9.9.16

लोहे का घर -19


लिटा कर अपने बर्थ में कहता है लोहे का घर-थके हो, आराम करो। खुशी न दे सको जमाने को तो दर्द के किस्से भी नहीं कहते।
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इंजन मजबूत हो, पटरियाँ सलामत तो तूफान से भी नहीं डरता। अंधेरे में भी चलता, प्यार से सुलाता, झूला झुलाता है 'लोहे का घर'। थके हो तो सो जाओ, ताकत है तो आपस में खूब बहस करो और मूड है तो जुड़ जाओ आभासी दुनियाँ से। जो मर्जी सो करो यह घर ऐसा, जिसमे नहीं कोई घर वाली, नहीं कोई घर वाला। कंकरीट का नहीं लोहे का है। यहाँ टिकट है तो कोई तंग नहीं करता।
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चलते-चलते धीमी हो रही है #ट्रेन की स्पीड। पटरियों की खटर-पटर सुनाई पड़ रही है। शायद कोई स्टेशन आने वाला है। यह सुपर फास्ट है, छोटे-मोटे टेसन को अंगूठा दिखाने के लिए धीमी होती है, ग्रीन सिगनल पाते ही हवा से बातें करने लगती है। रूकना तो कोई नहीं चाहता छोटे स्टेशनो पर मगर सब सुपर फास्ट नहीं होते । बहुतों की जिंदगी पैसिंजर की तरह रेंगने मे ही कट जाती है।
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कुछ दिनो की उमस भरी गर्मी के बाद मौसम सुहाना है। टिप-टिप बारिश का आनंद लेते हुए आ गये अपने 'लोहे के घर' में। पैसिंजर #sjv 50 मिनट विलम्ब से छूटी कैंट स्टेशन से। पूरी#ट्रेन में बिखरे हैं मूंगफली के छिलके। इसमे बैठो तो भारत के मिजाज का पता चलता है। दो बर्थ को अखबार से साफ कर बैठ गये रोज के यात्री। गमछा खुल गया। जम गई तास की चौकड़ी। #समय और #स्वच्छता ठेंगे पर। न तुम सुधरो न हम सुधरेंगे।
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खेत तो खेत स्टेशन भी डूबा है अंधेरे में! #ट्रेन चली तो किसी ने कहा -जफराबाद था। जफर आबाद कब हुआ भाई! दो गज जमी न मिल सकी....।
सत्तर साल की आजादी के बाद भी अंधेरे मे डूबे स्टेशन दिख ही जाते हैं। सारी रौशनी बड़े शहरों ने हड़प ली है शायद।
अंग्रेजों के जमाने का है जलाल गंज का पुल लेकिन थरथराता नहीं है। धड़धड़ा कर गुजर जाता है लोहे का घर। थोड़ी रौशनी है जलालगंज स्टेशन में। कोई अंधेरे मे डूबा, कहीं थोड़ी रौशनी और कोई रोशनी से चकाचौंध! बड़ी बेइंसाफी है यह। समाजवाद के झुनझुने मालगाड़ी पर लदे हैं क्या भाई! #किसान फिर अंधेरे में।
अब रफ्तार पकड़ी है ट्रेन ने। पटरियाँ बदलती है तो ऐसा लगता है जैसे झूला झुला रही है। घर के भीतर रौशनी है। रौशनी मे दिख रहे हैं ऊंघते, मुर्झाये हुए चेहरे। पता नहीं कौन सी मंजिल है सबकी! सफर में दुखी हैं, मंजिल पर पहुँच कर क्या उखाड़ लेंगे! इनसे तो बाहर का अंधेरा ही भला। दूर दिखते टिमटिमाते दिए ही भले। अंधेरों से जूझती जुगनू की रौशनी अच्छी।
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लोहे के घर मे सुबह-सुबह, बैठे-बैठे सोते हुए आदमी को देख मन कैसा तो बेचैन हो गया। लगा कि गलत सीट पर बैठ गये। तभी संजय जी का फोन आया-आवा गुरू! डाक्टर साहब क वीडियो चालू हौ।
