4.10.11

अरे...! यह तो मुझसे भी बेचैन है...!!



कल मनोज जैसवाल जी के ब्लॉग के माध्यम से एक विजेट लिया। यही जो दिख रहा है....दौड़ता हुआ आदमी। इसके बाद जब भी ब्लॉग खोलता, इसी दौड़ते हुए आदमी पर नज़र ठहर जाती। मुझे लगा यह तो मुझसे भी बेचैन है..! आज सुबह इसी पर एक कविता लिख दिया। सुबह जल्दी में पोस्ट नहीं कर पाया तो अभी कर रहा हूँ। कविता का शीर्षक है....दौड़। बताइये न कैसी है..?

दौड़

दौड़ नशे में दौड़
और छलक के दौड़।

जब तक तन में साँस है
जब तक मन में फाँस है
जब तक चौचक भूख है
जब तक गहरी प्यास है

आँख मूंद के दौड़
और हचक के दौड़।

नहीं कभी थकने वाला
नहीं कभी रूकने वाला
और और ही कहता है
और नहीं सुनने वाला

छोटी धरती छोड़
कम्प्यूटर में दौड़।

जिस दिन तू थक जायेगा
जिस दिन तू रूक जायेगा
सभी हंसेंगे तुझ पर, तू
ठगा खड़ा रह जायेगा

राम नाम सत्य है
झूठ मूठ की दौड़।
.....................

37 comments:

  1. यह दौड़ता हुआ आदमी वास्तव में कहीं नहीं पहुँच रहा... एक ही जगह ठहरा हुआ है!! आज की दौड़ती दुनिया भी इसी आदमी की तरह है!

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  2. गूढ़ प्रतीक ..लाल बुझ्झकर बुझे तो.

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  3. शानदार प्रस्तुति

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  4. यह पैसे की है दौड़
    या सबसे आगे की होड़

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  5. दौड़ दौड़ तू दौड़ -न थकना कभी न रुकना कभी ......
    कविता ने तो बिलकुल माहौल को संगीन बना दिया नहीं तो इस जोकर को देख पहले तो हंसी आयी थी :)

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  6. आजकल ऐसी बेचैन आत्माएं बहुत दिखती हैं ।
    इस अंधाधुंध दौड़ को रोको भाई ।

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  7. ये कैसी बेचैन आत्मा है कि पढने ही नही देता? मेहरवानी इसकी कि टिप्पणी बक्से पर नही कूद रहा है.:)

    बहुत सटीक रचना.

    रामराम.

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  8. बढ़िया प्रस्तुति ||

    आपको --
    हमारी बहुत बहुत बधाई ||

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  9. जीवन का दूसरा नाम ही दौड़ है जिसमें हर कोई बस्स दौड़े जा रहा है न मंज़िल का पता है न ज़िंदगी में कोई मक़ाम पाने की इच्छा में किसी तरह की कोई संतुष्टि उदेश्य है केवल अंधी दौड़ में भेद चाल की भांति केवल दौड़ .... बढ़िया प्रस्तुति
    समय मिले तो कभी आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है
    http://mhare-anubhav.blogspot.com/

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  10. दौड़ मची है, होड़ मची है,
    बमचक चारों ओर मची है।

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  11. रामनाम ही सत्य है,
    झूठ-मूठ की दौड़ है।
    सत्य कहा आपने।

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  12. बढिया।
    कोई दौडता है सडकों पर, पेट भरने के लिए और कोई दौडता है ट्रेडमिल पर, पेट कम करने के लिए....
    पर दौड हर कोई रहा है इस दुनिया में.....

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  13. सच में आज ऐसे ही बेचैन हैं हम ...और जुटे हैं ऐसी ही दौड़ में.....कहीं न पहुँचाने वाली दौड़ में

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  14. दौड़ रहे हैं सब अंधी दौड़ में , जाना कहाँ है यही पता नहीं !

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  15. @ दौड़ ,
    अकारथ ना हो /अयाचित ना हो /आंख मूंद कर ना हो , तो चलेगी !

    @ बेचैन ,
    पंडित जी इतना बेचैन होना एक खतरनाक स्थिति है :)

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  16. बहुत जुलुम वाला काम कर रहे हैं इस इन्सान के साथ आप! बेचारा दौड़े चला जा रहा है बिना किसी प्रतिवाद के। आप तो इत्ते जालिम न थे जी। :)

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  17. शानदार कविता आपका आभार

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  18. अनूप शुक्ल...

    एक अकेले यही थोड़ी न दौड़ रहा है।
    यह तो उस आईने में अपना ही अक्स है!

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  19. जानते अहिं पर सोचना नहीं चाहता कोई ... वैसे इस अंतिम दौड़ की प्रतीक्षा तो सभी को है ...

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  20. वाह देव बाबू.....इस दौड़ में बहुत कुछ कह गए आप........शानदार |

    मेरे ब्लॉग की नयी पोस्ट आपके ज़िक्र से रोशन है......जब भी फुर्सत मिले ज़रूर देखें|

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  21. बहुत खूब..हमेशा की तरह.....शानदार.

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  22. अंतिम सत्य वही है जो अंतिम पंक्तियों में आपने लिखा है। इस बेचैनी सो तो भला है कि राम नाम की दौड़ में शामिल हो जाएं!

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  23. NICE.
    --
    Happy Dushara.
    VIJAYA-DASHMI KEE SHUBHKAMNAYEN.
    --
    MOBILE SE TIPPANI DE RAHA HU.
    ISLIYE ROMAN ME COMMENT DE RAHA HU.
    Net nahi chal raha hai.

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  24. आपाधापी की दौड़ कायम है

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  25. ye jindgi ek dod hi hai...shandaar..
    jai hind jai bharat

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  26. कल सोचा था कि यह दौडता हुआ आदमी शायद मेरे लैपटॉप से बाहर निकल जाएगा तो मैं कमेन्ट कर लूंगा.. आज भी देखा तो यह दौड ही रहा था..
    एक अमूल्य सीख इस दौड़ते मानव के माध्यम से! पांडे जी आपकी बातें अनोखी होती हैं!!

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  27. बहुत ख़ूब देवेन्द्र जी !

    यह दौड़ ग़ज़ब की है :)


    अच्छी रचना के लिए बधाई !

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  28. dauda dauda bhaga bhaga sa... waqt yeh sakht hai thoda thoda...

    Gud-one

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  29. हचक के दौड़ . विजय पर्व की शुभकामनाये

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  30. बहुत बढ़िया लिखा है आपने! लाजवाब प्रस्तुती!
    आपको एवं आपके परिवार को दशहरे की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें !

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  31. वाह ...बहुत ही बढि़या ।

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  32. देवेन्द्र जी, रचना बहुत अच्छी है...बधाई
    वैसे ये दौड़ता हुआ आदमी कुछ ऐसा संदेश देता प्रतीत हो रहा है-
    रुक जाना नहीं तू कहीं हारके
    कांटों पे चलके मिलेंगे साए बहार के

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  33. सभी दौड रहे है,और सभी क्यु मे है जो अपनी चिता पे जाकर खतम होगी.

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  34. yah kaisi daud hai ki bina gantavya ko pahchane ham daudate ja rahe hain

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  35. raam naam satya hai jhoonth moot ki daur.............haahahah

    saarthak bhi aur manoranjak bhi.....

    badhaai............

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