16.10.16

वक्त ने कहा- मेरे पास घड़ी नहीं है!

दुखी इन्सान ने कहा  
मेरा वक्त ख़राब चल रहा है
वक्त हँसने लगा
 
उसने कहा
वो वाला समय कितना अच्छा था!
वक्त फिर हँसने लगा

उसने ईश्वर से प्रार्थना किया
हे प्रभु!
मेरा वक्त ख़राब चल रहा है, अच्छा कर दो!
मेरा प्रसाद स्वीकार करो

पुजारी ने प्रसाद चढ़ा कर आशीर्वाद दिया
पंडित जी ने
लम्बी पूजा कराई और दक्षिणा लेने के बाद बोले
तुम्हारा कल्याण हो
तुम्हारे अच्छे दिन आने ही वाले हैं

वह खुश हो गया
उसके साथ
पंडित जी भी खुश हुए
पुजारी भी खुश हुआ
और तो और
मंदिर के बाहर खड़े
सदा रोते रहने वाले
भिखारी ने भी
अपने गंदे हाथ पसारे
उसने
भिखारी को भी
खुशी-खुशी एक रूपया दिया
और आगे बढ़ गया  

वक्त  
पागलों की तरह
ठहाके लगाने लगा!!!
मैंने पूछा
कितनी देर से ठहाके लगा रहे हो
कुछ पता भी है ?

वक्त ने कहा-
मेरे पास घड़ी नहीं है!
और...
फिर ठहाके लगाने लगा.
.............

10.10.16

मैं मार्निंग वॉक पर था.

धूप
अभी आई नहीं थी धरती पर
प्यास
अचकचा कर जगी और
दौड़ने लगी

पंछी दाने के लिए
चौपाये
चारे के लिए
मनुष्य
अपने और पालतू पेट के लिए
घरों से निकलने लगे

दूसरे भी नज़ारे थे
कोई तेज-तेज चल रहा था
कोई दौड़ रहा था
और कोई
अजीब-अजीब आवाजें निकालते हुए
रह-रह कर
दोनों हाथ हवा में
लहरा रहा था
यह भूखे-प्यासे की नहीं
खाये, पीये, अघाये लोगों की दौड़ थी
मगर इनमें भी
कोई तृप्त नहीं था

उस प्यास की
कोई एक मूरत होती तो
तस्वीर खींच कर
दिखा देता
मेरे हाथ में कैमरा था
मैं मार्निंग वॉक पर  था.

8.10.16

लोहे का घर-21

धुलि-धुलि धरती
पानी भरे खेत
उड़ते बगुले
खुला-खुला आकाश
लोहे के घर की खिड़की से
दूर-दूर
क्षितिज में दिखते
घने वृक्षों तक
जहाँ तक जाती है नज़र
आनंद ही आनंद
राधे-कृष्ण-राधे कृष्ण।
..........................................


