6.10.22

दड़बा


एक दड़बा था जिसमें निर्धारित संख्या में कबूतर रोज आते/जाते थे। कबूतर न सफेद थे न काले, श्वेत से श्याम होने की प्रक्रिया में मानवीय रंग में पूरी तरह रंग चुके थे। कबूतरों के दड़बे में आने का समय तो निर्धारित था मगर जाने का कोई निश्चित समय नहीं था। दड़बे में रोज आना और अनिश्चित समय तक खुद को गुलाम बना लेना कबूतरों की मजबूरी थी।  उनको अपने और अपने बच्चों के लिए दाना-पानी यहीं से मिलता था। 


यूँ तो देश के कानून ने आने के साथ जाने का समय भी निर्धारित कर रखा था लेकिन जिस शहर के मकान में वह दड़बा था उस जिले में राजा ने कबूतरों को नियंत्रित करने और देश हित के कार्यों के लिए जिस बहेलिए की तैनाती कर रखी थी उसे देर शाम तक कबूतरों के पर कतरते रहने में बड़ा मजा आता था। इसका मानना था कि पर कतरना छोड़ दें तो बदमाश कबूतर हवा में उड़ कर बेअन्दाज हो जाएंगे!  


कबूतर भी जुल्म सहने के आदी हो चुके थे। बहेलिए जब किसी एक कबूतर को हांक लगाता, सभी हँसते हुए आपस में गुटर गूँ करते...'आज तो इसके पर इतने काटे जाएंगे कि फिर कभी उड़ने का नाम ही नहीं लेगा!' थोड़ी देर में पर कटा कबूतर तमतमाया, रुआंसा चेहरा लिए गधे की तरह रेंगते हुए  साथियों के बीच आता और मालिक को जी भर कर कोसता। यह साथी कबूतरों के लिए सबसे आनन्द के पल होते मगर परोक्ष में ऐसा प्रदर्शित करते कि उन्हें भी बेहद कष्ट है!


ऐसा नहीं कि बहेलिया सभी के प्रति आक्रामक था। दड़बे में झांकने वाले कौओं, गिलहरियों, लोमड़ियों, चूहे-बिल्लियों, भेड़ियों या शेर को देखकर गिरगिट की तरह रंग बदलने में माहिर था। किसी को डाँटता, किसी को पुचकारता और किसी किसी के आगे तो पूरा दड़बा ही खोल कर समर्पित हो जाता!


एक दिन उद्यान से भटक कर अपने घोसले को ढूँढता, उड़ता-उड़ता एक नया कबूतर दड़बे में आ फँसा! नए कबूतर को देख बहेलिए की बाँछें खिल गईं..'यह तो तगड़ा है! अधिक काम करेगा।' जैसा कि बहेलिए की आदत होती है वे अपने जाल में फँसे नए कबूतरों का तत्काल पर कतर कर खूब दाना चुगाते हैं ताकि वे नए दड़बे को पहचान लें और इसे ही अपना घर समझें। वह भी नए कबूतर पर मेहरबान हो गया। पुराने कबूतर का चारा भी नए कबूतर को मिलने लगा। साथी कबूतर शंका कि नजरों से गुटर गूँ करने लगे..'कहीं मेरा भी चारा यही न हड़प ले!'


नया कबूतर जवान तो न था लेकिन खूब हृष्ट-पुष्ट था।दड़बे में जिस स्थान को उसने बैठने के लिए चुना वह एक युवा कबूतर का ठिकाना था। संयोग से जब नया कबूतर उद्यान से उड़कर आया, वह एक लंबी उड़ान पर था। लम्बी उड़ान से लौट कर जब युवा कबूतर दड़बे में वापस आया  तो उसने अपने स्थान पर नए कबूतर को बैठा हुआ पाया! आते ही उसने नए पर गहरी चोंच मारी। बड़ा है तो क्या ? मेरे स्थान पर बैठेगा? झगड़ा बढ़ता इससे पहले ही साथियों ने बीच बचाव किया और मामला रफा-दफा हो गया। सब समझ चुके थे कि अब यह भी हमारी तरह रोज यहीं रहेगा। नया कबूतर, जो पहले दड़बे में आ कर खूब खुश था, जल्दी ही समझ गया कि मैं गलत जगह आ फँसा हूँ। यह तो एक कैद खाना है! बात-बात में बड़बड़ाता..कहाँ फँसायो राम! अब देश कैसे चलेगा!!!


