14.7.12

दो ब्लॉगर, दो कवि और एक काव्य गोष्ठी।

प्रसिद्ध कवि,  सम्मानित प्रकाशक और नौसिखिया ब्लॉगर पं0 उमा शंकर चतुर्वेदी 'कंचन' जी  के संकट मोचन स्थित आवास पर आज मास के द्वितीय शनिवार की शाम एक पावस कवि गोष्ठी का आयोजन हुआ। एक तो अल्प सूचना ऊपर से रिम-झिम बारिश का परिणाम यह रहा कि मुझे लेकर मात्र चार कवि ही पहुँच पाये। मैं जब वहाँ पहुँचा तो 'कंचन' जी प्रकाशक की भूमिका में नज़र आये। अपने प्रकाशन की दो नवीनतम पुस्तकों को सरिया रहे थे। अभी इनका लोकार्पण भी नहीं हुआ है। मैने मौका ताड़ा और एक फोटू हींच लिया....



बायें-पं0 उमा शंकर चतुर्वेदी जी, बीच में प्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री विंध्याचल पाण्डेय 'सगुन' तथा सबसे दायें वयोवृद्ध साहित्यकार हिंदी गज़ल के बेजोड़ बादशाह आदरणीय श्री परमानंद आनंद जी।

अपनी पुस्तकों को लेकर प्रकाशक महोदय खासे उत्साहित नज़र आये लेकिन एक भी पुस्तक पढ़ने के लिए नहीं दी। मेरे आग्रह करने पर मुस्करा कर टाल गये। सब आप ही का है। अभी लोकार्पण नहीं हुआ है। मैने पुस्तकों की बंधी गठरियों के तश्वीर भीं खींच लिये। एक 'बेनीपुरी की साहित्य यात्रा' तो दूसरी भोजपुरी छंद में लिखी 'लव-कुश'। 'बेनीपुरी की साहित्य यात्रा' तो प्रसिद्ध पुस्तक है। यह विश्वविद्यालय प्रकाशन से भी प्रकाशित हो चुकी है। 'लव-कुश' बलिया के वयोवृद्ध कवि श्री तारकेश्वर मिश्र 'राही' का भोजपुरी में लिखा खण्ड काव्य है। दोनो पुस्तकें अच्छी लग रही थीं। पढ़ने के बाद इस पर प्रतिक्रिया देना उचित होगा।


पुस्तकें हटायी गयीं और मौसम और बनारस की खस्ताहाल सड़कों को कोसा गया जिनके कारण दूसरे कवि नहीं आ पाये। मैने अपना कैमरा कंचन जी के सुपुत्र को पकड़ा दिया और फोटो खींचने का आग्रह किया। आखिर हमारी भी फोटू आनी चाहिए कितनी दूसरों की ही खींचता रहूँ ? वयो वृद्ध कवि परमानंद आनंद का साथ अब कितने वर्षों का है कौन जाने भगवान उनको लम्बी उम्र दे। कविता के प्रति समर्पण का उनका यह भाव गज़ब का है जो इस मौसम में भी उन्हें यहाँ खींच लाया। वैसे मेरे पहुँचने तक बारिश रूक चुकी थी और बादलों  से  छन-छन कर प्रकाश कमरे में आ रहा था।


मेरी और 'कंचन' जी की कवितायें तो आप पढ़ते ही रहते हैं। विंध्यांचल पाण्डेय जी की कविता फिर कभी। गोष्ठी में सुनायी गई आनंद परमानंद जी की हिंदी गज़ल के कुछ अंश आपको पढ़ाता हूँ। परमानंद जी नेट से नहीं, सड़क से जुड़े हैं। ये कवितायें कवि का परिचय आपसे कराने में स्वयम् समर्थ हैं। कविता सुनाने से पहले परमानंद आनंद जी ने कहा...

