले लिया, कोई बात नहीं. लेकिन दो दिन का नर्स का चार्ज, और भी दूसरे ईलाज का चार्ज क्यों लिया? यह तो वैसे ही हुआ कि होटल में रुकने का किराया लिया और साथ में उस भोजन का पैसा भी ले लिया जो मैंने खाया ही नहीं. आपके बनारस में तो लोग बाहरी लोगों को ऐसे ठगते हैं! इतना बड़ा अस्पताल और ऐसी हरकत! मेरे मुजफ्फर नजर में होता तो अपने भीे भी टांगों का ईलाज उनको कराना पड़ता. अब एक महीने बाद फिर बुलाया है. मैं तो नहीं आउंगा दुबारा कभी बनारस.
अब मैं क्या बोलता! दुखी आदमी अजनबी से झूठ क्यों बोलेगा भला? चुपचाप सुनता रहा और एक फोटू खींच ली टूटे टांग की. पता नहीं सच क्या है! अस्पताल वालों के बिलिंग सिस्टम को समझने में इन्हें धोखा हुआ है या अस्पताल का बिलिंग सिस्टम ही लोगों के साथ धोखा करता है! थोड़े वक्त का साथ. जुबेर खान अपने रस्ते, मैं अपने रस्ते. भगवान करे इसकी टांग ठीक हो जाय और इसे ईलाज के लिए दुबारा बनारस न आना पड़े.

June 13

लोहे का घर
..................

मेरे घर मे छक्के रहते
मेरे घर भिखमंगे

मेरे घर मे बूढे रहते
मेरे घर मे बच्चे।

सभी तरह के लोग यहाँ पर।
मेरे घर मे पानी मिलता
मेरे घर मे दाना
मेरे घर मे गरम पकौडे़ 
मेरे घर मे खाना।

चाय तो हरदम मिलता।
कोई काम नहीं करता है
बैठ के सब बतियाते
लेटे, सोते, बात-बात मे
भारत घूम के आते।

पटरी पर गाड़ी चलती है।
तुम चाहो तो
मेरे घर मे 
आ सकते हो
आभासी 
दुनियाँ मे भी 
जा सकते हो।

लोहे का 
घर है अपना
बहुत बड़ा है
पूरा देश
इसी के दम से
खूब जुड़ा है।
..................