बहेलिए ने कबूतरों की पल-पल की गतिविधियों की जानकारी के लिए एक #काका_कौआ पाल रखा था। काका कौआ भी मानवीय रंग-ढंग में रंगे कबूतरों के बीच रहते-रहते अपनी धवलता खो कर काला हो चुका था। यूँ तो वह दड़बे की देखभाल के लिए नियुक्त प्रधान सेवक था लेकिन अपने मालिक का आशीर्वाद पा कर हँसमुख और मेहनती होने के साथ-साथ बड़बोला भी हो चुका था। कभी-कभी उसकी बातें कबूतरों को जहर की तरह लगतीं। शायद यही कारण था कि जब काम लेना होता तो सभी कबूतर उसे #काका बुलाते और जब कोसना होता #कौआ कहते! उसका काम था मालिक के आदेश पर कबूतर को दड़बे से निकाल कर उन तक पहुंचाना। जब तक कबूतर ठुनकते, मुनकते हुए मालिक के कमरे तक स्वयं चलकर न पहुँच जाते वह लगातार चीखता-चिल्लाता रहता। न उठने पर हड़काता और मालिक से शिकायत करने की धमकी देता। मरता क्या न करता! काका कौआ को 'कौआ कहीं का!' कहते हुए कबूतर दड़बे से निकल कर मालिक के दड़बे तक जाते। काका कौआ उन्हें हँसते हुए जाते देखता और पीछे से कोई तंज कसते हुए खिलखिलाने लगता। मालिक ने पर नहीं कतरे, सिर्फ धमकी दे कर छोड़ दिया तो वह उड़कर काका को ढूंगता हुआ वापस दड़बे में घुस कर, साथियों के ताल से ताल मिलाकर गुटर गूँ करने लगता।


जैसे सरकारी सेवा में काम करने की एक निश्चित उम्र हुआ करती है वैसे ही यहाँ के कबूतर भी एक उम्र के बाद मुक्त कर दिए जाते थे। उस दिन एक बूढ़े हो चले कबूतर की विदाई थी। साथियों ने धूमधाम से विदाई समारोह मनाया।  विदाई के समय बहेलिए ने भी उसकी लंबी सेवा की सराहना तो खूब करी लेकिन उसके जाने के बाद उसकी गलतियों के दंड स्वरूप उसके द्वारा सेवा काल में बचाए अन्न की गठरी का कुछ भाग जब्त कर लिया और दूसरे कबूतरों से उसके घर खबर भिजवा कर आतंकित करता रहा कि क्यों न तुम्हारे अपराधों के लिए तुम्हें एक काली कोठरी में बंद कर दिया जाय? यह सब देख दड़बे के कबूतर दिन-दिन और भी भयाक्रांत रहने लगे।


सुबह से दड़बे में गुटर-गूँ, गुटर गूँ का स्वर मुखर है। आज सभी कबूतर बहुत खुश हैं। दशहरे की लम्बी छुट्टी हो रही है। सभी को छुट्टी से पहले दाने की मोटी गठरी मिलने वाली है। उद्यान वाले ने तो छुट्टियों में परिवार सहित लम्बी उड़ान पर जाने का निश्चय कर लिया है। दूसरा कबूतर भी दूसरे राज्य में अपने पुराने मित्रों से मिलने जा रहा है। अधिकांश का कहना है हम तो त्योहार अपनी कबूतरी और बच्चों के साथ मनाएंगे। सभी के अपने-अपने हौसले, अपने-अपने सपने हैं। आजादी कितनी प्यारी होती है! 

(काल्पनिक कथा)

4.10.22

सुबह की बातें-12

पत्ते झरते हैं तो शोर नहीं होता। पत्ते उगते हैं तो शोर नहीं होता। हम चीख कर रोते हुए जन्म लेते हैं। गूंगे पैदा हुए तो भी दूसरे शोर करते हैं..लड़का हुआ है/लड़की हुई है! मरते हैं तो भी शोर होता है..राम नाम सत्य है। नहीं, मुर्दे को नहीं सुनाते। चुपचाप खुद स्वीकार भी नहीं करते, राह चलते दूसरों को सुनाते हैं..जगत मिथ्या है, राम नाम ही सत्य है! कितने तो ढोल, नगाड़े बजा कर निकालते हैं शव यात्रा। मसान से लौटने के बाद राम नहीं सिर्फ काम ही काम। हमारे जन्म से लेकर मृत्यु तक एक कोलाहल है। पत्ते खामोशी से उगते, जीवन भर हँसते और एक दिन चुपचाप झर जाते हैं। हम शांतिदूत की तरह पत्ते कोई शोर नहीं करते।  



