30.7.11

गिरगिट कहीं की....!

नदी
अब वैसी नहीं रही
जैसी बन गई थी तब
जब आई थी बाढ़

वैसी भी नहीं रही
जैसी हो गई थी तब
जब हुआ था
देश का विभाजन

वैसी भी नहीं
जब पड़ोसी देश से
एक मुठ्ठी भात के लिए
आए थे शरणार्थी

वैसी भी नहीं
जब लगा था आपातकाल
या चला था
ब्लू स्टार ऑपरेशन

और वैसी भी नहीं
जब हुआ था
सन 84 का कत्लेआम
या फिर
अयोध्या में
निर्माण के नाम पर विध्वंस

अब तो
पुल बनकर जमे हैं
नदी के हर घाट पर
इसके ही द्वार बहा कर लाये गये
बरगदी वृक्ष !

जिसके हाथ पैर की उँगलियों में फंसकर
सड़ रहे हैं
न जाने कितने
मासूम

भौंक रहे हैं
पास पड़ोस के कुत्ते
फैली है सड़ांध
रुक सी गई है
नदी की सांस

मगर भाग्यशाली है नदी
आ रहे हैं
आमरण अनशन का संकल्प ले
कुछ गांधीवादी

धीरे-धीरे
काटकर जड़ें
मुक्त कर देंगे नदी को
बह जायेंगे शव
लुप्त हो जायेंगे पापी
वैसे ही
जैसे लुप्त हो गये
गिद्ध

गहरी सांस लेकर
अपनी संपूर्ण निर्मलता लिए
बहने लगेगी नदी

मगर क्या
नहीं बन जायेगी वैसी ही
जैसी बन गई थी तब
जब आई थी बाढ़ ?
..........
गिरगिट कहीं की....!

------------------------

34 comments:

  1. वाह क्या बात है। बहुत खूब।

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  2. बहुत गहन बात ... एक बार तो कचरा बहा कर ले ही जाए नदी ..

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  3. बह चले तो माने . अभी तो बहुते क्षीण आस है .

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  4. Aji jo bach gaye hain --- unko magarmachchh kahin ka kahiye na...

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  5. भाग्यशाली है नदी
    आ रहे हैं
    आमरण अनशन का संकल्प ले
    कुछ गांधीवादी

    धीरे-धीरे
    काटकर जड़ें
    मुक्त कर देंगे नदी को
    बह जायेंगे शव
    लुप्त हो जायेंगे पापी
    वैसे ही
    जैसे लुप्त हो गये
    गिद्ध

    गहरी सांस लेकर
    अपनी संपूर्ण निर्मलता लिए
    बहने लगेगी नदी... kitna kuch samet liya

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  6. बेहद गहन अभिव्यक्ति।

    आपकी रचना आज तेताला पर भी है ज़रा इधर भी नज़र घुमाइये
    http://tetalaa.blogspot.com/

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  7. bahut khub sir ji...
    jai hind jai bharat

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  8. नदी
    अब वैसी नहीं रही
    जैसी बन गई थी तब
    जब आई थी बाढ़

    नदी के लिए गिरगिट की उपमा...बहुत खूब...लाजवाब...

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  9. bahut gahari bat behad saralta se kai hai aapne,bahut badhiya.aapko badhai

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  10. ह्रदय के गहन एवं व्याकुल भावों की मार्मिक व प्रवाहमयी प्रस्तुति .....बिलकुल नदी के प्रवाह जैसी

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  11. इसको क्या कहें नदी की पीड़ा अथवा मानव की लापरवाही ..... बहुत प्रभावी .....

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  12. nadiyan girgit बनी नहीं , बनाई गई हैं ।
    वैसे यह खूबी तो नेताओं में होती है ।

    गहन अभिव्यक्ति ।

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  13. बड़ी गहरी अभिव्यक्ति।

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  14. बेहद भावमयी और खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

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  15. क्या कहने! आस निरास और जीवन का पूरा फलसफा लिए एक अभिव्यक्तिपूर्ण कविता !

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  16. hmm.....बहुत गहन अभिव्यक्ति।

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  17. गहन अभिव्यक्ति.... खूब बिम्ब चुना आपने...

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  18. चकाचक है लेकिन गिरगिट और नदी में यह अंतर है कि गिरगिट अपने आप रंग बदलता है जबकि नदी का रंग लोग बदलते हैं। :)

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  19. आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 01-08-2011 को चर्चामंच http://charchamanch.blogspot.com/ पर सोमवासरीय चर्चा में भी होगी। सूचनार्थ

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  20. उस नदी की कल्पना ही कीजिये बस

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  21. बहुत सुन्दर आशावादी कविता है.यैसा ही हो,सब पापी बह जायें,मगर फिर न जन्में.
    मगर दो बातें मुझे ठीक नहीं लगीं-१)पापीयों की गिद्ध से तुलना,गिद्ध तो बहुत आवश्यक प्राणी हैं पर्यावरण के लिये,वो लुप्त हो गये हैं तो उन्हें बचाना चाहिए.वो वातावरण की सफाई करने का आवश्यक काम करते है.२)नदी को गिरगिट कहना भी कुछ जमा नहीं,इतनी सुन्दर कविता में गिरगिट लिखने की कोई आवश्यकता नहीं लगती.कोई दूसरा शिर्षक सोचना शायद अधिक उपयुक्त हो.

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  22. धीरे-धीरे
    काटकर जड़ें
    मुक्त कर देंगे नदी को
    बह जायेंगे शव
    लुप्त हो जायेंगे पापी
    वैसे ही
    जैसे लुप्त हो गये
    गिद्ध.

    पर्यावरण के प्रदूषण का एक नया मानवीय पहलू प्रस्तुत किया है आपने सुंदर कविता के मध्यम से.

    नदी और गिरगिट की तुलना. नदी का रंग तो दुसरे बदलते हैं जबकि गिरगिट स्वमेव ही.

    बधाई.

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  23. अंतर्मन को उद्देलित करती पंक्तियाँ, बधाई.

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  24. Bahut peeda samaee huee hai ise rachana me aur khatas bhee .Nadee ko girgit kah to diya par isaka jimmedar kaun ?

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  25. गहन अभिव्यक्ति...
    प्रश्नों के घने वन में छोड़ जाती हुई...
    सादर...

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  26. गिरगिटिया नदी ...
    नवीन बिम्ब !

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  27. दिल को छू जाने वाली सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति.
    गहरी सांस लेकर
    अपनी संपूर्ण निर्मलता लिए
    बहने लगेगी नदी

    मगर क्या
    नहीं बन जायेगी वैसी ही
    जैसी बन गई थी तब
    जब आई थी बाढ़ ?
    ..........
    गिरगिट कहीं की....!
    नाज़ुक उलाहनों में रची बसी पोस्ट का शुक्रिया....

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  28. कहाँ से कहाँ तक नदी की आत्मकथा सी बयान कर दी है आपने.......बनारस में इस बार गंगा का उफान बहुत तेज़ था......सामायिक और शानदार पोस्ट|

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  29. बेचारी नदी भी क्या करे, अब वह पहले जैसी नहीं रही... गहन अभिव्यक्ति... सादर

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  30. बहुत सुंदर,आभार.

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  31. अपनी चमड़ी भी देख रही हूँ.कहीं....

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  32. गहन ... और अंत तो दिल में सीधे उतर गया ...

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