लोहे का घर न होता तो जिंदगी कितनी विरान होती सुबह नाश्ता करके बैठो, साथियों से हाय-हलो करो, गांव की ताजी-ताजी हवा लो, हरी-भरी थरती को देखो और किस्मत हो तो और-और मजे भी लूट लो।
शाम दफ्तर से जितने भी थके-मादे छूटो, #ट्रेन में बैठते ही थकान गायब! अपने गोदी में लिटा कर झूला झुलाती, लोरी सुनाती ले जाती है ट्रेन। लोहे के घर के अलावा यह सुख क्या आपको अपने घर में मिल सकता है? कोई है जो आपको घर में इतना प्यार करे?
आप मजाक समझ रहे हैं और मैं सच्चाई बयान कर रहा हूँ। यकीन न आ रहा हो तो घर से 60 किमी दूर अपना ट्रांसफर करवा लो। और भी कई फायदे हैं दूर रहने के। कोई आफिस के काम के लिए आपको कभी तंग न करेगा। छुट्टी में जब घर में रहेंगे तो पूरे घर के रहेंगे।
सरकार को भी लाभ है। जब दफ्तर में होंगे, तो पूरे दफ्तर के बने रहेंगेे। दिन में आफिस से उठ कर न बच्चों की फीस जमा कराने जायेंगे न पत्नी के आदेश पर घर का समान पहुँचाने। पता चला घर में काम लगा है और जनाब भाग-भाग कर घर ही जा रहे हैं काम देखने।
आज अभी का हाल बताऊँ। सभी लेटे-लेटे झूल रहे हैं अलग-अलग बर्ध में। रूट डाइवर्टेड ट्रेन मिली है। पूरी बोगी खाली है। सामने लेटे आदमी की तोंद क्या मस्त हिल रही है! उधर बैठे सफेद दाढ़ी वाले की लम्बी दाढ़ी शांति का संदेश दे रही है। वीडियो देख आनंद विभोर हैं संजय जी। मिर्जा को छोड़ कोई और बेचैन नहीं दिखता पूरी ट्रेन में। जब से लेटा है जाने क्या लिख रहा है अपने मोबाइल में!
...................................................................................................
क्यों लेटा वो आदमी? जैसे करेंट लग गया हो! मुझे लेटता देख दौड़ कर लेट गया!!! यह मेरी बर्थ है।
मैने कहा-आओ भाई लेटो। पूरी बर्थ तुम्हारी है, पूरा लेटो। उसके उठने से जो जगह खाली हुई वहाँ मैं बैठ गया। वो इतमिनान से लेट गया। लेटा है पर मुझे ही देख रहा है। लेटने के बाद भी उसे सुकून नहीं है। उसकी निगाहों में गहरी शंका है- बैठा आदमी इतना खुश क्यों है! मैं बैठा-बैठा लिख रहा हूँ, वो लेटा-लेटा मुझे देख रहा है। मेरे बैठने से पहले इसी स्थान पर वो बैठा था। शायद इतना खुश न था। अभी भी खुश नहीं दिखता! शायद सोच रहा है कि बैठ कर भी यह आदमी इतना खुश क्यों है?
अपनी #ट्रेन देर से रूकी है। भंडारी से चलने के बाद रुक गई। अभी एक स्टेशन भी नहीं चली और रुक गई। रुक गई तो रूक गई। अब किसकी ताकत है कि इसे चला दे? सरकारी है । कोई अरबारी-दरबारी तो है नहीं। जब मर्जी होगी तब रुकेगी, जब मर्जी होगी तब चलेगी। क्या मजाल कि आप प्रश्न करें! कोई यूरोपियन ट्रेन तो है नहीं कि लेट करने का कारण बतायेगी और हर्जाना भरेगी। भारतीय है। प्रभु जी की है। भक्तों को भगवान के निर्णय पर प्रश्न करने का क्या अधिकार?
अब चल रही है। चल क्या रही है, भाग रही है। लगता है झुंझलाकर चल रही है। पटरियाँ ऐसे बदल रही है कि पटरी छोड़ देगी! हे प्रभु! गुस्सा मत करो। आराम-आराम से चलो। न रुको न भागो। बनारस पहुँचा दो। हम क्या, पाकिस्तान भी घबड़ा गया है आपकी इस चाल पर।
........................................................................................
