18.3.14

रंगों का इंद्रधनुष


होली में बाबा देवर लागें। जैसे ही यह वाक्य कान में पड़ा मैं पूरी तरह ज़वान हो गया। जब बाबा देवर हो सकते हैं तो हम क्यों नहीं? हम तो अभी वैसे भी ज़वान हैं। अब समस्या यह थी कि ज़वान तो हो गये मगर ज़वानी दिखाई कहाँ जाय पुरानी बीबी को ज़वानी दिखाने से क्या लाभ ? नई मिले तो कैसे मिले ? पड़ोस में ताका-झांकी ठीक नहीं। समय भी कम था। बहुत समय तो यही समझने में चला गया कि मैं ज़वान हूँ। वैसे भी पाँच दिन की होली एक दिन में सिमट चुकी है। होली के जाते ही जवानी कहीँ चली न जाय। बुढ्ढे हो चले दोस्तों को बताया तो वे मारे खुशी के चहकने लगे। कहने लगे.. हाँ यार! कुछ हमको भी ऐसा ही महसूस हो रहा है। हम भी नई ताकत महसूस कर रहे हैं। सब भोलेनाथ की कृपा है। चलो पहले उनका आशीर्वाद ले लिया जाय। उनको थैंक्यू बोल दिया जाय। 

हम बाबा के दरबार में पहुँचे तो वहाँ भीड़ अधिक नहीं थी लेकिन आरती की तैयारी चल रही थी। शिवलिंग की सफाई हो रही थी। दर्शन हुआ मगर लिंग पकड़ने का क्या, छूने का भी अवसर नहीं मिला। पुजारियों का एकाधिकार था। दोस्त गिड़गिड़ाते रहे मगर उन्होने एक न मानी। उनसे उलझने की हिम्मत नहीं थी। गोरे-गोरे मुष्टंडे। हों भी क्यों न! हम एक बार पर भर के लिए छू कर नई उर्जा का एहसास करते हैं, वे तो हरदम उसी में डूबे रहते हैं। 

वहाँ से निकलकर दालमंडी गये। धर्म से काम की गली। जैसे विश्वनाथ गली धर्म की गली है वैसे दालमंडी कभी वेश्याओं, मुजरेवालियों के लिए जाना जाता था। अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष सभी की गलियाँ चौक से होकर निकलती हैं। यह आप पर निर्भर है कि आप किस गली मुड़ना चाहते हैं। हम बाबा की कृपा से जवान हुए थे। सो उनका आशीर्वाद लेकर धर्म गली से काम गली की ओर मुड़ गये। वैसे अब यहाँ न मुजरा होता है न मुजरेवालियाँ मिलती हैं। काम गली, अर्थ गली में परिवर्तित हो चुकी है। बड़ा बाजार लगता है। सभी प्रकार के सामान उचित दाम पर मिल जाते हैं। बनारस में टोपी पहनी और अपनी दूसरे को पहनाई जाती है। हमे होली के लिए नई टोपियों की तलाश थी। 

गली में घुसते ही किशोरावस्था की नादानियाँ कौंध जाती हैं। यार दोस्त होली के दिन रंग खेलते-खेलते इस गली में घुस जाते थे। वे भी नये लौंडों को देखकर मस्त होती थीं। न वे नीचे उतरतीं न हममे सीढ़ियाँ चढ़ने की औकात थी। बस खिड़की से ही गालियों, इशारों का आदान-प्रदान होता था। जब पानी सर से ऊपर हो गुजरने लगता झट से कई खिड़कियाँ एक साथ खुलतीं और हम पर रंगों की बरसात हो जाती। हम और मस्ती में किलकते-उछलते । हम तब हटते जब खिलड़कियाँ पूरी तरह से बंद हो जातीं या फिर हमसे जोशिले ताकतवर लड़कों का बड़ा झुंड हमे वहाँ से भागने के लिए मजबूर कर देता। 