सुबह की बातें-11

सुबह के 6 बज चुके हैं। जैन मंदिर सारनाथ के पुजारी आ चुके हैं। मन्दिर का गेट खोलने के बाद इनका पहला काम परिंदों को दाना देना है। इनके पास बिस्कुट भी होता है। गेट खोलते समय कुछ कुत्ते दिख गए तो उन्हें प्यार से बिस्कुट भी खिलाते हैं। धमेख स्तूप पर बैठे कबूतरों को इन्ही की प्रतीक्षा होती है। जैसे ही पुजारी दाने बिखेरते हैं, कबूतर उड़-उड़ कर आने लगते हैं। जैसा कि होता है, जब सरकार निर्धनों को अन्न बांटती है, कुछ सबल भी दान लूटने आ जाते हैं। वैसे ही जब पुजारी पंछियों के लिए दाने बिखेरते हैं, दाना चुगने कुछ कौए भी आ जाते हैं! अधिक शोर भी यही करते हैं। कुछ गिलहरियां भी आ जाती हैं। हम ट्वीटर पर ट्वीट करते हैं, ये परिंदे यहाँ खूब चहकते हैं।



सुबह की बातें-10

सुबह-सुबह घने नीम के वृक्षों से धमेख स्तूप तक अनवरत उड़ते रहने वाले तोते सन्डे नहीं मनाते। कोई ऑफिस नहीं, कोई छुट्टी नहीं। ये जब स्तूप से उड़कर वापस नीम की शाखों पर बैठते हैं तो कुछ कौए काँव-काँव करने लगते हैं। ऐसा लगता है जैसे नास्तिक पितृपक्ष में ब्राह्मणों के भोजन का उपहास उड़ा रहे हों! तोते भी टांय-टांय कर प्रतिरोध करते हैं। 


धूप तेज हो चली है। घने नीम से अनवरत एक-एक कर पीले पत्ते झर रहे हैं। कोयल के साथ पेड़की ने खूब समा बांधा है।  ये क्या कहते हैं, कुछ समझ में नहीं आता।  गिलहरियों का फुदकना बदस्तूर जारी है। लॉन में कई प्रकार के पौधे हैं मगर कोई आपस में नहीं झगड़ते। कोमल लताएँ सूखे वृक्ष के सहारे ऊपर तक चढ़ जाती हैं। कोई किसी की टांग नहीं खींचता। 


झाडू लगाने वाला आ चुका है। उसने झाड़ू से पत्तों को एक स्थान पर इकट्ठा कर लिया है, जिस पर सूर्य की स्वर्णिम किरणें पड़ रही हैं। ऐसा लगता है जैसे झाड़ू वाले ने झाड़ू लगाकर कुछ सोना इकठ्ठा कर लिया है! अब चलना चाहिए। आज की सुबह रोज की तरह आनंद दायक रही।



30.8.22

साइकिल की सवारी 2

भोर में साइकिल लेकर बाहर घूमने के लिए निकले तो ध्यान था कि आज सन्डे है, रोज तो सारनाथ घूमते ही हैं, दूर चला जाय। बाहर अँधेरा था, आकाश में बादल घिरे थे, रेन कोट का ऊपर का हिस्सा पीछे साइकिल के कैरियर में यह सोचकर दबा दिया कि बारिश हुई तो काम आएगा। 


अकेले घूमने का यही आनन्द है, जो मर्जी करो, जहाँ दिल करे जाओ, कोई रोकने वाला नहीं। हम सारनाथ से आशापुर, पँचकोशी चौराहे से बाएँ मुड़कर सलारपुर वाली क्रासिंग पार किए ही थे कि बारिश शुरू हो गई। साइकिल रोककर रेन कोट के ऊपर वाला हिस्सा पहने और नीचे पहले से हाफ बरमूडा पहन कर चले ही थे, भीगने की चिंता तो थी नहीं। हाँ, मोबाइल भीगने की चिंता थी, उसे रुमाल से लपेट कर रख लिए, जो होगा, देखा जाएगा। 