लोहे के घर को तपाना शुरू कर दिया सूर्य देव ने। धूप खिड़की से घुस कर पास बैठे यात्री को छू-छा कर आ/जा रही है। कोई शरारती लड़का शीशा चमका रहा हो जैसे! जहाँ बैठा हूँ वहाँ का माहौल बड़ा सभ्य टाइप का गुमसुम-गुमसुम, उदासी भरा है। 5 बुजुर्ग, 3 मजदूर और एक युवा हैं। युवा अखबार पढ़ने मे व्यस्त है, बुजुर्ग कुछ चिंतित दिखते हैं और मजदूर झपकी ले रहे हैं। कल शाम का माहौल कितना जुदा था!
कल शाम बड़ी भीड़ थी ट्रेन में। बमुश्किल जहाँ बैठ पाया था उसके ऊपर की द़ोनो बर्थ पर लड़कों का झुण्ड बैठा था। देख कर अंदाज लगाना मुश्किल था कि पढ़ने वाले लड़के हैं या कोई वानरी सेना! जूता पहने, इस बर्थ से उस बर्थ पर टांगे फेंके मोबाइल में गाना बजा रहे थे मगर कोई गाना सुन नहीं रहा था, सभी बोले जा रहे थे। नीचे से किसी ने हल्के से टोका-जूता तो उतार दो! तो झट उतार कर पंखे के ऊपर रख दिया। अब हवा के साथ धूल भी नीचे झरती रही और वे हा-हा, ही-ही करते रहे।
अपनी बर्थ से कुछ आगे चिड़ियों का झुण्ड बैठा था! जब चहचहाहट कान में गई तो बात साफ हुई। वे भी लगातार बोलते रहने वाली लड़कियाँ थीं। उनकी चहचहाहट लड़कों के ठहाकों से टकरातीं और प्रफुल्ल हो, लौटकर कानों में मिश्री घोलतीं। वे किसी कालेज की स्पोर्ट टीम के बच्चे थे जो किसी कम्पटीशन में भाग ले कर लौट रहे थे। वास्तविकता जान उनकी शरारतों पर गुस्से की जगह प्यार आने लगा था।
यह उम्र ही ऐसी है। इस उम्र में कुत्ते की टेढ़ी पूँछ देख कर भी हँसी आती है। पढ़ लिख कर भाग्य से नौकरी लग गयी तो फिर इनको हमारी तरह पटरी पर दौड़ना ही है। अभी बेपटरी हैं, ठीक हैं। झोला भर हँसी लिए घूम रहे हैं रस्ते में
.....................................................................
भंडारी स्टेशन जौनपुर में भोले बाबा की आरती खतम हुई । अब भजन शुरू हुआ...'सुखी रहे संसार, दुखी रहे न कोय' तक पहुँचते-पहुँचते गोदिया का एनाउंस शुरू हो गया। भक्त पाठ के बाद परसादी भी खा चुके। #गोदिया नहीं आई. अभी समय नहीं हुआ आने का। लगता है आज ठीक समय पर ही आयेगी। वरना 20 मिनट बिफोर रहती थी। इधर 'सुखी रहे संसार' खतम उधर गोदिया प्लेटफार्म पर। मगर हाय! अभी तक इंजन दिखा भी नहीं। इस #ट्रेन की प्रतीक्षा में पूरी टीम है जो कल की फिफ्टी में थे जिसमें चोरी हुई थी। अब दिख रहा है इंजन। हारन भी सुनाई पड़ रहा है। आ रही है गोदिया।
गोदिया आई तो हम सब मूंगफली खाने लगे। कोई खाता और छिलके सहेज कर रखता, कोई बार-बार खिड़की से बाहर फेंकने के लिए उठता। #मोदी जी ने मूंगफली खाने का मजा किरकिरा कर दिया! वो भी क्या दिन थे जब हम पूरी बोगी में छिलके उड़ाया करते थे! अब वे सीन देखने हों तो पैसिंजर की यात्रा करनी पड़ेगी। एक्सप्रेस में तो साफ-सफाई का इतना बवेला मचा है कि लोग छिलके फेंकने से लजाने लगे हैं। एक महिला मेरी बात सुन कर हँसने लगी-अच्छेे त हौ कि साफ-सफाई हौ। केतना अच्छा लगत हौ!
इस ट्रेन में शांति का माहौल रहता है, फिफ्टी में त्योहार का असर दिखता है। बिहार और पश्चिम बंगाल जाने वाले यात्री खूब होते हैं फिफ्टी में। बैठने भर की जगह भी नहीं मिलती। इसमें खूब जगह है। ताव से चल रही है पटरी पर। रोज के यात्री खुश हैं कि 5 दिनों की छुट्टी मिली है। हम सोच रहे हैं कि पूरे 5 दिन लोहे के घर से जुदा रहना पड़ेगा, क्यों न लम्वी यात्रा का प्रोग्राम बनाया जाये! आखिर 5 दिन कटेगा कैसे? क्यों न #आलूफैक्टरी की संभावनाओं पर शोध किया जाय इन छुट्टियों में?
...........................................................................