आज तो  साहित्य का दौर इतना बेढंगा हो गया है कि कोई किसी को पूछने के लिए तैयार नहीं है। सब अपने लिये व्याकुल है, अपने लिये चिंतित है। ऐसे समय में कंचन जी का बुलावा बहुत अच्छा लगा। काव्य गोष्ठियाँ कविता की दृष्टि से., साहित्य की दृष्टि से बहुत उपयोगी होती हैं और इनका  बहुत महत्व है। हम एक दूसरे की आलोचना, समालोचना करते हैं। इनसे बहुत कुछ सीखने को मिलता है। उन्होने सुनाया....

जिंदगी में जिस तरह हो संतुलन रख्खा करो
एक अच्छे आदमी का आचरण रख्खा करो।

हो अगर अच्छे, तो अच्छा और होने के लिये
गैर की अच्छाइयों का संकलन रख्खा करो।

प्यार मुश्किल है मगर बिलकुल असंभव है नहीं
अपने भीतर प्यार का तुम उपकरण रख्खा करो।

क्यों न सूरज-चाँद आंगन में तुम्हारे आयेंगे
अपने भीतर दूर तक निर्मल गगन रख्खा करो।

कौन किसका है यहां ! विश्वास  ये कैसे करूँ ?
तुम अगर अपने हो तो केवल स्मरण रख्खा करो।
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इस गज़ल में कवि की पीड़ा साफ झलकती है ः-


पुत्र जिनके श्लोक जैसे, बेटियाँ होतीं ऋचा
वे पिता-माता लगे वैदिक कथाओं की तरह।

प्यार तरुवर को धराशायी न करना आँधियों
हम लिपट कर जिनसे रहते हैं लताओं की तरह।

कौन सी अपनी दिशा होगी कभी सोचा नहीं
चार अपने पुत्र हैं चारों दिशाओं की तरह।

अपना संयोजन भी होगा ये कभी संभव नहीं
हम बहुत बिखरे दिंगबर की जटाओं की तरह।

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इस गज़ल में मध्यम वर्गीय परिवार की बेबसी के साथ-साथ समाज़ की उपेक्षा पर गहरा कटाक्ष भी हैः-

खेलते होंगे  कहीं जाकर उधर बच्चे मेंरे
वो खुला मैदान तट पर है जिधर बच्चे मेरे।

भूख में लौटा हूँ पैदल रास्ते में रोक कर
मांगते हैं सेव, केले ये मटर बच्चे मेरे।

साइकिल, छाता, गलीचे भी बनाना सीखलो,
काम देते हैं गरीबी में हुनर बच्चे मेरे।

भूख, बिमारी, उपेक्षा, कर्ज, महंगाई, दहेज
सोच ही पाता नहीं जाऊँ किधर बच्चे मेरे।

जंतुओं के दांत पंजों में जहर होता मगर,
आदमी की आँख में बनता जहर बच्चे मेरे

जो मिले खा-पी के सो जा, मत किसी का नाम ले,
कौन लेता है यहां, किसकी खबर, बच्चे मेरे।

संस्कृतियाँ जब लड़ीं सदियों की आँखें रो पड़ीं,
खण्डहर होते गये कितने शहर बच्चे मेरे।

यह बनारस है यहाँ तुम पान बनकर मत जिओ,
सब तमोली हैं तुम्हें देंगे कतर बच्चे मेरे।

तुम मेरे हीरे हो, मोती हो, मेरी पहचान हो,
मेरे सब कुछ, मेरे दिल, मेरे जिगर बच्चे मेरे।

गालियाँ गालिब, निराला भूख सहते थे यहाँ
यह कमीनों का बहुत अच्छा शहर बच्चे मेरे।

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10.7.12

सावन


गड़गड़ कड़कड़, घन उमड़ घुमड़
टिप् टिप् टिप् टिप् टिप् टिपिर टिपिर
धरती पर बूंदें गिरती हैं
झर झर झर झर, झर झरर झरर।

मन फर फर फर फर उड़ता है
तन रूक रूक छुक छुक चलता है
सावन की रिम झिम बारिश में
दिल धक धक धक धक करता है।

यादों की खिड़की खुलती है
इक सुंदर मैना दिखती है
पांखें फैलाती झटक मटक
तोते से हंसकर मिलती है।