बारिश में सायकिल चलाने का आनन्द ही और है लेकिन रेन कोट में मजा नहीं आ रहा था। बारिश से ज्यादा तो पसीने से भीग चुके थे। आगे आदिकेशव घाट से पहले जहाँ वरुणा, गंगा से मिलती हैं, साइकिल/मोटर सायकिल जाने लायक चार लेन का पक्का पुल बना है। यहीं से बसंत कॉलेज( महिला महाविद्यालय) जाने का रास्ता शुरू होता है। यह सड़क कृष्ण मूर्ति फाउंडेशन की निजी जमीन पर बना है शायद इसीलिए यहाँ प्रबंध संस्थान ने चार पहिया जाने लायक पुल निर्माण की अनुमति नहीं दी। अच्छा ही हुआ, इससे इस मार्ग का वातावरण आज भी भीड़ भाड़ से दूर शांत, रमणीक है। सड़क के दोनों तरफ हरियाली है और कैंपस बने हुए हैं।


मन नहीं माना तो रेनकोट उतार कर फिर पीछे कैरियर से दबा दिए और बारिश में भींगते हुए/ साइकिल चलाते हुए खिड़किया घाट पहुँचे। यहाँ का नजारा अलग था। पार्किंग की जगह भी बंद कर दी गई थी। गंगा में आई बाढ़ के कारण घूमने के सभी रास्ते बंद थे। राजघाट पुल के ठीक नीचे, एक स्थान पर छांव में लोग रुककर बारिश और बाढ़ के पानी का आनन्द ले रहे थे। हमने भी सायकिल वहीं किनारे खड़ी करी और रुककर नजारे लेने लगे। 


ध्यान आया, गेट पर खड़े चौकीदार नीचे जाने से मना कर रहे हैं, वहीं एक किनारे गोवर्धनदास (श्री कृष्ण जी ) का मंदिर भी है। भारत में मंदिर जाने से तो कोई मना कर नहीं सकता। सीधे गेट पर गया और बोला, "मन्दिर जाना है।" द्वारपाल ने तुरत गेट खोल दिया और बोला, "जाइए, मन्दिर जाने की मनाही नहीं है लेकिन गंगा घाट की ओर मत जाइएगा, नदी में बाढ़ है।" मैं मन्दिर पहुँचा तो देखा वहाँ अच्छी खासी संख्या में लोग जमा हैं। खुले हॉल में योग की कक्षा चल रही है। पुरुष/महिला दोनो जमा हैं। तब समझ में आया केवल मैं ही बहादुर नहीं हूँ,  ध्यान/योग के शौकीन काशी में बहुत हैं।


थोड़ी देर बैठने, योग का नजारा लेने, दर्शन करने के बाद मैं अपने असली उद्देश्य में लग गया। गंगा में आई बाढ़ की तस्वीरें खींचने लगा। घाट बचे ही नहीं थे तो जाता कैसे? सब पानी में डूब चुके थे। खिड़किया घाट पर लगा नमो नमः का स्कल्पचर भी डूब चुका था, केवल कलाई से जुड़े तीन हाथ दिख रहे थे। फोटो खींच कर लौट आया। 


बारिश में साइकिल लेकर चढ़ाई चढ़ने लगा तो याद आया, आते समय क्या मौज से साइकिल पर बैठकर फर्राटे से लुढ़कते हुए नीचे उतरा था! वही राह, वही दूरी लेकिन चढ़ते समय हँफरी छूट गई, उतरते समय कितना मजा आ रहा था!!! ज्ञान हुआ, जीवन के एक ही मार्ग पर, एक समान रास्ते पर चलते हुए भी कभी ढलान/ कभी चढ़ाई मिलती है। हम ढलान पर बहुत खुश और चढ़ाई देख बहुत दुखी हो जाते हैं, जबकी एक के बाद दूसरे से सामना होना ही है। सारनाथ से राजघाट तक लगभग 20  किमी जाते/जाते जितनी चढ़ाई मिली होगी, ठीक उतनी ही ढाल मिली होगी। न एक इंच कम न एक इंच ज्यादा लेकिन ढलान पर लुढ़कते समय पता नहीं चला, चढ़ाई भारी लगने लगी। यही होता है, सुख के पल बीत जाते हैं, पता नहीं चलता। दुःख के पल काटने भारी पड़ जाते हैं। सभी आदमी साइकिल चलाए तो यह ज्ञान हो जाय, जीवन जीना कितना आसान है!