टोपियाँ लेकर गोदोलिया चौराहे से भाँग-ठंडई छानकर, मलाई रोल चाभते जब हम दशाश्वमेध घाट गये तो वहाँ का नजारा बड़ा फीका-फीका नजर आया। हम होरियाये मूड में दशाश्वमेध घाट पहुँचे थे मगर कुछ को छोड़कर बाकी गंगा आरती के बाद वाले सन्नाटे में डूबे हुए थे। दूसरे यात्री गंगा आरती के बाद लौट रहे थे। कुछ विदेशी घाट की सीढ़ियों पर रंग पोताये बैठे, बतियाते दिखे। महिलाएँ भी दिख रही थीं। हम जब छोटे थे, रंगभरी एकादशी से होली के दिन तक महिलाएँ घर से बाहर नहीं निकलती थीं। गली-गली में माहौल इतना गाली-गलौज, होली के हुड़दंग का रहता था कि वे चाहकर भी नहीं निकल पाती थीं। घर के मुखिया भी निकलने की इजाजत नहीं देते थे। अब दृष्य काफी बदल चुका है। महिलाएँ जमकर खरीददारी करती हैं, कहीं-कहीं बाहर निकलकर रंग भी खेलती हैं। 

माहौल देखकर मुझे लगा कि होली को राजनीति की नज़र लग चुकी है। टेढ़ीनीम पर भाजपाई थालियों में गुझिया, मगही पान पर मोदी के छोटे-छोटे चित्र सटाये, दुकान सजाये बैठे थे। अस्सी भी पूरी तरह राजनैतिक माहौल में डूबा हुआ था। पिछले साल की तरह होली के मूड में नहीं था। रास्ते में होलिका सजी थी। बाजार खूब सजे थे। भीड़ थी। मुझे लगा होली को सभी ने अपनी-अपनी मर्जी से बांट लिया है। कुछ बाजार ले गये हैं, कुछ राजनीतिज्ञों को चढ़ा आये हैं, कुछ आभासी दुनियाँ में सिमट गये हैं, कुछ कवि सम्मेलन के नाम पर नौटंकी कर रहे हैं और कुछ हमारे जैसे जबरी जवान बने, किसी अंग्रेज बुढ़िया के बालों जैसी टोपी लगाये गली-गली घूम रहे हैं। सात रंग अलग-अलग दिखें तो समझ में नहीं आते, मिल जायं तो इंद्रधनुष बन जाते हैं। रंगों का इंद्रधनुष मुझे तो नहीं दिखा..आपको दिखा हो तो आपको बहुत बधाई। 


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8.3.14

मच्छर और आदमी


वैसे तो मुझे सभी प्यार करते हैं मगर सबसे अधिक मच्छर करते हैं। मैं किसी को मच्छर की तरह प्यार नहीं कर पाता। मैं जब भी किसी को प्यार करने जाता हूँ आदमी बन जाता हूँ। आदमी के घर पैदा होने के बावजूद आदमी बने रहना मेरी कमजोरी मान लीजिए। वैसे धरती में कई आदमी हैं जो मुझे मच्छर की तरह प्यार करते हैं मगर मुझे मच्छर का प्यार अधिक अच्छा लगता है। इसके प्यार में कोई शंका नहीं रहती। जब मुझे प्यार करवाने का मन नहीं करता मैं आसानी से खुद को मच्छरदानी में छुपा सकता हूँ। आदमी के प्यार में यह सुख नसीब नहीं होता। आदमी जब प्यार करके उड़ जाते हैं तभी मैं  जान पाता हूँ कि वे मुझे मच्छर की तरह प्यार कर रहे थे!