वो लंगड़े आमों की बगिया
वो मीठे जामुन के झालर
वो पेंग बढ़ा नभ को छूना
वो चोली को छूते घाघर।

पर इंद्र धनुष टिकता कब है?
कुछ पल में गुम हो जाता है
मोती वाले पल मिलते हैं
चलना मुश्किल हो जाता है।

कुछ कीचड़ कीचड़ रूकता है
फिर एक कमल खिल जाता है
कुछ भौंरे गुन गुन करते हैं
दिन तितली सा उड़ जाता है।

……………………

इस गीत को अर्चना जी (मेरे मन की) के मधुर स्वरों में नीचे सुन सकते हैंः-



नोटः चित्र मनोज जी के ब्लॉग से उड़ाया हूँ।

8.7.12

बोल बम !



 काहे ठिठके कदम!
 चल कांवरिया
बोल बम।
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दिनांकः 8-7-2012 
समयः  सुबह का समय
स्थानः  काशी हिंदू विश्वविद्यालय का विश्वनाथ मंदिर
प्रतिमाः महामना मदन मोहन मालवीय।

5.7.12

सरकारी अनुदान



झिंगुरों से पूछते, खेत के मेंढक...

बिजली कड़की
बादल गरजे
बरसात हुयी

हमने देखा
तुमने देखा
सबने देखा

मगर जो दिखना चाहिए 
वही नहीं दिखता !

यार ! 
हमें कहीं, 
वर्षा का जल ही नहीं दिखता !


एक झिंगुर 
अपनी समझदारी दिखाते हुए बोला-

इसमें अचरज की क्या बात है !

कुछ तो 
बरगदी वृक्ष पी गए होंगे

कुछ 
सापों के बिलों में घुस गया होगा

मैंने 
दो पायों को कहते सुना है

सरकारी अनुदान
चकाचक बरसता है 
फटाफट सूख जाता है !

हो न हो
वर्षा का जल भी 
सरकारी अनुदान हो गया होगा..! 
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नोटः यह एक पुरानी कविता है जिसे दो वर्ष पहले पोस्ट किया था। पुनः पोस्ट कर रहा हूँ। उन पाठकों के लिए जो मुझसे इधर जुड़े और जानता हूँ पुरानी पोस्ट कोई खंगाल कर नहीं पढ़ता।

( चित्र गूगल से साभार )

3.7.12

गंगा चित्र-8 (गंगा घाट के खेल)


पिछली पोस्ट में आपने बनारस के घाटों की तश्वीरें देखी और खूब सराहा। इसके लिए धन्यवाद। आज मैं आपको घाटों के कुछ और रंग दिखाना चाहता हूँ। तश्वीरें खूबसूरत नहीं हैं लेकिन इन तश्वीरों के माध्यम से जो कहना चाहता हूँ वह रोचक है। यहाँ तैराकी, नौकायन के अलावा बहुत से खेल भी खेले जाते हैं। जहाँ कहीं घाट पर चौड़े फर्श मिल गये घाट किनारे के युवक उसे खेल का मैदान बनाने में जरा भी देर नहीं करते। मौसम जाड़े का हो या गर्मी का, कोई फर्क नहीं पड़ता। जाड़े में दिनभर तो गर्मी में सुबह-शाम का समय खेलों के लिए सुहाना होता है। देखिये कुछ तश्वीरें....

(1) क्रिकेटः- घाट किनारे स्थान-स्थान पर क्रिकेट जमकर खेली जाती है। एक सर्वमान्य नीयम है। गेंद पानी में गयी तो आऊट। रबड़ की गेंदों से लगने वाले चौके-छक्के देखते ही बनते हैं।  क्रिकेट के अलावा गुल्ली-डंडा भी खूब खेला जाता है।


(2) बैटमिंटनः- यह गर्मी की एक सुबह है। घाट किनारे कितना खूबसूरत बैटमिंटन कोर्ट बनकर तैयार हो गया है!