25.9.16

सुबह की बातें


खामोश हैं, वृक्ष सभी। आंगन में झरे नहीं हैं एक भी पत्ते। चल रही सांसें बता रही हैं कि हवा है। शिकायत के स्वर में चहक रहे हैं पंछी। अखबार वाला दे गया है अखबार। देर से खुली है नींद। दिल में उतर रहा है शुभ प्रभात.

अपने कॉलोनी में अशोक, कदम्ब और सागवान के वृक्ष लगे हैं. घर में प्रवेश द्वार की ओर अशोक, नीबू, बेला के अलावा एक गुड़हल का बूढा पौधा है जो अब फैलकर छत में भी पत्ते गिराने लगा है. वृक्ष अच्छे लगते हैं मगर इससे झरने वाले पत्ते अच्छे नहीं लगते. घर की तो जैसे तैसे सफाई हो जाती है मगर घर से बाहर कालोनी में रोज-रोज साफ़ करना संभव नहीं.कोई सफाई कर्मी कालोनी में नहीं आता. पहले कूड़ा उठने वाला आता था एक महीने से वो भी नहीं आ रहा. मैंने जमादार से एक झाड़ू बनवाई है. जब मैं झाड़ू लगाता हूँ तो अगल-बगल के लोग ललचाई नज़रों से मेरी झाड़ू को देखते हैं मगर कोई झाड़ू के लिए पैसे खर्च करना नहीं चाहता. कोई छोटी झाड़ू डंडे में बांध कर चलाता है तो कोई दस मिनट झाडू लगाने के बाद कमर पकड़ कर बैठ जाता है.कालोनी में झाड़ू लगाने वाले सेवानिवृत्त बुजुर्ग लोग हैं. किसी युवा के पास इस बेकार के काम के लिए फुर्सत नहीं है. आज छुट्टी थी तो सोचा स्वछता अभियान चलाया जाय.

एक घंटे पसीना बहाकर घर और आसपास के इलाकों की सफाई कर दरवाजे पर खडा ही हुआ था कि हवाओं को शरारत सूझी. झाड़ू लगाने तक तो शांत थे, सफाई होते ही तेज-तेज बहने लगे. सूखे पत्तों के ढेर उड़ने लगे. नए पत्ते झमाझम झरने लगे. दस मिनट में ही कालोनी की सड़क फिर वैसी हो गई जैसी झाड़ू लगाने से पहले थी. जब हवाएं प्रतिकूल हो जांये तो आपकी मेहनत का यूं ही कबाड़ा हो जाता है. झाड़ू लगाने से अच्छा है फेसबुक का मजा लिया जाय और बढ़िया-बढ़िया आदर्श बघारा जाय. :


बैठा हूँ धमेख स्तूप-सारनाथ के सामने लोहे की लम्बी कुर्सी पर। पसीना बहाने के बाद अब एहसास हो रहा है कि हवा बह रही है। घने नीम के वृक्षों से स्तूप और स्तूप से वृक्षों पर बैठ छुपन-छुपाई खेलते, गाते दूसरे पंछियों की तरह गा रहे हैं कौए भी।मार्निंग वाक करने वाले जा चुके हैं घूम-घाम कर। अब गाजे-बाजे के साथ आ रहे हैं बुदध के भक्त और स्कूल से भाग कर आये कमसिन जोड़े। सभी प्रेम में है। मुझसे 5-5 फीट की दूरी पर, अगल-बगल बेंच पर दोनो तरफ बैठे हैं एक-एक जोड़े। उनकी तस्वीरें खींचना अच्छी बात नहीं लेकिन शब्द चित्र तो उतार ही सकता हूँ। वे भी निश्चिंत प्रेमालाप कर रहे हैं। खुश हैं कि बुढ्ढा समझदार है, हमारी फोटो नहीं खींच रहा।
बायीं ओर का जोड़ा ठीक-ठाक है, दोनो बालिक हैं। सामान्य कपड़ों मे हैं। कुछ खा-पी रहे हैं। मुझे इनसे कोई परेशानी नहीं। परेशानी दाहिनी ओर बैठे जोड़े से है। दाहिनी ओर बैठा लड़का सामान्य ड्रेस मे है लेकिन लड़की स्कूल ड्रेस में! समस्या उनके प्रेम से नहीं, स्कूल के ड्रेस मे है। कालेज भी नहीं, स्कूल ड्रेस में!!! मुझे लगता है यह अपराध है। अपने साथ, अपने घर वालों के साथ और स्कूल के साथ भी। इस अपराध को रोकने की जिम्मेदारी किसकी है?

