16.8.13

चलो यार आँखें लड़ाते रहें।


चलो रात भर गुनगुनाते रहें

सुनें कुछ कभी कुछ सुनाते रहें।


कहीं ज़ख्म होने लगें जो हरे

वहीं मीत मरहम लगाते रहें।


नहीं सीप बनकर जुड़ीं उँगलियाँ

न पलकों से मोती गिराते रहें।


बहुत दर्द सहते रहे, थे जुदा

चलो प्रेम दीपक जलाते रहें।


अमावस कभी तो कभी पूर्णिमा

सितारे सदा मुस्कुराते रहें।


जले लाख दुनियाँ, कुढ़े प्यार से

जमाने को ठेंगा दिखाते रहें।


हमारी यही चाँदनी रात है

अमावस भले वे बताते रहें।


नहीं हम अकेले ही 'बेचैन' हैं

चलो यार आँखें लड़ाते रहें।

...............................

23 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी का लिंक कल शनिवार (17-08-2013) को "राम राज्य स्थापित हो पाएगा" (शनिवारीय चर्चा मंच-अंकः1339) पर भी होगा!
    स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बहुत ही सुंदर गजल ,,,

    स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाए,,,

    RECENT POST: आज़ादी की वर्षगांठ.

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  3. बढियां भाव उकेरे हैं !

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  4. ठंड है,
    रजाई खोल जड़ाते रहें।

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  5. कल 18/08/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

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  6. waah...bahut khoob, bahut sundar

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  7. बहुत सुंदर ..चलो यूँ ही ..मन को बहलाते रहें,बेचैन दिल को चैन दिलाते रहें :-)
    शुभकामनायें !

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  8. बहुत खुब…… पहला और आखिरी वाला सबसे बढ़िया

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  9. आपकी यह पोस्ट आज के (१७अगस्त, २०१३) ब्लॉग बुलेटिन - शनिवार बड़ा मज़ेदार पर प्रस्तुत की जा रही है | बधाई

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  10. बहुत लाजवाब और सुंदर गजल.

    रामराम.

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  11. बहुत सुन्दर रचना

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  12. वाह वाह बहुत सुंदर ।

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  13. ब्लॉग बुलेटिन की ६०० वीं बुलेटिन कभी खुशी - कभी ग़म: 600 वीं ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  14. गजल येक अछ्छा है बन गया,आओ हम इसे गुनगुनाते रहें.

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