9.9.12

सूर्यास्त के बाद

  आज की शाम 
उमस भरी शाम
सूर्य 
अस्त होने की तैयारी में
बादलों का कोई नामो निशान नहीं
शांत था तालाब का पानी
ठहरी-ठहरी पत्तियाँ
 दमसाधे कर रही थीं
सूर्य के डूब जाने की 
प्रतीक्षा


 देखते ही देखते
डूब गया सूरज
उड़ चले
बगुले


पंछी तलाशने लगे
अपने-अपने 
घोंसले


मगर यह क्या!
अचानक से आने लगी
उत्तर दिशा से
काले बादलों की सेना


देखते ही देखते
छा गये 
काले बादल
लहलहाने लगे
धान के खेत


पूरब से पश्चिम तक
उमड़-घुमड़
छा गये
काले बादल 


होने लगा
घनघोर अंधेरा 


मैने कहा 
भागोssss
........................

54 comments:

  1. भीगल ना न ? बड़ा कस के बुन्निया आइल हौवे.

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    1. बड़ा कस के बुनियाँ आईल हो... भीग गइली चउचक।

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  2. कविता का उठान बहुत अच्छा है मगर कैमरा शब्द के प्रयोग ने इसे हल्का कर दिया । हो सके तो पुनर्विचार करें ।

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    1. संतोष जी,

      कविता तो लिखा ही नहीं। वैसे आपके आदेश का पालन कर दिया है।:)

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  3. बढ़िया ......
    सभी कुछ....
    भागने के सिवा :-)

    सादर
    अनु

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    1. जी,भागना ही बुरा था। कैमरे और मोबाइल को बचाने के चक्कर में भागना पड़ा।:(

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  4. वाह!
    आपके इस उत्कृष्ट प्रवृष्टि का लिंक कल दिनांक 10-09-2012 के सोमवारीय चर्चामंच-998 पर भी है। सादर सूचनार्थ

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  5. सुंदर चित्र साथ में शब्द चित्र भी खींच दिया

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  6. सुंदर चित्रों के साथ वर्णन अच्छा लगा .मगर कैमरा शब्द नें चेहरे पर मुस्कराहट ला दी

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  7. ये कौन चित्रकार है,
    ये कौSSSSन चित्रकार है...

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    1. ईश्वर के रंग निराले रे भैया..

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  8. देख कर लगा चित्र खींचने का साथ-साथ आपका कैमरा बोलने भी लगा है !

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  9. बादल वाले फोटो बहुत अच्छे आए हैं। एकदम चकाचक।

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  10. अत्यधिक सुन्दर चित्र ...और उदगार भी .....
    स्निग्ध धान आपके चित्रों में दे रहे हैं संदेस ....
    प्रभु ने बस बदला है भेस ...
    अँधेरे में भी धान श्वेत स्निग्ध लहलहाते .....
    हम इनसे कुछ क्यों नहीं सीख पाते ...????

    बहुत सार्थक पोस्ट ...
    सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण ....!!

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    1. आँखें
      देखती हैं
      फैले अँधेरे
      नहीं देख पातीं
      उगते उजाले।

      पल-पल बदलते
      मिले हैं नजारे
      ये इक पल अंधेरे
      ये इक पल उजाले।

      कभी तो है गर्मी से
      उमसाया मौसम
      कभी ठंडी-ठंडी
      हवा बह रही है
      कभी धार में
      डगमगाती है किश्ती
      कभी तो मिले हैं
      मन को किनारे।

      जहाँ भीगना था
      वहीँ काँपते हैं
      जब था ठहरना
      तभी भागते हैं
      ढूँढे हैं हमने
      झूठे सहारे।

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  11. साथ में कौन था ये कहीं नहीं बताया
    खुद भागे और जिससे कहा भागो
    उस भागते का फोटो क्यों नहीं लगाया

    बाकी उत्तम है !!

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    1. कल्पना कीजिए की वो बहुत खूबसूरत था।:)

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  12. पहली बार पढ़ी
    आपकी रचना
    बहुत अच्छी लगी
    पर
    अकेले इसे
    दुबारा पढ़ने से
    मना करता है मेरा मन
    सो लिये जा रहीं हूँ
    इसे अपने साथ
    नई-पुरानी हलचल में
    पढ़ेंगे साथ-साथ
    आप भी आइये न
    इसी बुधवार को
    आपकी पूर्व परिचित
    नई-पुरानी हलचल में
    सादर
    यशोदा

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    1. मन तो अभी उड़कर आने का हो रहा है:) बुधवार तक की लम्बी प्रतीक्षा! ओह..!!