सन्डे के दिन मॉर्निंग वॉक के बाद फुर्सत में जब नीम के पेड़ के नीचे बैठता हूँ तो ऊपर शाख पर बैठे तोते मुझे खूब मन की बात सुनाते हैं। मुझे उनकी बातें टांय-टांय के सिवा कुछ समझ में नहीं आती। मैं तोतों को अपने पैरों के छाले दिखाता हूँ। वे देखा, अनदेखा कर उड़ जाते हैं। वे हरदम इतनी ऊँचाई से उड़ते हैं कि मेरे छाले देख ही नहीं पाते। मैं सोचता हूँ जब मेरे छाले नहीं देख पाते तो उनके कैसे देख पाएंगे जो पत्थर तोड़ते हैं!

पंछियों को पहचानता नहीं हूँ। इनको सुनता खूब हूँ, देखता भी हूँ मगर इनको इनके नाम से नहीं जानता। मोर की चीख, कोयल की कूक, कौए की काँव-काँव, बुलबुल का चहकना, तोते की टें, टें, कबूतरों की गुटर-गूँ और गौरैया की चहचहाहट तो समझता हूँ मगर इनके अलावा बहुत से पंछी हैं जिनके गीत तो सुनता हूँ, नाम नहीं जानता। नाम का न जानना मेरे आनंद लेने में कोई समस्या नहीं है। आनन्द लेने के मामले में मैं बहुत स्वार्थी रहा हूँ। कभी नाम जानने का प्रयास ही नहीं किया बस गुपचुप इन पंछियों के संगीत सुनता रहा। यही कारण है कि आज तक मैं इन पंछियों का नाम नहीं जान पाया। समस्या अभिव्यक्ति में है। आनंद देने में है।

शायद अपने पूर्वांचल में पंछियों के सबसे अधिक मुखर होने का यही मौसम है। भोर में...मतलब भोरिये में..लगभग 4 बजे के आस-पास..एक चिड़िया मेरे इकलौते आम की डाली पर बैठ कर सुरीले, तीखे स्वर में चीखती है। तब तक चीखती है जब तक मैं जाग न जाऊँ! जाग कर मैं उसी को सुनता रहता हूँ। कभी सोने का मन हो तो भगा कर फिर लेटा हूँ। वह फिर चीखी है..तब तक जब तक अजोर न हो जाय! मैं उसका नाम नहीं जानता। जानता तो बस एक वाक्य लिखता और आप समझ जाते कि मैं किस चिड़िया की बात कर रहा हूँ!

सारनाथ पार्क में मोर और कोयल के साथ संगत करती है एक चिड़िया। ऐसा लगता है जैसे जलतरंग बजा रहा है कोई! एक दूसरी प्रजाति वीणा की झंकार की तरह टुन टुनुन टुनुन ..की तान छेड़ती है। अब मुझे इन पंछियों के नाम मालूम होते तो आपको बताने में सरलता होती। फलाँ चिड़िया ने राग मल्हार गाया, फलाँ ने राग ...अरे! बाप रे!!! मुझे तो राग के नाम का भी ज्ञान नहीं। :(

