5.8.11

सावन में......



मुझे याद है
घनी बरसात में
तुम चाहती थी
भींगना
और मैं
भींड़ की दुहाई दे
कोने में अड़ा था।

मुझे याद है
रिमझिम फुहार में
जिस पल
वृक्ष की सबसे ऊँची फुनगी पर बैठी चिड़िया
सुखा रही थी पंख
सज रहे थे
तुम्हारी बंद पलकों में
इंद्रधनुष
जग रही थी
उड़ने की चाह
और मैं
उड़न खटोले की जगह
छाता लिये
खड़ा था !

तपती धूप में
चलते-चलते
भूल जाता हूँ
सब कुछ
याद रहती है
मंजिल की दूरी
या जिस्म की थकान
मगर सावन में
याद आता है
बहुत कुछ
जैसे कि याद है
चोरी छुपे ही सही
जिंदगी के कुछ पल
जी लिया करता था
इतनी बुरी भी नहीं कटी
अपनी जिंदगी।
.............................................

32 comments:

  1. मुझे याद है
    रिमझिम फुहार में
    जिस पल
    वृक्ष की सबसे ऊँची फुनगी पर बैठी चिड़िया
    सुखा रही थी पंख
    सज रहे थे
    तुम्हारी बंद पलकों में
    इंद्रधनुष
    जग रही थी
    उड़ने की चाह
    और मैं
    उड़न खटोले की जगह
    छाता लिये
    खड़ा था !
    .... waah

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  2. बहुत सुंदर ...स्वप्न और यथार्थ का बंधन ...!!
    सुंदर रचना ..badhai.

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  3. पांडे जी
    ......चोरी छुपे ही सही
    जिंदगी के कुछ पल
    जी लिया करता था
    इतनी बुरी भी नहीं कटी
    अपनी जिंदगी।

    अति सुन्दर रचना....
    अद्भुत पोस्ट!!

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  4. bahut sunder abhivykti........
    dono hee sapne dekhne wale ho jae to poora koun karega sapne........ha na......aapkee rachanae yatharth kee dhara par upajtee hai roots se judee hai...

    Aabhar.

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  5. आपकी किसी पोस्ट की चर्चा नयी-पुराणी हलचल पर होगी.शनिवार (६-८-११)को.कृपया अवश्य पधारें...!!

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  6. सचमुच, सावन उतर आया है इस कविता में

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  7. निहायत ही खूबसूरत रचना.

    रामराम.

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  8. अद्भुत रचना.........

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  9. ज़िन्दगी सावन में बरसती है, झरती है, टपकटी है, जबकि बाक़ी के साल भर कटती है।

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  10. चोरी छुपे ही सही
    जिंदगी के कुछ पल
    जी लिया करता था
    इतनी बुरी भी नहीं कटी
    अपनी जिंदगी।

    क्या बात है
    संतोष सबसे बड़ी बात है...

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  11. बस यही बात तो है देव बाबू........ज़िन्दगी को काटना नहीं है......जीना है.....जिंदगी न मिलेगी दुबारा |

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  12. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति , बधाई

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  13. यथार्थ-परक सुन्दर अभिब्यक्ति,मगर सिर्फ सावन में ही ?

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  14. हमने भी मर्यादा के छाते में जिन्दगी निकाल दी।

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  15. इस बेकसिये हिज्र में मजबूरिये इश्क
    हम उन्हे पुकारें तो पुकारे न बने .....
    वाह ..एक मनःस्थति की कविता !

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  16. मुझे याद है
    रिमझिम फुहार में
    जिस पल
    वृक्ष की सबसे ऊँची फुनगी पर बैठी चिड़िया
    सुखा रही थी पंख
    सज रहे थे
    तुम्हारी बंद पलकों में.

    गज़ब का अहसास. यही है जिंदगी.

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  17. आहा ! कहाँ गए वो सावन के jhoole ? अब तो बस यादें ही रह गई हैं ।

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  18. बढ़िया कल्पना और बेहतरीन शब्द चित्र उकेरते हैं आप ! हार्दिक शुभकामनायें !

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  19. @इतनी बुरी भी नहीं कटी
    अपनी जिंदगी।
    ..........................
    बेहतरीन भाव,आभार.

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  20. वाह, काफी रोमांटिक कविता है...

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  21. अच्छी कविता... सावन तो है ही ऐसा महीना..

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  22. बहुत ही खूबसूरत कविता।

    सादर

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  23. मुझे याद है
    रिमझिम फुहार में
    जिस पल
    वृक्ष की सबसे ऊँची फुनगी पर बैठी चिड़िया
    सुखा रही थी पंख
    सज रहे थे
    तुम्हारी बंद पलकों में
    इंद्रधनुष

    वाह ..बहुत खूब कहा है आपने ।

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  24. खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

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  25. बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति

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  26. बहुत खूब कहा है आपने
    चोरी छुपे ही सही
    जिंदगी के कुछ पल
    जी लिया करता था
    इतनी बुरी भी नहीं कटी
    अपनी जिंदगी।
    ..........

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  27. वाह ! जी,
    इस कविता का तो जवाब नहीं !

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  28. वाह! यहाँ तो सावन झूम के बरस रहा है.

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  29. गज़ब देवेन्द्र जी ... इतनी बुरी भी नहीं कटी जिन्दगी ... फिर उनके भीने की इचा की यादें भी तो हैं पास में ... रूहानी समा बाँध दिया इस रचना ने ...

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