जैसे मच्छर मच्छर से प्यार नहीं करता वैसे मुझे लगता है आदमी भी आदमी से प्यार नहीं करता।  मच्छर आदमी से, आदमी निरीह जानवरों से अधिक प्यार करते हैं। अब आप कहेंगे मच्छर आपको कैसे प्यार करते हैं? इसका उत्तर बड़ा आसान है। आप एक ही उदाहरण से समझ जायेंगे। जैसे नेता जनता से प्यार करता है वैसे ही मच्छर मुझसे प्यार करते हैं। एक नेता दूसरे नेता को शक की नज़रों से देखता है मगर जनता से बहुत प्यार करता है। मुझे ही नहीं आम आदमियों को भी नेता का प्यार अच्छा लगता है। तभी आम आदमी आजकल नेता बनने की जुगत में लगे हैं।

लोग जातिवाद और धर्मवाद की दुहाई देते नहीं थकते। एक दूसरे पर जातिवाद का, धार्मिक पक्षधरता का आरोप लगाते हैं मगर मैं जानता हूँ कि जैसे मच्छर मच्छर से प्यार नहीं करते, आदमी आदमी से प्यार नहीं करते, नेता नेता से प्यार नहीं करते वैसे ही कोई जाति अपने जाति से प्यार नहीं करती। जाति और धर्म का लबादा ओढ़े आदमी साधारण आदमी से कुछ ज्यादा खतरनाक, कुछ ज्यादा हिंसक हो जाता है। कभी-कभी मुझे शक लगने लगता है कि आदमी अपनी मक्कारी छुपाने और असुरक्षा के भय से धर्म और जाति का लबादा ओढ़े रहता है। वरना क्या कारण है कि अवसर मिलते ही अपनी जाति पर भी अमानवीय हरकत करने से बाज नहीं आता?

आपने कौओँ को लड़ते देखा होगा। कुत्तों को एक हड्डी के लिए आपस में गुर्राते देखा होगा। पंडों को आपस में जजमान के लिए झगड़ते देखा होगा। इतने उदाहरण होने के बावजूद पता नहीं क्यों लोग एक दूसरे पर जातिवादिता का, सांप्रदायिकत का आरोप लगाते हैं! जिस्म, भूख और भोजन के बीच परस्पर जो संबंध है, वही संबंध एक जीव का दूसरे जीव से होता है। आदमी से इतर दूसरे प्रकार के जीव इस संबंध को खुलेआम उजागर कर देते हैं मगर आदमी नहीं कर पाता। वह सोचता है मैं इन जीव जंतुओं से महान एक खास जीव हूँ जो सिर्फ खा ने और मैथुन के लिए नहीं बना है। गर्व कहता है-हम खाने के लिए नहीं जीते, जीने के लिए खाते हैं। मगर जब करने में आता है तो कभी निठारी, कभी निर्भया कांड कर डालता है! शर्मिंदा भी होता है। एक पकड़े जाने पर शर्मिंदा होता है, दूसरे जो पकड़े नहीं जाते वे आदमी होने पर शर्मिंदा होते हैं। झूठ का पकड़ा जाना हमेशा शर्मिंदगी का कारण होता है लेकिन कभी-कभी अपवाद भी होते हैं। झूठ पकड़े जाने पर भी कुछ लोग स्वीकार करने में पूरी उमर गुजार देते हैं। कानूनन जब उनका व्यभिचार सिद्ध हो जाता है तो वे स्वीकार करके दूसरे आरोप से वंचित, इज्जतदार आदमियों पर एहसान करते हैं। कुछ निर्लज्ज मरते दम तक लड़ते रहते हैं। पकड़े जाने के बावजूद आशा नहीं छोड़ते, जेल में ही राम-राम जपते रहते हैं। दूसरे जीव इन सभी अपराध बोध से मुक्त हो जीवन का आनंद लेते हैं।  न महानता का दंभ भरते हैं न शर्मिंदा होते हैं।

मुझे आदमी से अधिक इन जीव-जंतुओ पर प्यार आ रहा है। इनकी कथनी और करनी में कोई फर्क नज़र नहीं आता। सांप देखते ही सावधान हो जाता हूँ, मुर्गा देखते ही लालच लगने लगता है। मुझे खुद से मच्छरों की नीयत साफ़ दिख रही है। गली के कुत्ते का रोटी के लिए दौड़ना और मोहल्ले में किसी अजनबी के आने पर देर तक भौंकना याद आ रहा है।

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27.2.14

कहाँ है बसंत ?