कई बार और मजेदार बात हुई है। मॉर्निंग वॉक के समय पंछियों को खूब बोलते हुये सुन मैंने राह चलते ग्रामीण से पूछा है-दद्दा बतावा! आज चिरई एतना काहे गात हइन ? दद्दा ने जवाब दिया है-गात ना हइन। पियासल हइन, चीखत हइन! अब आप बताइये, कवियों के कलरव गीत पर अकस्मात सन्देह होगा या नहीं?
मिर्जा कहते हैं -पण्डित जी मैं आपको फूलों, पत्तियों और वृक्षों के नाम बताता हूँ, बाकी आपका काम है। अधिक पूछने पर बनारसी संस्कार दिखाते हुये झल्लाने लगते हैं-देखा! ....मत चाटा। ई नाम में का रख्खल हौ? मजा ला। कवि क ..आंट मत बना।
बड़ी समस्या है। अब मान लीजिये मुझे सबका नाम पता होता और लिख भी देता तो क्या आप समझ पाते कि मैं किस पंछी की बात कर रहा हूँ?। घने नीम के नीचे लेटना ही सुखद है, यहाँ तो नीम के कई वृक्ष हैं। दायें बाएं, दूर और दूर। नीम की शाख में तोतों के झुण्ड के झुण्ड तंय-टांय कर रहे हैं। 
सतियानास! धमेख स्तूप के पीछे बने जैन मंदिर से लाऊड स्पीकर से भजन बजने लगा! उनका ईश्वर प्रसन्न हो रहा होगा लेकिन मेरे आनंद में अब खलल पहुँच रहा है। सवा सतियानास! पीछे बुध्द मंदिर से भी लाउडस्पीकर बजने लगा! बुद्धम शरणम् गच्छामी! जय हो... बुद्ध कितने प्रसन्न हो रहे होंगे! 

24.9.16

लोहे का घर-20


एक झपकी सी लगी थी लोहे के घर में। बर्फिली पहाड़ियों से दिखते कास के फूल लहुलुहान हो गये थे सहसा! आ गया होऊँ जैसे युद्ध के मैदान में। नहीं, शामिल नहीं था किसी आत्मघाती दस्ते में। ऐसे दस्ते बनाने की मनाही है अपने देश में। पार कर रहा था पाक अधिकृत कश्मीर का आखिरी दर्रा अकेले ही। खलबली थी पाक खेमे में। ये कौन कर रहा है बमों की बारिश! बह रही थी खून की नदी। कर रहा था मेघ गर्जन। बिछी थी पाकिस्तानी सैनिकों की लाशें। गिन रहा था पागलों सा...एक हजार, दो हजार, तीन हजार.......सोलह हजार, सत्रह हजार..बस्स!!! इतने ही थे तुम्हारे? बहुत उछल रहे थे सत्रह को मारकर! आओ...और आओ...अब तो शुरू हो चुका है युद्ध।
विपरीत दिशा से आ रही दूसरे #ट्रेन की चीखती क्रासिंग से ध्यान भंग हुआ। धत्त! यह तो पागलपन है। कैसे-कैसे सपने आने लगे हैं दिन में भी! मिर्जा! ये कहाँ आ गये हम? कब आयेगा अपना पड़ाव?

......................................................................................

एक झोले में सब कुछ है। अपड़ा-कपड़ा, भगवान और दूसरे झोले में पानी का जग, खाने का सामान। उम्र 75 साल, भेष साध्वी का। जौनपुर से चढ़ी हैं, काशी जाना है। कहीं रामायण से आ रही हैं। शरीर कमजोर नहीं है, तनकर बैठी हैं। 14 बरस से छोड़ दी हैं घर-द्वार। बोले जा रही हैं...जब नहीं रहे भतार तो साथ हैं भरतार। वही भरता है, वही तार से तार जोड़ता है। पूछता हूँ...बीमार पड़ गईं तो? तपाक से दाहिने हाथ की तरजनी ऊपर कर बोलती हैं... वो नहीं है? वो नहीं देखेगा? मरने से पहिले हमको चारपाई पर रखेगा? बीमार करेगा तो कहाँ रहेगा? करेगा न कुछ व्यवस्था। पूर्ण आत्म विश्वास से भरी सुना रही हैं शिव भजन...आदि शंभु स्वरुप मुनीवर, चंद्र शीश जटा धरम....।
कोई नहीं है साथ, कोई नहीं घर बार, साथ है तो ईश्वर के प्रति गहरी आस्था, भक्ति और इसी के प्रभाव से दमकता, चमकता चेहरा। 'लोहे का घर' रोज कुछ नया दिखाता है, रोज कुछ नया सुनाता है।

..........................................................................................