बसन्त महाविद्यालय से निकलते समय अमृत कुंड वाला कुँआ भी मिला लेकिन बारिश के कारण न कोई वहाँ था न पानी पीने की इच्छा ही थी। हम सायकिल चलाते हुए लौट चले। आदिकेशव घाट पर विष्णुजी की बहुत सुंदर प्रतिमा और बढ़िया मन्दिर है। घूमने का मोह छोड़ नहीं पाया। बारिश का आनन्द लेते हुए फोटो भी खींचा और दर्शन भी किया। वहीं  एक आदमी घाट पर प्रेम से गोता लगा रहा था। पूछने पर अपना नाम झींगुर बताया। यह रोज इसी घाट पर नहाने आता है। नदी में बाढ़ आने या बारिश होने का उसपर कोई प्रभाव नहीं था।


यहाँ से पुल पार कर आगे लौट चले तो सराय मोहाना, कोटवा के बाद पड़ने वाली पुलिया का खयाल आया। अब बारिश बहुत कम हो चुकी थी। हलकी बूंदाबांदी हो रही थी। सोचा, वहीं आराम करेंगे, शिवराम मिलेंगे। पुलिया पर पहुंचा तो वहाँ कोई न था। कुछ देर अकेले बैठा तो सोचा, शायद बारिश के कारण आज शिवराम नहीं आये। उनसे कहा तो था कि अगले अतवार को मिलेंगे! फिर सोचा, वो कोई सरकारी नौकर थोड़ी हैं, उनके लिए कैसा इतवार और सोमवार। जिस दिन मौसम खराब उस दिन छुट्टी, जिस दिन आकाश साफ, चले मजूरी पर। अब शिवराम ही नहीं मिले तो आगे क्या लिखें, जय राम जी की।

....@देवेन्द्र पाण्डेय।

(चित्र चित्रों का आनंद में है।

http://mereephotoo.blogspot.com/2022/08/blog-post_28.html?m=1 ) 

http://mereephotoo.blogspot.com/2022/08/blog-post_24.html?m=0

1.8.22

लोहे का घर 62

लोहे के घर में अकेले बैठे हों तो कुछ लिखने के लिए मोबाइल पर उँगलियाँ चलने लगती है। लिखने के लिए बड़ा अनुकूल माहौल है। लखनऊ-बनारस शटल एक्सप्रेस की ए.सी. चेयर कार वाली बोगी में 2 नम्बर की बर्थ है। सो नहीं सकते, बैठना मजबूरी है। बैठकर करेंगे क्या? सामने बंद दरवाजे के सिवा कुछ नहीं। अपनी विंडो सीट है, शाम के 6.30 बजने वाले हैं, बाहर अभी उजाला है, बाहर झाँक सकते हैं। अच्छी भली समय से प्लेटफार्म पर लगी ट्रेन को 15 मिनट लेट चलाया मालिक ने! कोई मजबूरी होगी। अभी कबाड़ इलाके से रेंग कर आगे बढ़ रही है, रफ्तार पकड़ेगी तब बाहर झाँकने लायक दृश्य दिखेंगे। 


बगल में 3 नम्बर वाली एक बर्थ पर एक युवा बैठा था, तभी एक प्रौढ़ दम्पती हिलते हुए आकर अनुरोध करने लगे, "वहाँ बैठ जाते तो हम लोग साथ बैठ जाते? हमारी एक सीट, 4 नम्बर यहाँ, एक वहाँ मिल गई है" युवक शरीफ निकला, झट से अपना झोला उठाकर यहाँ से वहाँ हो गया!" शरीफ लोगों से बहुत अनुरोध नहीं करना पड़ता, वे झट से झोला उठाकर चल देते हैं। इसके लिए आपके अनुरोध में दम होना चाहिए। यह नहीं कि शरारतन अगले से कहें,"झोला उठाओ, चले जाओ!" अगला कहेगा,"नहीं जाएँगे, अभी और तुम्हारी छाती पर और मूंग दलेंगे, क्या कर लोगे?"