द़फ्तर जाते हुए
रेल की पटरियों पर भागते
लोहे के घर की खिड़की से
बाहर देखता हूँ
अरहर और सरसों के खेत
पीले-पीले फूल!
क्या यही बसंत है?

भीतर
सामने बैठी
दो चोटियों वाली सांवली लड़की
दरवाजे पर खड़े
लड़कों की बातें सुनकर
लज़ाते हुए
हौले से मुस्कुरा देती है
लड़के
कूदने की हद तक
उछलते हुए
शोर मचाते हैं!
क्या यही बसंत है?

अपने वज़न से
चौगुना बोझ उठाये
भागती
लोहे के घर में चढ़कर
देर तक हाँफती
प्रौढ़ महिला को
अपनी सीट पर बिठाकर
दरवाजे पर खड़े-खड़े
सुर्ती रगड़ते
मजदूर के चेहरे को
चूमने लगती हैं
सूरज की किरणें!
क्या यही बसंत है?

अंधे भिखारी की डफ़ली पर
जल्दी-जल्दी
थिरकने लगती हैं उँगलियाँ
होठों से
कुछ और तेज़ फूटने लगते हैं
फागुन के गीत
झोली में जाता है
हथेली का सिक्का!
क्या यही बसंत है?

द़फ्तर से लौटते हुए
लोहे के घर से
मुक्ति की प्रतीक्षा में
टेसन-टेसन
अंधेरे में झाँकते
नेट पर
दूसरे शहर की
चाल जांचते
मोबाइल में
बच्चों का हालचाल लेते
पत्नी को
जल्दी आने का आश्वासन देते
मंजिल पर पहुँचते ही
अज़नबी की तरह
साथियों से बिछड़ते
हर्ष से उछलते
थके-मादे
कामगार!
क्या यही बसंत है
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22.2.14

गाँव


एक गाँव है
जहाँ सभी की
खाट खड़ी है
इक कुआँ है
जिसमें चउचक
भांग पड़ी है
कोई बांट रहा है लड्डू
कोई खील-बतासे
और जगत पर
डटे हुए हैं
जनम-जनम के प्यासे

मैं भी यहीं खड़ा हूँ।

हाथी
चुल्लू भर पानी तो
चीँटी
मांग रही तालाब
कौए
गीता बांच के बोले
पूरा है बकवास

कृष्ण
भगवान नहीं थे!

कोई खेले
कीचड़-कीचड़
कोई गा रहा
मल्हार
फागुन के मौसम में बारिश
कैसे न हो यार ?

होलिका भीग रही है।
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कविता के बाद....

सारे जहाँ से अच्छा
है गाँव यह हमारा
हम चुलबुले हैं इसके
यह जान है हमारा

यहीं जमाओ डेरा-डंडा
यहीं जमाओ पाँव
इससे अच्छा इस दुनियाँ में
कहीं नहीं है गाँव

पानी मस्त है यार!
……………


12.2.14

लोहे के घर से...


रेल की दो पटरियों में ट्रेन नहीं, लोहे के कई घर लिये पूरा शहर दौड़ता है। पूरा शहर लोहे का बना होता है। लोहे के शहर में घर, कंकरीट के शहर में बने घरों की तरह कई प्रकार के होते हैं। एक ही शहर में महल, एक मंजिले, दो मंजिले, बहुमंजिले या कच्चे मकानों की तरह एक ही ट्रेन में ए.सी., स्लीपर और अनारक्षित डिब्बे होते हैं। किसी-किसी शहर में आज भी बाग-बगीचे, खेल के मैदान, सूखे तालाब, बहती नदी दिख जाती है! पटरियों पर भागता शहर अपनी इस कमी को खिड़कियों से बाहर झांककर पूरा कर लेता है। वैसे भी शहरों के बाग-बगीचे सब की नसीब में कहाँ होते हैं? अधिसंख्य देखते हैं मगर अखबार पढ़कर ही जान पाते हैं कि इन बगीचों में सुबह के समय ताजी हवा बहती है! 

