8.1.13

सामंतवादी!


एक हाथी
देश में
शान से घूमता है!

ठहरता है जिस शहर
चिंघाड़ता है..
"मेरे विरोधी कुत्ते हैं
मुझ पर अनायास भौंकते हैं
मैं उनकी परवाह नहीं करता!"

विरोधी बौखलाते हैं
भक्त
मुस्कुराते हैं।

हाथी
भारत या इंडिया में
अपने से नहीं चलता
उसे कोई महावत चलाता है
महावत और कोई नहीं
हमारी सामंतवादी सोच है

जिसे हमने
सदियों से
हाथी की पीठ पर बिठा रखा है!

यह वही सोच है
जो महिलाओं को
कभी घर से बाहर निकलते
काम करते
अपने पैरों पर खड़े होकर
मन मर्जी से जीवन जीते
नहीं देखना चाहती।

यह सोच
कभी हाथी पर
कभी पोथी पर
कभी नोटों की बड़ी गठरी पर सवार हो
सीने पर मूंग दलने
चली आती है।
....................


27 comments:

  1. क्या कहें -वक्त बदले न बदले ,सोच बदलनी चाहिए..........

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  2. ये सामंतवादी सोच स्त्री को सदा पुरुष के सामने रोते गिडगिडाते ही देखना चाहता है , स्त्री का प्रतिकार विरोध उसे किसी भी हालात में बर्दास्त नहीं है , चाहे संत हो या अपराधी ।

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  3. इस सोच को चाहिए दोनों हाथों में लड्डू, एक प्रगतिशील देश भी और एक गुलाम औरत भी.

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  4. साहब, बीवी और गुलाम की छोटी बहु आज भी सिसकती है उन खंडहरों में..
    ज़माना ब्लैक एंड व्हाईट से रंगीन हो गया, लेकिन हमारी प्रवृत्तियां आज भी
    ब्लैक की ब्लैक हैं..
    अखबार में रोज पढता हूँ कि इतनी सारी कंपनियों की सी ई ओ औरतें हैं, लेकिन
    फिर भी लगता है कि यह सब बस उँगलियों पर गिन लेने जैसा है.. उसी अखबार
    पर लुटाती आबरू, खाप की बलि चढती औरत की दास्तान भी रहती है..
    क्या कहें, कैसे कहें और क्या उम्मीद करें!!
    अंधी गली है!!

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    1. जनिसे आस
      वे ही कर रहे हैं
      अब निराश।

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  5. जंग किसी इंसान के खिआफ़ नहीं है , जंग इसी सोच के खिलाफ है |

    सादर

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  6. हाथी के बहुत सारे भक्त हैं इसीलिये मस्त घूमता रहता है।

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  7. अभी तक मानसिक विकास नहीं हो पाया है .... दिखाने के लिए प्रगतिशील हैं । बहुत सार्थक रचना

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  8. शुभकामनायें |
    बढ़िया प्रस्तुति ||

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  9. इस सोच का बदलाव अपने अंदर से हो आना होगा ...
    आसा राम जी को सुनने अधिकतर महिलायें ही होती हैं ...

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  10. शुरुआत हमे और आप को करनी है ........सोच बदलने से ही सब बदलेगा ।

    वक़्त मिले तो जज़्बात पर भी आयें ।

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  11. बेहद सटीक प्रस्‍तुति...
    आभार

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  12. इन्हीं लोगों ने सारे कुंओं में भांग घोल रखी है, पहले उसे साफ़ करना होगा, उसके बाद हाथी की मस्ती कम हो सकती है. बहुत सशक्त रचना.

    रामराम.

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  13. यहाँ भक्तों की भी तो कमी नहीं।
    एक ढूंढो , हजारों मिलते हैं।

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  14. AAP KI IS RACHANA KA SWAGAT DUSHYANT KI IS PANKTI SE KARTI HU " HO GYEE HAI PIR PARVT SI PIGHALNI CHAHIYE,AB KOYEE GANGA HIMALAY SE NIKALNI CHAHIYE....

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  15. यही सोच तो बदलनी चाहिए अब...
    सार्थक रचना!
    ~सादर!!!

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  16. बहुत सही लिखे हैं सर!


    सादर

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  17. खूब सूरत तंज व्यवस्था पर .

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  18. यैसे सामंतियों को भी मिलता कुछ नहीं,बस वो महिला को गुलाम बनाने के प्रयाश में उन्ही के आगे-पीछे चक्कर लगाते रहते हैं,और अंततोगत्वा वो भी उन्ही के गुलाम बने रहते हैं.किसी महिला पर शाशन करके वो भी कौन सा तीर मार लेते हैं ! आशाराम जैसे लोग मुर्खों की जमात में पड़े रहेंगे और कोई भी बुद्धिमान आदमी उनको माननेवाला नहीं रहेगा.

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  19. सहज समाजचर्या को सब अपने अनुकूल बनाने के प्रयास में अहित ही कर बैठते हैं।

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  20. इक लाख पूत सवा लाख नाती
    ता रावण घर दिया न बाती (अपने कबीर बाबा)

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