एस-2 मे बैठे हैं डाक्टर साहब। लोअर बर्थ में स्पीकर से मोबाइल टिकाये बजा रहे हैं पुराने फिल्मी गीत। आवाज दे कहाँ है, दुनियाँ मेरी जवाँ है। ....ले के पहला-पहला प्यार, भर के आँखों में खुमार, जादू नगरी से आया है कोई जादूगर...।
बाहर हरी-भरी थरती, पटरी पर चलता लोहे का घर और भीतर डाक्टर साहब का मस्त वीडियो। स्पीकर और फोन इतना बढ़िया कि लग रहा घर मे टी.वी देख रहा हूँ। कहाँ वह मनहूस सोता हुआ आदमी, कहाँ ये मस्ती बिखरते डाक्टर साहब!
दरअसल सभी तरह के लोग होते हैं दुनियाँ में, बात सिर्फ इतनी सी है कि आप किसके पास बैठे हैं!।
बज रहा है गीत.....
सब कुछ सीखा हमने ना सिखी होशियारी, सच है दुनियाँ वालों हम हैं अनाड़ी।
सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है....अकड़ किस बात की प्यारे, खुदा के पास जाना है।...
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बाहर वही अंधेरा, भीतर वही शोर। पटरी पर भागता 'लोहे का घर', घर जाते रोज के यात्री। कोई काहू मे मगन, कोई काहू मे मगन। कोई मोबाइल नेटवर्क मे व्यस्त, कोई फालतू की नोंक झोंक मे। कोई-कोई कान मे तार ठूँस देख रहा है फिलिम।
जलालगंज स्टेशन पर रुकी है #ट्रेन। स्टेशन में भी अंधेरा है। क्यों रूकी थी, नहीं पता। रूकी थी तो दुखी थे, चलने पर खुश हुए सभी। जिंदगी की गाड़ी भी जब रूकती है तो घबड़ा जाता है आदमी। समस्या खतम होते ही प्रसन्न हो जाता है। जितनी बड़ी समस्या, उतनी बड़ी खुशी। बड़े सुख की चाहत हो तो बड़े दु:ख को सहने के लिए कलेजा मजबूत करना होता है। यही नहीं कर पाता आम आदमी। पैसिंजर की तरह जो रेंग कर चलते हैं, बार-बार दुखी होते हैं। सुपर फास्ट वालों की जिंदगी में ठहराव की दूरी थोड़ी लम्बी होती है।
यात्री अब थोड़ी बेचैनी मे हैं। जो खुशी ट्रेन पकड़ते समय इनके चेहरों पर थी, खत्म हो चुकी है। अब व्यग्रता है। घर जल्दी पहुँचने की बेचैनी है। मंजिल पास आने का एहसास हो चुका है। आपस की हँसी-ठिठोली खतम हो चुकी है। घर के काम याद आ रहे हैं। आफिस की चिंता से मुक्त हुए अभी बहुत समय नहीं बीता कि घर की चिंता सवार हो गई! खुशी, पटरी के उस पार बिजली के तार पर बैठी शरारती चिड़िया की तरह, पल में ओझल हो जाती है। जिंदगी की ट्रेन/ खुशी के प्लेटफार्म पर/ अधिक देर रूक ही नहीं पाती है।
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6 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (11-09-2016) को "प्रयोग बढ़ा है हिंदी का, लेकिन..." (चर्चा अंक-2462) पर भी होगी।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. यहाँ तो कई घर दिख रहे हैं लोहे के...आपके वाला कौन सा है? लेफ्ट वाला लग रहा है.
    मगर आज तो घर से बाहर हो...!

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  3. रोचक दृश्यावली..विविधता भरी यात्रा का सुंदर और सजीव वर्णन..बधाई !

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