जैसे शहर कई प्रकार के होते हैं वैसे ही ट्रेनें भी कई प्रकार की होती हैं। राजधानी, महानगरी, सुपर फॉस्ट, पैंसिंजर..। पैंसिजर ट्रेनें रूक-रूक कर चलती हैं... छुक छुक छुक छुक, छुक छुक छुक छुक.. सुपर फॉस्ट.. धक-धक धक-धक, धक-धक धक-धक । जब कोई मसला फंसता है, पैंसिजर ट्रेन सेंटिंग में डाल दी जाती हैं। एक्सप्रेस ट्रेन चीखती-चिल्लाती धड़ल्ले से गुज़र जाती है। पैसिंजर ट्रेन के यात्री कम दाम के टिकट पर ही इतने प्रसन्न रहते हैं कि घंटो के अनावश्यक ठहराव का गम भी खुशी-खुशी सह लेते हैं। यह सुख गरीबी रेखा से नीचे वाले राशन कार्ड पर मिलने वाले लाभ जैसा है। भले ही रेंग कर चले, सरकार की कृपा से जिंदगी चलती तो है! 

लोहे के सुंदर शहर में.. अच्छे घर में.. मेरा मतलब सुपर फास्ट ट्रेन की आरक्षित बोगी में चल रह रहे लोगों की जिंदगियाँ सिकुड़ी-सिकुड़ी, सहमी-सहमी होती है। अनजान यात्रियों से बातें करना मना होता है। अनारक्षित बोगी के यात्री आपस में खूब बातें करते हैं। ऐसा माहौल हमें अपने शहर में भी देखने को मिल जाता है। गलियों में बसे छोटे-छोटे घरों की खिड़कियाँ आपस में खूब आँख-मिचौली करती हैं। खूब बातें करती हैं। बिजली पानी के लिए आपस में झगड़ती हैं। एक-एक इंच का हिसाब-किताब होता है लेकिन बड़े घरों के दरवाजे पर चौकिदार होता है! दरवाजे पर रुके नहीं कि शेर जैसा कुत्ता झपटता है-भौं! 

एक बड़ा ही रोचक पहलू है। कंकरीट के शहर में तो जिस घर में रहते हैं बस वैसा ही अनुभव होता है लेकिन लोहे के घर में हमें हर प्रकार का अनुभव मिल जाता है। ईंट-पत्थर के घरों में रहने वाले लोग ही, लोहे के घर में रहने के लिए बारी-बारी से आते-जाते रहते हैं। कभी सुपर फॉस्ट ट्रेन में ए.सी. का मजा लेते हैं, कभी अनाऱक्षित बोगी का तो कभी-कभी पैसिंजर ट्रेन की जिंदगी का भी अनुभव लेते हैं। घंटों ठहरे हुए पैसिंजर ट्रेन में बैठकर, धकधका कर गुजरते ‘सुपर फॉस्ट’ को कोसते हैं मगर सुपर फॉस्ट में चढ़ते ही, ए.सी. में बैठते ही, ‘पैंसिजर’ का दर्द भूल जाते हैं। 