हम घर जाने के लिए जितना मचल रहे थे, ‪#‎ट्रेन‬ उतना छल रही है। भंडारी स्टेशन के भोले बाबा का लिंग छू कर, घंटा हिलाकर, हमको अंधेरे में छोड़ कर लोग चले भी गये लेकिन‪#‎गोदिया‬ नहीं आई। ‪#‎किसान‬ के आने का संकेत हुआ, आई भी, हम दोड़कर बैठ भी गये लेकिन चली नहीं। ऐसा लगा जैसे कह रही हो-चलते-चलते थक गये, कितना चलेंगे! गोदिया के आने का भी संकेत हो गया। हमको लगा, पहले गोदिया ही जायेगी। उतरकर फिर प्लेटफार्म नं 1 से 5 पर पहुँचे। भोले बाबा अंधेरे में अकेले सो रहे थे। गोदिया भी आ गई। साइड लोअर की खाली बर्थ मिल गई, लेटे हैं आराम से। इतना लिख चुके मगर यह चल नहीं रही। लगता है मुझसे ज्यादा आराम से इस ट्रेन का इंजन सो रहा है। प्रभू जी सो गये तो फिर इंजन को काहे का डर! ‪#‎भक्त‬ भजन गा रहे होंगे-सुखी रहे संसार, दुखी रहे ना कोय! अब ट्रेन चले या न चले, अच्छे दिन आ कर ही रहेंगे।
अरे! ट्रेन चल दी!!! ट्रेन को पटरी पर रेंगते देख लोहे के घर के निवासियों को सहसा विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने जल्दी-जल्दी मुण्डी घुमा घुमा कर दोनों तरफ देखा फिर खुशी से चिल्लाये-अपनी ट्रेन ही चली है! मुझे लगा, उनकी खुशी देख प्रभु जी भी नींद से जाग कर बोल रहे हैं-'अच्छे दिन आये कि नहीं आये? आये न! मन से भक्ति करो, सुख से रहो।'
क्या मस्त ठंडी हवा चल रही है! लगता है प्रभु जी की कृपा यूँ ही आती रही तो आज रात्रि 12 बजे तक घर पहुँच ही जायेंगे।
आज फिफ्टी मिल ही गई। मुझे लगा पूछेगी-कहाँ थे इतने दिन? मगर हाय! न पूछना न बात करना रुकने के बाद जोर से हारन बजाने लगी-बैठना हो तो बैठो वरना चली! पूरी लोहे की बनी है, ललमुँही। मरता क्या न करता, बैठ गया। हाड़-मांस वाली भाव नहीं देती, यह तो है ही काले इंजन वाली।
सूरज ढलने के बाद लोहे के घर का मौसम सुहाना है। हवा चल रही है। खिड़कियों से दिख रहे हैं सूखे खेत और भूखे चौपाये। नीम से मिल कर हँस रहा है पीपल। लड़के नही खड़े हैं आम के नीचे, पत्थर लेकर। टूट चुके हैं आम। शायद इसीलिए खामोश हैं। पगडंडियों पर साइकिल चलाते घरों को लौट रहे हैं ग्रामीण। लोहे के घर में शोर मचा रहे हैं चाय-मटर-पानी बेचने वाले। बंगाली में बतिया रहे हैं हावड़ जाने वाले। अपने में मशगूल हैं रोज के यात्री। डूब रहा है सूरज, जाते-जाते घर में झांक रही है गर्मी वाली धूप।
‪#‎ट्रेन‬ चल रही है। वैसे ही जैसे कल चल रही थी, वैसे ही जैसे परसों। बरसों से चल रही है ट्रेन। ट्रेन के साथ मैं भी चल रहा हूँ। मेरे साथ और भी हैं। सबका अपना-अपना ठहराव है, सबकी अपनी-अपनी मंजिल। मेरा न ठहराव न मंजिल। मेरे लिए ट्रेन लोहे का एक घर है जहाँ सुबह-शाम एक/डेढ़ घंटे के लिए रहना फिर उतर जाना है। एक भटकती आत्मा जो कभी इस, कभी उस जिस्म में पनाह पाती है। कुछ देर हंसती-बोलती फिर चुप हो जाती है। मैं कोई यात्री नहीं, दृष्टा हूँ असंख्य यात्राओं का। अक्षीसाक्षी हूँ सुख-दुख का। मेरे लिए हर दिन एक समान।
सामने बर्थ पर पूड़ी-सब्जी खाने के बाद, पति की निगरानी में बच्चे के साथ निश्चिंत सो रही महिला या बगल में बैठे यात्रियों की लम्बी बातचीत से बेखबर अंधेरे में पटरी पर दोड़ रही है अपनी ट्रेन।

आखिर आ ही गई फिफ्टी। प्रतीक्षा करते-करते जब मेरा मन पूरी तरह डाउन हो गया तब हारन बजाती आ ही गई फिफ्टी डाउन। बोगी में चढ़ते ही मन बम-बम हो गया। ऊपर-नीचे जिधर देखो उधर बोल बम। मुड़ी से मुड़ी सटाये, टांग से टांग भिड़ाये। कहीं चित्त लेटे हैं तो कहीं पट। कहीं बैठे-बैठे कर रहे खट पट, खट पट। सभी एक से बढ़कर एक। के केहू से का कम! बोल बम-बोल बम। इन्हें देख ऐसा लगता है कि हनुमान जी के नेतृत्व में सीता जी का पता लगाने वानरी सेना निकल पड़ी है। पानी भले न बरसे इन्हें देख अंग्रेज का बच्चा भी समझ जाता है कि सावन आ गया।
फिफ्टी अपने रंग में है। कछुए की तरह सो चुकी। हमें बिठाने के बाद खरगोश की तरह फुदक रही है। आगे लोअर बर्थ में बैठी कुछ महिलाएं हरा मटर खरीद कर खा रहीं हैं। एक हाथ से अखबार में मटर और दूसरे हाथ में लकड़ी का चम्मच। चहक-चहक कर खा रहीं हैं स्वाद से। बीच-बीच में तीखे दांतों से कट्ट से काटतीं हैं हरा मिर्च। उजाले में भी चमकते हैं सुफेद दांत।
हर स्टेशन पर रूकती है ‪#‎ट्रेन‬ और चढ़ते हैं बोल बम। अब सावन भर रोज के यात्रियों को नींद में भी बोल के सपने आते रहें तो कोई अचरज नहीं।
फिफ्टी डाउन में बोल बम की भीड़ आज भी है। वैसे भी आज सावन का पहला सोमवार है। रिजर्वेशन वाले परेशान हैं। एक तो रोज के यात्रियों की भीड़ ऊपर से बोल बम। राहत की बात यह कि मौसम सुहाना है। बारिश यहाँ नहीं हो रही लेकिन बनारस मे जोरदार होने की खबर है। धीरे-धीरे लोग एडजस्ट हो चुके। जिसे नीचे बर्थ में जगह नहीं मिली वह ऊपर चढ़ गया। इसी भीड़ में हरा मटर बेचने वाले भी बल्टा-झोला लिये घूम रहे हैं। इनका मटर हर मौसम में हरा रहता है। न मटर की कमी, न हरे रंग की और न खाने वालों की। इस समय तो पूरी धरती हरी-भरी है।
सुबह कैंट स्टेशन पर बोल बम की भीड़ में दिखे थे सांड़ और गैये। यह तो अच्छा है कि ‪#‎ट्रेन‬ के दरवाजे छोटे हैं वरना बोगी मे चढ़कर बर्थ में बैठ जाते बनारसी सांड़ तब क्या हाल होता यात्रियों का!