हवा में ठंडक है। गोधुली बेला में लोहे के घर की खिड़की से दिख रहे हैं झूमते आम्र वृक्ष। एक लड़का तेज साइकिल चलाकर भागा जा रहा है पगडंडी-पगडंडी। रोज के यात्री खुश हैं कि लेट है फरक्का। बोगी में भीड़ नहीं है। तेजी से बदल रहे हैं दृष्य। कुछ बड़े हो गये हैं धान। अभी उन्होने नहीं पहनी हैं बालियाँ। बरगद की जटा पकड़ कर झूल रहे हैं गांव के किशोर। धीमी हो रही #ट्रेन। लम्बे सरपत और फूले कास के बीच साइकिल के पीछे भाई को बिठा चली जा रही है सांवरी। आ गया जफराबाद। यहाँ भी खड़े हैं रोज के यात्री।
पानी वाले बादलों से घिरा है आकाश। दूर कहीं हो रही होगी बारिश। फिर रफ्तार पकड़ रही है अपनी ट्रेन। बूँदा-बांदी, झमा झम बारिश में बदल गयी सहसा! बंद हो गयीं घर की खिड़कियाँ। शीशे पर रेंगने लगीं बूँदें। अब मजा नहीं दे रही बारिश। बंद हो गई हैं लोहे के घर की खिड़कियाँ। घर मे उमस है, खेतों में जश्न मना रहे हैं कौए। भीतर लोग संभावित भारत पाकिस्तान युद्ध की कर रहे हैं चर्चा। कोई कह रहा है-होगा, कोई कह रहा है-कभी नहीं होगा। बाहर मस्त हैं परिंदे। लहलहा रही है धान की फसल। युद्ध चाहने वाले नहीं जानते कि शीशे पर तेजी से रेंग रही पानी के बुल्लों सी पल में मिट जायेंगी लाखों जिंदगी।
अब रूक चुकी है बारिश। खुल गयी हैं घर की खिड़कियाँ। अंधेरा ओढ़कर सोने के मूड में आ रही है धरती। परिंदे लौट चुके हैं अपने-अपने घंरौंदे में। सुखा रहे होंगे पंख। पटरी पर भाग रही है अपनी ट्रेन। हमारे खेतों को, परिंदों को एटमी हथियारों की नजर न लगे।
..........................................................................................

पटरी पर भागता लोहे का घर। बिन जाली की आपात कालीन खिड़की। तेज हवा से फरफर उड़तीं मेरी जुल्फें। काश! तुम होती मेरी सीट पर और सामने बैठा मैं तुमहें निहारता रहता। बाहर अंधेरा है, न चाँद न चाँदनी। दूर कंकरीट के घरों में जुगनू की तरह टिमटिमाते बल्ब ही दिखाई दे रहे हैं। भीतर, बोगी में, बैठे-बैठे ऊँघ रहे हैं दो थकेमांदे।
चीखती, चिल्लाती रूक गयी ट्रेन। किसी ने चेन पुलिंग की है। पहले से 11 घंटे लेट है। किसी का करम फूटा, किसी का सोया भाग्य जगा। सही होती तो अपने को कहाँ मिल पाती! अब इस पिटी#ट्रेन के साथ इतनी छेड़-छाड़! यह अच्छी बात नहीं। फिर रफ्तार पकड़ लिया। शायद कह रही है-मेरी चाल तो यह है, मुँएं चलने दें तब न!
फिर चेन पुलिंग! यह तो हद है यार। कोई है? अरे! इस ट्रेन का नाम 'सदभावना' है। इसके साथ इतनी दुर्भावना क्यों? नान स्टाप को बार-बार स्टाप क्यों करते हो भाई? इस नीति से तो कोई सरकार अच्छे दिन नहीं ला सकती।
दफ्तर से लौटता, ट्रेन में बैठे-बैठे ऊँघता, थका-मांदा प्राणी ट्रेन रूकने पर चौंक कर जागता, कुछ भुनभुनाता, इधर-उधर देखता फिर ऊँघने लगता है। मुझे इनमें साक्षात #प्रभु के दर्शन हो रहे हैं। जागो सरकार! जागो। ट्रेन पर चल रही है मगर सबकुछ ठीक ठाक नहीं घट रहा। शरारती तत्व बार-बार चेन पुलिंग कर रहे हैं।
अच्छे भले रोमांटिक मूड का सतियानास कर दिया इस ट्रेन ने।

