24.4.19

लोहे का घर-51


लोहे के घर की खिड़की से बाहर झाँक रहे हैं एक वृद्ध। सामने की खिड़की पर उनकी श्रीमती जी बैठी हैं। वे भी देख रही हैं तेजी से पीछे छूटते खेत, घर, मकान, वृक्ष....। ढल रहे हैं सुरुज नारायण। तिरछी होकर सीधे खिड़की से घर में घुस रही हैं सूरज की किरणें। जल्दी-जल्दी, बाय-बाय, हाय-हैलो कर लेना चाहती है वैशाख की धूप। वृद्ध को इस ढलती उमर में भी खिड़की से बाहर झाँकते देख कर खुशी होती है। इनकी मुख-मुद्रा, धीर-गम्भीर है लेकिन खुशी की बात यह कि अभी इनके भीतर का बच्चा सही सलामत है। जब तक व्यक्ति के हृदय में बच्चा है, संगीत है, समझो वह जिंदा है। 

बगल के साइड लोअर बर्थ में चार वृद्ध महिलाएं प्रेम से बैठी, सुरीले स्वर में, कन्नड़ भाषा में भजन गा रही हैं। एक टेक उठाती हैं, शेष औरतें स्वर में स्वर मिलाती हैं। सहयात्री से पूछने पर ज्ञान हुआ कि वृद्ध और महिलाएं कर्नाटक के लिंगायत समुदाय के हैं। कन्नड़ भाषा में शिव भजन गा रही हैं। हर औरत के गले में लॉकेट की तरह एक शिव लिंग लटक रहा है। इसे लिंगवत कहते हैं। देहरादून घूमने गए थे, अब काशी जा रहे हैं। ये महाराष्ट्र और कर्नाटक के बॉर्डर क्षेत्र के होंगे तभी मराठी भी जानते हैं। मराठी में बात किया तो इतनी जानकारी हाथ लगी। इनकी वीडियो बनाने या तस्वीरें खींचने का मन हो रहा है लेकिन बुरा न मान जांय इसलिए छोड़े दे रहा हूँ। केवल आनन्द ले रहा हूँ।

लोहे का घर भारत दर्शन कराता है। बनारस जौनपुर के छोटे से रास्ते में, रोज चलते हुए, देश विदेश के न जाने कितने यात्रियों से सामना हुआ और न जाने कितनी सभ्यताओं से रूबरू होने का अवसर मिला कह नहीं सकता। कुछ स्मृति पटल पर शेष हैं, कुछ लिपिबद्ध कर सका और कई तो हवा के झोंकों की तरह स्पर्श कर, चले गए! 

सूर्यास्त हो चुका है। गोधुलि बेला में भी वृद्ध जोड़ा वैसे ही खिड़की से बाहर झाँक रहा है। वृद्ध महिलाएँ भजन गाना छोड़ अब आपस मे खूब बतिया रही हैं। कन्नड़ समझ मे आती तो इनके यात्रा के अनुभव भी समझ पाता। एक वृद्ध महिला, जिनके सभी दांत झर चुके हैं, पोपली जुबान में हाथ हिला-हिला कर साथी महिलाओं को कुछ अनुभव सुना रही हैं। बाकी महिलाएं आँखें फाड़े सुन रही हैं। बीच-बीच में उनके हृदय से उठ कर सिसकारी जैसे स्वर प्रस्फुटित हो रहे हैं। जिसे देख लगता है वृद्ध महिला कुछ अत्यंत रोचक वाकया सुना रही हैं। 

अपर बर्थ में एक युवा जोड़ा लेटा अपने कारगुजारी में व्यस्त है। दोनो के हाथों में मोबाइल है और दोनो अपनी रुचि के अनुसार उसमे व्यस्त हैं। साइड अपर बर्थ में दो युवतियाँ हैं। एक की गोदी में उसका भविष्य (नन्हा बच्चा) है और दूसरी, मोबाइल में भविष्य ढूँढ रही है। 

ट्रेन अब बाबतपुर से आगे बढ़ रही है। कर्नाटक के यात्रियों को अंदाजा हो चुका है कि अब काशी पहुँचने ही वाले हैं। ये सभी सजग होकर बर्थ के नीचे से अपने झोले, बैग, पोटली, चप्पल ढूँढ-ढूँढ कर निकाल रहे हैं। धीरे-धीरे ये सभी सामान दरवाजे तक पहुँचा कर खड़े हो जाएंगे। इन्हें क्या पता कि ट्रेन आउटर पर बहुत देर तक रुकती है! 
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2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल गुरुवार (25-04-2019) को "एक दिमाग करोड़ों लगाम" (चर्चा अंक-3316) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
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    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन 90वां जन्म दिवस - 'शम्मी आंटी' जी और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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