ए.सी. में खिड़कियाँ नहीं खुलतीं। ताजी हवा भीतर नहीं आती। न अधिक गर्मी लगती है न अधिक ठंड। धीरे से पर्दा हटाकर आप शीशे के बाहर झांक सकते हैं मगर बाहर वाले नहीं झांक सकते आपके भीतर। हम ऐसा ही जीवन पसंद करते हैं। सबके भीतर झांकने की क्षमता और अपने लिए तगड़ा सुरक्षा कवच! पैसिंजर ट्रेन में जितना आप बाहर देखते हैं, लोग उससे कहीं अधिक आपके भीतर झांक लेते हैं। ए.सी. में नहीं आता लठ्ठा-नमकीन बेचने वाला, मुंगफली या चाय बेचने वाला। यहाँ ऑर्डर लिये जाते हैं, समय पर मिल जाता है स्वादिष्ट भोजन। भोजनालय यहाँ साथ चलता है। पैसिंजर ट्रेन के यात्री कम्बल, गठरी, झोला, लकड़ी, खाने-बनाने का सामान, सब साथ लिये चलते हैं। कभी-कभी तो मोटर साइकिल भी लाद लेते हैं बोगी में! खिड़की के रॉड में सिर्फ एक पैडिल पर टंग जाती है पूरी साइकिल!

कंकरीट के शहर में आप किस घर में रहते हैं यह आपकी आर्थिक क्षमता पर निर्भर करता है। लोहे के शहर में आप किस घर में रहते हैं यह हमेशा आपकी आर्थिक क्षमता पर निर्भर नहीं करता। आप अच्छे, सुरक्षित घर में रहना चाहते हैं, पैसा भी जेब में है मगर आरक्षण नहीं मिलता। मजबूरी में वहाँ रहना पड़ता है जहाँ रहने की आपको आदत नहीं है। किस ट्रेन में सफर करते हैं? यह मंजिल की दूरी पर निर्भर करता है। महलों में रहने वाले जैसे हर किसी से बात नहीं करते वैसे ही रजधानी या सुपर फॉस्ट ट्रेनें हर प्लेटफॉर्म पर नहीं रूकतीं। मंजिल का स्टेशन आपकी आवश्यकता तय करती है। यात्रा तय करता है। सुपर फॉस्ट ट्रेन के यात्रियों को बदकिस्मती से कभी-कभी अपने गाँव भी जाना पड़ता है। पैसिंजर ट्रेनों का सहारा भी लेना पड़ता है। पैंसिजर ट्रेन ही गाँव के स्टेशन पर रूकती है। ऐसे यात्री पूरे सफ़र में नाक-भौं सिकोड़ते रहते हैं। मंजिल से इतर किसी दूसरे स्टेशन पर देर तक रूकना उन्हें गहरा आघात पहुँचाता है। यह वैसा ही है जैसे किसी राजकुमार को अपनी कार दो पल रोककर किसी रिक्शे वाले से मार्ग पूछना पड़े। वे रिक्शेवाले को ‘थैंक्यू’ कहते हैं रिक्शेवाल खुश हो जाता है। राजकुमार दुखी कि आज यह दिन भी देखना पड़ा कि एक मामूली रिक्शेवाले से मंजिल का पता पूछना पड़ा..! 

आनंद आप पर निर्भर करता है। आप मंजिल पर पहुँचकर आनंद लेते हैं या सफर को ही आनंद दायक बनाते हैं। ए.सी. में बैठकर ही आनंद ले पाते हैं या पैसिंजर ट्रेन में भी आनंद ढूँढ लेते हैं ? यदि आपको सफ़र में कष्ट और मंजिल पहुँचकर ही आनंद आता है तो यकीन मानिए कि आपको पता ही नहीं, आनंद किस चिड़िया का नाम है! क्योंकि सफ़र तो अभी भी अधूरा है..! कभी हम लोहे के घर को अपना समझ बैठते हैं, कभी पत्थर के घर को मगर ज्ञानी कहते हैं हमारा जिस्म ही मिट्टी का बना है! हम मिट्टी के घर में रहते हैं!!! 


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10.2.14

दिल धक-धक करने लगा...