मेरे पीछे 5,6 नम्बर वाली बर्थ का भी यही आलम था, एक जोड़े की सीट आगे-पीछे हो गई थी। यहाँ भी 'सिंगल' अपना झोला उठाकर चला गया। सिंगल' के साथ अक्सर लफड़ा हो जाता है, जोड़े रंग जमा कर, सार्वजनिक सीट से ऐसे ही उठा देते हैं। भले अपने घर में घुसने के बाद ये जोड़े एक दूसरे का मुँह देखना पसंद न करते हों लेकिन सामाजिक मर्यादा है, क्या किया जाय? कैसे अपनी बीबी को दूसरे युवा के साथ बैठने दिया जाय? मर्यादा भी तो निभानी है! मुझे तो लगता है, आजकल लोग मन से न चाहते हुए भी, मर्यादा पुरुष बने घूमते हैं! 


मैं भी यहाँ सिंगल हूँ लेकिन मेरे साथ यह लफड़ा नहीं हुआ। एक नम्बर सीट पर एक नौजवान आया और अपना झोला रखकर चला गया! ट्रेन चल दी, नहीं आया!!! मैं घबड़ाने लगा, झोला रखकर कहाँ गायब हुआ? कहीं झोले में कुछ गड़बड़ समान तो नहीं! तभी वही युवक काले पैंट-कोट में चार्ट लेकर सामने आ गया,"आपका नाम?" ओह! तो यह टी टी है!!! भगवान कितना दयालु है! इस ट्रेन में, एक नम्बर की बर्थ टी टी की होती है, यह आज पता चला।


बाहर का दृश्य बहुत सुहाना है। हरी भरी धरती, कहीं खेत चरते चौपाए, कहीं भरे पानी मे डूबे धान, बरश चुके बादलों से खाली हुआ साफ आसमान, हरे/घने पेड़, छा रहा अँधेरा, जा रहा उजाला और घास का भारी गठ्ठर सर पर लादे, मेड़-मेड़ जा रही, भउजाई!


अब बाहर अँधेरा अधिक हो चुका है। शीशे से बाहर झाँको तो अपनी ही परछाई दिख रही है! बोगी में भीतर उजाला हो चुका है। सभी लाइट जल चुकी है। यही होता है। जब भीतर रोशनी होती है तो बाहर देखना भी चाहो, दर्पण की तरह अपना चेहरा ही दिखने लगता है! पता नहीं, अपने भीतर कब दीपक जलेगा? और जान पाएंगे, 'कौन हैं हम?' कब खतम होगा, मैं?"

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19.7.22

साइकिल की सवारी 1

दुर्घटना के बाद मोटरसाइकिल चलाने पर प्रतिबंध ही नहीं लगा मेरी मोटरसाइकिल श्रीमती जी द्वारा बेच भी दी गई। मैं दुखी होकर मोटरसाइकिल को जाते हुए देखता रह गया। अब घर से 5 किमी के दायरे में जाने के लिए भी 'पैदल' हो गया। कुछ ही विकल्प थे..पैदल चलो, कार के लिए ड्राइवर बुलाओ या रिजर्व गाड़ी बुलाओ। 3,4 किमी के लिए यह महंगा सौदा था। तभी तय किया कि सायकिल खरीदी जाय। दूर भीड़ वाली सड़क पर न ले जाने के आश्वासन के साथ मुश्किल से साइकिल खरीदने की अनुमति मिली और मैं रोज एक महीने से भोर में सायकिल लेकर निकलने लगा। 


घर से सारनाथ पार्क लगभग 3 किमी की दूरी पर है। भोर में 5 बजे सायकिल लेकर पार्क में जाना, सायकिल खड़ी कर एक घण्टे पार्क में घूमना, साइकिल लेकर चाय पीते, फल/दही खरीदते हुए, आराम-आराम से वापस आना, नहाकर नाश्ते के बाद 7.30 तक ऑफिस जाने के लिए घर छोड़ देना, 1.30 घण्टे बस के सफर में फेसबुक चलाना, 9.30तक ऑफिस पहुँच जाना, दिनचर्या बन गई। 