(3)स्केटिंगः- यह राजेंद्र प्रसाद घाट की वह चिकनी फर्श है जिसमे बड़े-बड़े सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। गंगा महोत्सव के समय यह मंच खूब जगमग रहता है। कोई भी संगीतकार इस मंच पर अपनी प्रस्तुति देकर खुद को धन्य समझता है। पहली अप्रैल के दिन होने वाला प्रसिद्ध महामूर्ख सम्मेलन भी इसी मंच पर होता है। सामने घाट की सीढ़ियों पर बैठकर दर्शक आनंद लेते हैं। इस मंच को कितनी कुशलता से स्केटिंग का मैदान बना दिया गया है ! गर्मी की एक सुबह और स्केटिंग के जूते पहने हॉकी लिये गेंद को साधता एक युवक। तश्वीर भले सुंदर न हो लेकिन फर्श, युवक और सीढ़ियाँ देखकर आप अंदाज लगा सकते हैं कि यह कितना रोचक है।


(4) तास:-  खाली समय में जमाई जाने वाली 'तास' की अड़ी तो है ही।:)


(4) इन खेलों के अलावा गंगा को पवित्र करने के लिए भी कुछ  खेल चलता रहता है। घाट के फर्श का प्रयोग धोबी अपने कपड़े सुखाने के लिए भी जमकर करते हैं। जाड़े के समय खींची गई एक तश्वीरः-


(5) इस खेल को देखकर बताइये..अक्ल बड़ी या भैंस?



मजे की बात यह कि सभी कहते हैं... गंगा मैया की जय ! 


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1.7.12

गंगा चित्र-7


आज रविवार है। गंगा मैया के दर्शन किये बहुत दिन हुए। सोचा आज मार्निंग वॉक छोड़ गंगा वॉक किया जाय। खेल में शतरंज और घुमक्कड़ी में गंगा के घाट, ताजगी के मामले में दोनो का ज़वाब नहीं । जितनी बार भी गंगा जी गया एक नया एहसास, एक नई ताजगी लेकर लौटा हूँ। हर बार नये दृश्य देखने को मिलते हैं। आइये आज की कुछ ताजा तश्वीरें दिखाता हूँ...

(1) सुबह के साढ़े छ बज चुके हैं। सूर्योदय हो चुका है। नावें खुल चुकी हैं। पर्यटक सन राइज का आनंद लेकर  घाट किनारे बने लॉजों में लौटने की तैयारी में हैं। नदी किनारे तैयार हो रही नाव की बेचैनी समझी जा सकती है। कब तैयार हो और गंगा मैया की लहरों में घूमने का मजा मिले। 


(2) मढ़ी के ऊपर बिखरे दाने चुगते परिंदे।


(3) दशाश्वमेध घाट पर उमड़ी भक्तों की भीड़। आज कोई विशेष पर्व नहीं है। यह रोजमर्रा की जिंदगी है।


(4) केदार घाट के सामने दक्षिण भारतीय भक्त और दक्षिण भारतीय पंडा। मिनी भारत की छवि देखनी हो तो गंगा के घाटों का नज़ारा लीजिए। सभी धर्मों, संप्रदायों की मिली जुली संस्कृति का नजारा दिखेगा। शायद ही कोई राज्य हो जिसका प्रतिनिधित्व बनारस के घाट न करते हों।

(5) यह अनूठा दृश्य दिखा। दक्षिण भारतीय महिलाएँ और पुरूष दोनो सर मुढ़वा कर स्नान के बाद तैयार होते हुए।


(6) इन दो विदेशी युवतियों को शांत भाव से गंगा को निहारते देखा।


(7) लौटा तब भी ये लोग यहीं बैठे मिले।


(8) घाट किनारे बसे युवक तो रोज लेते ही हैं तैराकी का मजा।


(9) हरिश्चंद्र घाट के पास यह मुर्गा भी दिखा। मसान भूमि पर  इस मुर्गे के होने का रहस्य तो आलसी ही सही  ढंग से बता सकते हैं। कहीं यह किसी तांत्रिक की साधना का सामान तो नहीं!


स्थान. समय और फोटूग्राफर तो आप जान ही गये। दिनांक भी पोस्ट लिख ही देगा।..नमस्कार।