17.9.16

राजनीति

मिर्जा को शिकायत है कि हम राजनीति पर नहीं लिखते! मैं पूछता हूँ- राजनीति में लिखने लायक शेष बचा ही क्या है ? कीचड़ में कंकड़ फेकना और एक दूसरे के मुख पर उछालने की उमर नहीं रही। बचपन में करते थे लंठई मगर इतनी तो तब भी न होती थी।

अपने पास न बड़ा कुनबा, न धार्मिक कट्टरता, न जातिवादी मानसिकता, न आम आदमी सरीखी खास बनने की भूख और न पैसा ! राजनीति में जाने के एक भी गुण नहीं। जहाँ जा ही नहीं सकते उसके बारे में क्या लिखना! मेरे लिखने से किसी का ह्रदय परिवर्तित  हो जाये, कठिन तप करके  इतनी योग्यता भी नहीं .  फिर लिखना ही क्यों? जो विषय अपना नहीं उस पर दिमाग क्यों चलाना? सुबह किसी निर्णय से प्रभावित होकर कुछ लिख दिया, शाम को निर्णय वापस! लिखा हुआ गुण, गोबर हो गया! क्या फायदा?

मेरे इतना कहने पर भी मिर्जा मानता नहीं, कुनमुना कर एक शब्द हवा में उछालता  है....समाजवाद ? मैं कहता हूँ-चुप कर मिर्जा! मरवायेगा क्या? हम अमर नहीं, मर सकते हैं। समाजवाद कभी साकार न होने वाला वह सपना है जो पीढ़ी दर पीढ़ी हर युवा को झकझोरता रहेगा, बुढ्ढे कहते रहेंगे कि समाजवाद की बड़ी लड़ाई उन्होंने ही लड़ी थी. अब आज के युवकों में वो बात कहाँ! और पीढ़ी दर पीढ़ी राजनेता समाजवाद के तवे को गर्म करते रहेंगे, इस पर अपने घर की रोटियाँ सेंकते रहंगे। न पूँजीवादियों की कमी होगी देश में न समाजवादियों की। पुरानी शराब नई बोतल में आती रहेगी। 

मिर्जा! मुझे रहने दे। मुझे उगते सूरज और चहचहाते पंछियों की बात करने दे, सफर का आनंद लेने दे। मंजिलें उनको मुबारक जो राज करते देश में। मुझे गोबर पाथती महिला, पशुओं के चारे के लिए सर पर बोझ ढोती घसियारिन, स्कूल जाते बच्चे और मजदूरी करते, काम पर जाते लोगों में विश्वकर्मा भगवान की एक झलक देख लेने दे। अपने जीवन संघर्ष के बाद शेष बचे दो पल इन्हीं सब में गुजर जाने दे। व्यक्ति के गुणों में राजनीति एक चमत्कार है। इससे बनती देश की सरकार है। इसे दूर से नमस्कार करने में भलाई है मिर्जा, चल!  यहाँ से निकल। इनकी नजर पड़ गई तो तू  गोल, हम लम्बे हो जायेंगे।

13.9.16

कुम्हार


कुल्हड़ हैं,
पुरुवे हैं,
दिये भी हैं
लोग
मिट्टी से
जुड़े भी हैं

अभी है
बनारस की मस्ती
अभी है
कुम्हारों की बस्ती.

श्रम कठिन,
सिमटता बाजार है
गरदन में
लटकती तलवार है
फैलते शहर,
सिमटते खेत,
गायब हो रही मिट्टी
मिट्टी ही
कच्चा माल है
अब इनका
बुरा हाल है
यही
विश्वकर्मा हैं,
यही
मजदूर हैं
सुख-सुविधाओं  से
कोसों दूर हैं

मेरे सामने
इक दरकता पुल है,
आ रही
अंधी गाड़ी है
और
कुछ कर न पाने की
लाचारी है.

अभी तो...
कुल्हड़ हैं,
पुरुवे हैं,
दिये भी हैं
लोग
मिट्टी से
जुड़े भी हैं.
....................