14.9.12

हे असीम ! सीमा में रहो न।


घोटाले की खबर पढ़कर लोग तिलमिलाते हैं। चीखते हैं, इतना बड़ा घोटाला ! यह तो बहुत ज्यादा है।

आतंकवादी को फाँसी न मिलने पर लोग तिलमिलाते हैं, देश के दुश्मन को भी फाँसी पर नहीं चढ़ा सकते! यह तो हद है।  

महंगाई बढ़ने पर लोग तिलमिलाते हैं, इस सरकार ने तो मार ही डाला। इतनी महंगाई ! अब तो जीना दूभर है।

मजे की बात यह कि कार्टून देखकर भी लोग तिलमिलाते हैं ! अभिव्यक्ति की सीमा तय करते हैं। आरोप लगाते हैं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का बेजा इस्तेमाल! यह तो देश के साथ गद्दारी है !“

मेरी समझ में यह नहीं आता कि जब एक सीमा तक सब कुछ बर्दाश्त कर सकती है भारत की सहिष्णु जनता तो सरकार, विपक्ष और कार्टूनिस्ट सभी अपनी-अपनी सीमा में क्यों नहीं रहते !

न तुम देश भक्षक न हम देशद्रोही। तुम्हारी भी जय-जय, हमारी भी जय-जय। J
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30 comments:

  1. हिन्दीदिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!
    आपका इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (15-09-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  2. अगर सभी को अपनी सीमाओं का ज्ञान होता तो फिर बात ही क्या थी फिर कोई भक्षक नहीं होता यहाँ सबके सब रक्षक ही होते... :-)

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  3. सीमायें औरों के सम्मान को भी सम्मान दें।

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  4. काश महंगाई और भ्रष्टाचार की भी सीमा तय हो जाती या फिर हम इनसे भी कह सकते सीमा में रहो ना ...

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    1. जी, शीर्षक 'असीम' इसी व्यापक अर्थ को कहने का प्रयास है।..आभार।

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  5. वो किस्सा याद आ गया देवेन्द्र भाई, जब एक औरत को लोग कुलटा और पापी कहकर पत्थर मार रहे थे और हज़रत ईसा उधर से गुज़रे... पत्थर मारने वालों से बोले कि पहला पत्थर वो मारे जिसने कभी कोई पाप नहीं किया हो.
    और लोगों ने ज़ोर-जोर से पत्थर मारना शुरू कर दिया, यह साबित करने के लिए कि उन्होंने ने तो कोई पाप किया ही नहीं किया कभी!!!

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  6. सीमा में ही तो नहीं है कुछ ....

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  7. न तुम देश भक्षक न हम देश द्रोही ,तुम्हारी भी जै जै ,हमारी भी जै जै

    करो आरती सोनिया जी की, जै जै ,

    ये राहुल की जै जै, विजय दिग की जै जै ,

    करो सब की जै जै ,करो सब की जै जै .

    ये बोला मौन सिंह ,करो आज जै जै .

    पांडे जी बहुत खूब लाये हैं व्यंजना ,सुकून देते चित्र के साथ .

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  8. कोई सीमा नहीं है अब किसी के लिए ..महंगाई की भी नही !

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    1. वो असीम है तो उसका मतलब ये कि उसे सीमा पसंद नहीं फिर आप अपनी मर्जी उस पर कैसे थोप सकते हैं देवेन्द्र जी :)

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  9. मगन मना मानव मुआ, याद्दाश्त कमजोर |
    लप्पड़ थप्पड़ छड़ी छड, चाबुक रहा खखोर |
    चाबुक रहा खखोर, बड़ी यह चमड़ी मोटी |
    न कसाब न गुरू, घुटाला हाला घोटी |
    लेकिन दर्पण अगर, दिखा दो इसको कोई |
    भौंक भौंक मर जाय, लाश पर लज्जा रोई ||

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  10. उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

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  11. जो असीमित उड़ान भर रहे हैं वो दूसरों को सीमा में रहने की कमान दे रहे हैं...!

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    1. जो कभी लाया करते थे मांग कर
      आज वे दूसरों को सामान दे रहे हैं :)

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  12. अगर खुद सम्मान चाहते हो तो दूसरों को भी देना सीखें जब खुद में कमी है तो दूसरो में भी कमी ही दिखाई देगी बहुत अच्छा लिखा आपने

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  13. शिश्रक पढकर लगा था की कुछ असीम से ही कहा जा रहा है,मगर ये तो नेताओं से कहा गया है.जिनमें नैतिकता नाम की कोई चीज ही नहीं,वो अनैतिकता की सीमा में कैसे रहें ?

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  14. सीमा ही तो नहीं रही अब ... बेलगाम हैं सब .. पर फिर भी जिसकी लाठी उसी की भैंस है ...

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  15. जाहि बिधि राखे राम, ताहि बिधि रहिये।

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  16. सही चिपका दी देव बाबू.....सीमा कौन तय करेगा....सबको जय जय चाहिए :-))

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  17. सत्य कथन..... अपनी अपनी सीमा सभी को निधारित करनी होगी.

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  18. सही कहा ! मगर अगर इतनी जो समझ होती तो फिर बात ही क्या थी !

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  19. ACT OF LIMITATION HAS BEEN COLLAPSED .....NO LIMITS FOR REPAIRING....
    .

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  20. अंधेर नगरी चौपट राजा... :)

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