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    2. शुकराना नज़र करती हूँ

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  13. मैं तो चित्रों में ही खो गया।

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    1. जी, चित्रों में डूबाने के लिए ही शब्दों का जाल बिछाया था।:)

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    2. और आप सफल हुए .:)

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  14. भीग-भाग के भागते, आगे आगे श्याम ।

    गोवर्धन को थामते, दें आश्रय सुखधाम ।

    दें आश्रय सुखधाम, मगर वे हमें डुबाते ।

    मनभावन यह चित्र, डूब के हम उतराते ।

    प्राकृतिक हर दृश्य, देखता रात जाग के ।

    हम को गए डुबाय, स्वयं तो गए भाग के ।।

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  15. वाह! बहुत खुबसूरत फोटोग्राफ्स...

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  16. sabhi kuch acche hai ...photo bho ....shabd bhi ...aur bhagne ki sacchaai bhi ...

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  17. बहुत सुन्दर!
    वैसे कास फूलने का समय आया, बारिश हो रही है तो किसान प्रसन्न ही होगा। पछेती की खेती इन बादलों की कृपा पर है!

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  18. पहले बारिश का मनोरम वर्णन और फिर भागो ..बहुत सुन्दर कही आपने..धन्यवाद जी

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  19. हाँ तो खोये हुवे थे आपके शब्द और कैमरे के चमत्कार में ... आपने कहा भागो ....
    आनद तो लेने देते कुछ ... हा हा ... मज़ा आ गया ...

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  20. चित्रों से नजर नहीं हटती...शब्द भी चित्र ही हैं.

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  21. वाह इस बार तो कमाल कर दिया आपने......सही समय पर भागोssss

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  22. सुंदर चित्रों के साथ कविता बहुत अच्छी लगी....

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  23. प्रकृति के सुन्दर चित्रण के साथ सुन्दर जीवंत प्रस्तुति देख मन बादलों के ओट में छुपने लगा है ..
    बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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    1. धन्यवाद कविता जी। मुझे तो भोपाल की बरसात से ईर्ष्या हो रही है आपकी पोस्ट पढ़कर।

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  24. अब जब आपने कह दिया कि यह कविता नहीं है तो फिर उसपर कुछ नहीं कहता.. वरना कुछ कहने की इच्छा थी.. और आपके फोटो फीचर के विषय में क्या कहूँ देवेन्द्र भाई.. मनमोहक ही कह सकता हूँ.. हमारे यहाँ भी ऐसा ही दृश्य है.. ऐसे में कह सकता हूँ कि आपकी पोस्ट साक्षात देखने को मिली..!! नैन जुड़ा गए, बस!!

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    1. ..आभार। वैसे बीच में..अनुपमा जी के कमेंट का उत्तर देते वक्त कविताई का मूड बन गया था।:) वैसे पता नहीं कविता क्या है! भावों की अभिव्यक्ति अगर कविता है तो यही कविता है। फिर आपका यह वाला लेख पढ़ने का मन हो रहा है...http://raj-bhasha-hindi.blogspot.in/search?updated-max=2012-09-09T09:35:00%2B05:30&max-results=2

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  25. बहुत सही!
    शानदार चित्र!

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  26. नयनाभिराम तस्वीरें..
    बेहद ख़ूबसूरत

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  27. सार्थक चित्रण .....बहुत खूब

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  28. Bahut sundar rachana aur tasveeren!

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  29. वाह! कमाल की फोटो हैं. मजा आ गया कविता पढ़, फोटो देख. चलचित्र हो गया.
    घुघूतीबासूती

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  30. खूबसूरत तस्वीरों की कहानी कही शब्द चित्रों ने !

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  31. मैंने कहा -बरसों राम धडाके से बुढ़िया मर जाए फाके से /आंधी आई मेह आया ,बड़ी बहु का जेठ आया /ये भैया पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोक गीत हैं जो बचपन में बहुत सुने थे कहावतें बने ये बोल ....रचना आपकी है अनमोल ,छायांकन बे -जोड़ .आपकी टिपण्णी का शुक्रिया भाई साहब !

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  32. वाह...शब्‍दों से ज्‍यादा खूबसूरत तस्‍वीरों ने प्रभावि‍त कि‍या मुझे....सुंदर

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  33. आपकी कविता आपके चित्र भी गा रहे हैं ।
    बेहद सुंदर चित्र और कविता भी ।

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  34. पाणी बाबा आओ रे ,
    काकडी भुट्टा लाओ रे |
    बहुत खबसूरत चित्रण |

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  35. चित्र कथा....क्या राग सजाया है..वाह!

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  36. वाह ! बेहद ख़ूबसूरत..

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  37. सच कह रहा हूँ..आज आपके ब्लॉग पर सिर्फ तस्वीरें देखने ही आया था..और बिलकुल निराश नहीं हुआ...बहुत सी तस्वीरें मिली और सब एक से बढ़कर एक....तस्वीरें आपके ब्लॉग की बहुत से USP में से एक है ;)

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