सन्डे(छुट्टी के दिन) दिनचर्या बदल जाती है। जिस दिन ऑफिस नहीं जाना होता, मन बहक जाता है। आज सन्डे था, सायकिल पर बैठते ही मन उड़ने लगा। लगभग 1 घण्टे, गांव के रास्ते साइकिल चलाकर पहुँच गया खिड़किया_घाट। खिड़किया घाट अब नमो_घाट के रूप में विकसित, बनारस के बेहतरीन घाटों में से एक, भव्य घाट बन चुका है। सड़क मार्ग, जल मार्ग और रेलमार्ग से जुड़ा यह घाट बनारस का सबसे खूबसूरत घाट है। इस घाट के बगल में खूबसूरत पर्यटन स्थल हैं। राजघाट के पुल के अलावा सन्त रविदास का भव्य मंदिर है, लाल खान का मकबरा है, वरुणा और गंगा का संगम तट, आदिकेशव घाट है और काशी हिंदू विश्वविद्यालय से सम्बद्ध बसन्त कॉलेज है। बसंत कॉलेज से आदिकेशव घाट जाने का, हराभरा रमणीक मार्ग है और मार्ग में मिलता है एक जिंदा कुँआ जिसका पानी आज भी बहुत मीठा है।


सारनाथ से आदिकेशव घाट, बसन्त कॉलेज होते हुए राजघाट जाने के मार्ग में और भी बहुत कुछ है।  पँचकोशी परिक्रमा के भीतर स्थित कपिलधारा है, सूर्यदेव_का_मंदिर है, सुंदर तालाब, हनुमानजी, शनि देव और शंकर जी का मंदिर है जिनके चित्र मैं अपने पेज चित्रों का आनंद  में दिखाता रहता हूँ। मार्ग में एक श्मशान घाट और निषाद राज का द्वार भी मिलता है।

 

आज बसन्त कॉलेज के कुएँ (#अमृत_कुण्ड) का पानी पीकर लौटते समय एक पुलिया दिखी। पुलिया में 4 स्थानीय ग्रामीण बैठे हुए हवा खा रहे थे और गप्पें लड़ा रहे थे। उन चारों में नेपाली टोपी पहने बहादुर भी दिखे जो बायीं हथेली पर रखी सुर्ती दाएं हाथ के अंगूठे से रगड़ रहे थे। हम भी थके थे तो वहीं साइकिल खड़ी कर उनसे गप्पें लड़ाने लगे। उन्होंने तीन गांव का नाम लिया और हाथ के इशारे से बताया यह गांव इधर, वह  गाँव उधर और हम जहाँ बैठे हैं, उस गाँव का नाम यह है। गाँव के नाम में क्या रख्खा है, हम भूल गए और याद कर लिख भी दें तो आप कौन सा ज्ञान में वृद्धि कर लेंगे! 


पुलिया में बैठकर, ग्रामीणों से बात कर, बहुत आनन्द आया। मुझे पुलिया वाले श्रीमान कानपुर के अनूप शुक्ल  जी की बहुत याद आई फिर याद आया, वे तो अभी अकेले कश्मीर घूम रहे हैं! अपने दौड़ गुरु श्रीमान Satish Saxena  जी की भी याद आई जो अभी जर्मनी में श्रीमान Raj Bhatia  जी के गाँव में घूम रहे हैं। हम पुलिया पर बैठकर यही सब सोच रहे थे कि नेपाली बहादुर ने खैनी मेरी ओर बढ़ाते हुए पूछा, आप भी लेंगे? दूसरा समय होता तो खुशी-खुशी झट से ले लेता मगर इनकार करते हुए बहादुर को धन्यवाद दिया। ग्रामीणों ने सुर्ती न खाने के लिए जब मेरी बहुत प्रशंसा करी और अपनी आलोचना करी कि सुर्ती खाना गलत बात है लेकिन आदत पड़ गई, क्या करें! तो मुझे अपने न्यूरो डॉक्टर पर बहुत गुस्सा आया जिसने मुझे दवाई चलने तक नशा करने से मना किया हुआ है।


बहुत देर बैठने, गप्पें लड़ाने के बाद जब धूप तेज होने लगी तो मैं पुलिया से उतरा और सबसे विदा लेकर घर की ओर चल दिया। रास्ते भर सोचता रहा, काशी सिर्फ अस्सी घाट, संकटमोचन, BHU, गोदौलिया, बाबा विश्वनाथ जी का दरबार या गलियों की चाय-पान की अड़ी ही नहीं है, काशी में बहुत कुछ है जिसे काशीवासी भी एक जीवन मे पूरा नहीं देख पाते।

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