इस मौसम में माधुरी दीक्षित की याद आ रही है और याद आ रहा है उनका गाया सुपर हिट गीत—दिल धक-धक करने लगा...। 

मैने घर-बाहर टटोला तो पाया कि मेरा ही नहीं, सभी का दिल धक-धका रहा है। जो दफ्तर में हैं उनका भी, जो बेरोज़गार सड़क पर घूम रहे हैं उनका भी। जो पढ़ रहे हैं उनका भी, जो पढ़ा रहे हैं उनका भी। गुरूजी समझा रहे हैं-मन लगाकर पढ़ों बच्चों परीक्षा की घड़ी निकट है!’ मगर आग दोनो तरफ बराबर भड़की हुई है। गुरूजी का ध्यान अपनी अधिक आयकर कटौती पर है तो विद्यार्थियों का अपने वेलेनटाइन पर।

घर से दूर पढ़ने वाले बच्चे, काम करने वाले लोग सभी परेशान हैं। दो दिन की छुट्टी में घर जाऊँ या नहीं? घर में त्योहार मनाने के एवज में होने वाले खर्च का हिसाब-किताब लगा रहे हैं। मौज की कीमत आंकी जा रही है। त्योहारों की सनसनाहट के बीच चुनाव के बादल भी गरज़ रहे हैं। बड़ा  दिल धड़काऊ, मन भड़काऊ, पंख फड़फड़ाऊ मौमस आया है!

दो पड़ोसन आपस में बतिया रही थीं....

पहली ने कहा- सुनिये न...आपके ससुर जी तो हमेशा कहा करते थे मेरा दिल धड़क रहा है मगर कल मैने सुना आपके श्रीमान जी भी? लगता है आपके घर होली अभिये आ गई!”

दूसरी ने हाथ नचाते हुए उत्तर दिया-क्यों? श्रीमान जी का सुन लिया! टिंकू का नहीं सुना ? वह भी तो आज स्कूल से आते ही बस्ता पटक कर बड़बड़ा रहा था-मेरा दिल धड़क रहा है!’

पहली आँखें फाड़कर उछली- अच्छा! टिंकू भी..वेलेनटाइन...!!!”

तुम्हारा सर। पिताजी दिल के मरीज हैं। इनके दफ्तर में काम का बोझ है। टिंकू परीक्षा से घबड़ा रहा है। होली मेरे घर में नहीं तुम्हारे कपार चढ़कर नाच रही है।

दोनो के झगड़े को सुनकर अपना दिल तो और भी धक-धक करने लगा। :)

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2.2.14

तोता और मैना


एक मैना पिंजड़े के तोते से बहुत प्यार करती थी। अकेले में पिंजड़े के ऊपर बैठकर ढेरों बातें करती। तोता मैना पर रंग जमाने के लिए मनुष्यों की बोली बोलता—जै श्री राम! जै श्री राम!’ मैना न समझती, न बोल पाती। तोते से मतलब पूछती। तोता कहता--‘मैं क्या जानूँ ? यह तो आदमी की बोली है, आदमी जाने। मेरे मालिक ने जैसा सिखाया वैसा मैने सीख लिया।

कई वर्षों तक मैना नहीं आई। तोता मैना की याद में बहुत दुःखी रहता था। एक दिन तोते की खुशी का ठिकाना न रहा। मैना पहले की तरह उड़ती हुई आई और पिंजड़े के ऊपर बैठ गई। तोते ने मैना पर भाव जमाने के लिए बोलना शुरू किया-नमो..नमो। इस बार मैना को आश्चर्य नहीं हुआ। वह भी कई वर्षों तक एक पंडित जी की कैद में रहकर आई थी। वहाँ एक दूसरा तोता था। जिसे पंडित जी बोलना सिखाते थे। उसने भी तोते पर रंग जमाने के लिए बोलना शुरू किया- गोपी कृष्ण कहो बेटू..गोपी कृष्ण। तोते को बहुत आश्चर्य हुआ। उसने भी इसका मतलब पूछा। मैना ने उत्तर दिया-मैं क्या जानूँ? यह भी आदमी की बोली है। इनकी बोली एक जैसी थोड़ी न होती है! जैसे आदमी वैसी बोली।

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