1.10.11

क्या बतलाएँ बापू तुमको दाने कहाँ गये...!


उड़ गए पंछी, सो गए हम 
हमको है लुटने का गम

क्या बतलाएँ बापू तुमको दाने कहाँ गये !

जब उजले पंछी आए थे
हम उनसे टकराए थे
थे ताकतवर, नरभक्षी थे
पर हमने दूर भगाए थे

जान लड़ाने वाले वे दिवाने कहाँ गये !
क्या बतलाएँ बापू तुमको दाने कहाँ गये !

गैरों से तो जीते हम
अपनो से ही हारे हम
कैसे-कैसे सपने देखे
नींद खुली आँखें थीं नम

बजुके पूछ रहे खेतों के दाने कहाँ गये !
क्या बतलाएँ बापू तुमको दाने कहाँ गये !

भुना रहे हैं एक रूपैय्या 
जाने कैसे तीन अठन्नी
पैर पकड़ कर हाथ मांगते
अब भी अपनी एक चवन्नी

मुठ्ठी वाले हाथ सभी ना जाने कहाँ गये !
क्या बतलाएँ बापू तुमको दाने कहाँ गये !

तुलसी के पौधे बोए थे
दोहे कबीर के गाए थे
सत्य अहिंसा के परचम
जग में हमने फहराये थे

नैतिकता के वे ऊँचे पैमाने कहाँ गये !
क्या बतलाएँ बापू तुमको दाने कहाँ गये !

..................................................................

35 comments:

  1. bhtrin rchnaa ker liyen badhaai .akhtar khan akela kota rajsthan

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  2. सुन्दर प्रस्तुति ||
    आभार महोदय ||

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  3. दाने अगर खेत में जाते तो और दाने पैदा होते, दाने अगर देश में ही रहते तो देश की उन्नति में काम आते पर दाने तो स्विस बैंकों मे चले गये अब बताईये क्या किया जाये?

    रामराम.

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  4. वाह..........सुभानाल्लाह........एक और बेहतरीन पोस्ट के लिए बधाई आपको..........हैट्स ऑफ

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  5. बापू को बतला दो
    सड़ गए सारे दाने,
    जलते हुए दियों को
    बुझा गए परवाने !

    बापू को क्यों रुला रहे हो भाई ?

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  6. तुलसी के पौधे बोए थे
    दोहे कबीर के गाए थे
    सत्य अहिंसा के परचम
    जग में हमने फहराये थे

    नैतिकता के वे ऊँचे पैमाने कहाँ गये !
    क्या बतलाएँ बापू तुमको दाने कहाँ गये !
    Bahut,bahut sashakt rachana!

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  7. बेहतरीन।
    भावभरी और सशक्‍त रचना।

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  8. जाल बिछाने वाले दाने,
    नहीं पता, हैं किसको खाने।

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  9. आज बापू होते तो वो भी कुछ नहीं कर पाते ... सार्थक चिंतन ...

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  10. गैरों से तो जीते हम
    अपनो से ही हारे हम
    कैसे-कैसे सपने देखे
    नींद खुली आँखें थीं नम

    सत्य कथन ।
    सुन्दर भावपूर्ण रचना ।

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  11. गैरों से तो जीते हम
    अपनो से ही हारे हम
    कैसे-कैसे सपने देखे
    नींद खुली आँखें थीं नम

    बजुके पूछ रहे खेतों के दाने कहाँ गये !
    क्या बतलाएँ बापू तुमको दाने कहाँ गये !

    सच कहा आपने गांधी जयंती के उपलक्ष पर सटीक एवं सुंदर अभिवक्ती
    समय मिले तो कभी आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है
    http://mhare-anubhav.blogspot.com/

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  12. बहुत ही सुन्दर

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  13. किसके दाने, किसे थे खाने
    कौन ले गया उन्हें भुनाने ?

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  14. सच !तभी तो कोई एक अकेला शहर में कोई आबो दाना ढूंढता है और अब मिलता नहीं !

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  15. बहुत ही उम्दा,आभार.

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  16. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी की गई है! आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो
    चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  17. बेहतरीन प्रस्‍तुति....

    मौजूदा दौर की कुव्‍यवस्‍था का चित्रण।
    आज गांधी जी होते तो शायद वो भी रो देते....

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  18. बाज़ारवाद और वैश्वीकरण ने लील लिया है।

    कविता के बिम्ब और प्रतीकों के प्रयोग ने कविता में एक नई चेतना प्रस्तुत की है। आभार इस उत्कृष्ट प्रवृष्टि के लिए।

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  19. गैरों से तो जीते हम
    अपनो से ही हारे हम
    कैसे-कैसे सपने देखे
    नींद खुली आँखें थीं नम
    hbut acha.

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  20. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति| धन्यवाद|

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  21. बाऊ जी,
    सार्थक चिंतन है.
    बापू के सिद्धांतों को नमन.
    आशीष
    --
    लाईफ़?!?

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  22. वाह...बहुत बेहतरीन....

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  23. क्या बात है ,, ढूंढ़ना तो होगा ही....... शुक्रिया जी

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  24. आपकी उत्कृष्ट रचना के साथ प्रस्तुत है आज कीनई पुरानी हलचल

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  25. नैतिकता के वे ऊँचे पैमाने कहाँ गये !
    क्या बतलाएँ बापू तुमको दाने कहाँ गये !

    सशक्त रचना ...

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  26. तुलसी के पौधे बोए थे
    दोहे कबीर के गाए थे
    सत्य अहिंसा के परचम
    जग में हमने फहराये थे

    नैतिकता के वे ऊँचे पैमाने कहाँ गये !
    क्या बतलाएँ बापू तुमको दाने कहाँ गये !

    बहुत खूबसूरत प्रस्तुति. आभार.

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  27. दाने या खजाने मालिक के सोने पर लुट ही जाते है.

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  28. तुलसी के पौधे बोए थे
    दोहे कबीर के गाए थे
    सत्य अहिंसा के परचम
    जग में हमने फहराये थे

    नैतिकता के वे ऊँचे पैमाने कहाँ गये !
    क्या बतलाएँ बापू तुमको दाने कहाँ गये !

    बहुत सशक्त प्रस्तुति।
    लाजवाब....आपकी लेखनी को नमन...

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  29. बापू को शत शत नमन...आपकी कविता को भी सलाम

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  30. कितनी सुन्दर कविता.... वाह...

    बापू और शास्त्री जी को सादर नमन...

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  31. सशक्‍त और बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति| धन्यवाद|....बापू और शास्त्री जी को सादर नमन...

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  32. 'मुट्ठी वाले हाथ सभी न जाने कहाँ गए '

    बहुत ही प्रासंगिक, मार्मिक एवं भावपूर्ण गीत ....पाण्डेय जी !

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  33. बहुत सुन्दर रचना लिखा है आपने! बापू जी को मेरा शत शत नमन! बेहतरीन प्रस्तुती!
    आपको दुर्गा पूजा की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें!
    मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://seawave-babli.blogspot.com/
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

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