मनहूसियत सी छाई है लोहे के घर में। एक लड़का मोबाइल में शतरंज खेल रहा है बाकि सभी ऊंघ रहे हैं। बोगी में उजाला, बाहर अंधेरा है। उजाले में रहने वाले अंधेरे में खोये हैं। सामने बैठे लम्बी नाक वाले का चश्मा थोड़ा ढीला हुआ। चौंककर चश्मा सीधा किया, तनकर ऊँघने लगा! अधिक देर इस मुद्रा में नहीं ऊँघ पाया। गरदन पीछे बर्थ पर टिका दिया, शरीर को ढीला छोड़ दिया और आराम से ऊँघने लगा। ऐसे ही सभी कर रहे हैं। अलग-अलग अंदाज में ऊँघ रहे हैं। मगर सच्ची बात तो यह है कि कोई ऊँघ नहीं रहा, सभी बेचैन हैं। अपने-अपने अंधेरे में छटपटा रहे हैं। बाहर घनघोर अंधेरा है। पटरी पर चल रही है अपनी ‪#‎ट्रेन‬
july 28

सगरो धान बोआई गयल हौ। कत्तो-कत्तो अभहिन रोपात हौ। पानी में पूरा हल के, धोती कमर में लपेट के, निहुर-निहुर धान रोपत हइन मेहरारु। गीत गावत होइयें सावन क पर हमें सुनाई नाहीं देत हौ। टरेन से दिखाई देला, सुनाई नाहीं देत। जौन दिखाई देला ऊ ठीक से बुझाइयो नाहीं देत। जउन देखे में अच्छा लगsला ऊ करना मुश्किल हौ। धानी चादर ओढ़ मगन हइन धरती माई अउर उनके देख-देख मगन हौ हमरो जीया।
बहुत पागल हउअन ई देश में। चढ़ल हउअन यहू ‪#‎ट्रेन‬ में। बहसत हउअन आपस में। एक मिला दोजख अउर जन्नत समझा रहल हौ। अउर दू मिला पाप-पुन्य, सरग-नरक समझा रहल हउअन। सावन क महीना हौ, पानी बरसत हौ, सामने स्वर्ग जइसन सुंदर सीन हौ लेकिन इन्हहने के आपस में दोजख-जन्नत बहस करे में ढेर मजा आवत हौ! ई अइसन जीव हउअन कि इनहने के सच्चो स्वर्ग में छोड़ दिहल जाये त वोहू के नरक बना देइहें। फेर न मनबा! झूठ कहत हई ? कश्मीर के का कइलन? धरती क स्वर्ग हौ? नरक बना देहलन कि नाहीं?
ई भगवान क कृपा हौ कि पागल हउअन त प्रेमियो ढेर हउअन देश में। यही से गाड़ी चल रहल हौ पटरी पर।