25.9.16

सुबह की बातें


खामोश हैं, वृक्ष सभी। आंगन में झरे नहीं हैं एक भी पत्ते। चल रही सांसें बता रही हैं कि हवा है। शिकायत के स्वर में चहक रहे हैं पंछी। अखबार वाला दे गया है अखबार। देर से खुली है नींद। दिल में उतर रहा है शुभ प्रभात.

अपने कॉलोनी में अशोक, कदम्ब और सागवान के वृक्ष लगे हैं. घर में प्रवेश द्वार की ओर अशोक, नीबू, बेला के अलावा एक गुड़हल का बूढा पौधा है जो अब फैलकर छत में भी पत्ते गिराने लगा है. वृक्ष अच्छे लगते हैं मगर इससे झरने वाले पत्ते अच्छे नहीं लगते. घर की तो जैसे तैसे सफाई हो जाती है मगर घर से बाहर कालोनी में रोज-रोज साफ़ करना संभव नहीं.कोई सफाई कर्मी कालोनी में नहीं आता. पहले कूड़ा उठने वाला आता था एक महीने से वो भी नहीं आ रहा. मैंने जमादार से एक झाड़ू बनवाई है. जब मैं झाड़ू लगाता हूँ तो अगल-बगल के लोग ललचाई नज़रों से मेरी झाड़ू को देखते हैं मगर कोई झाड़ू के लिए पैसे खर्च करना नहीं चाहता. कोई छोटी झाड़ू डंडे में बांध कर चलाता है तो कोई दस मिनट झाडू लगाने के बाद कमर पकड़ कर बैठ जाता है.कालोनी में झाड़ू लगाने वाले सेवानिवृत्त बुजुर्ग लोग हैं. किसी युवा के पास इस बेकार के काम के लिए फुर्सत नहीं है. आज छुट्टी थी तो सोचा स्वछता अभियान चलाया जाय.

एक घंटे पसीना बहाकर घर और आसपास के इलाकों की सफाई कर दरवाजे पर खडा ही हुआ था कि हवाओं को शरारत सूझी. झाड़ू लगाने तक तो शांत थे, सफाई होते ही तेज-तेज बहने लगे. सूखे पत्तों के ढेर उड़ने लगे. नए पत्ते झमाझम झरने लगे. दस मिनट में ही कालोनी की सड़क फिर वैसी हो गई जैसी झाड़ू लगाने से पहले थी. जब हवाएं प्रतिकूल हो जांये तो आपकी मेहनत का यूं ही कबाड़ा हो जाता है. झाड़ू लगाने से अच्छा है फेसबुक का मजा लिया जाय और बढ़िया-बढ़िया आदर्श बघारा जाय. :


बैठा हूँ धमेख स्तूप-सारनाथ के सामने लोहे की लम्बी कुर्सी पर। पसीना बहाने के बाद अब एहसास हो रहा है कि हवा बह रही है। घने नीम के वृक्षों से स्तूप और स्तूप से वृक्षों पर बैठ छुपन-छुपाई खेलते, गाते दूसरे पंछियों की तरह गा रहे हैं कौए भी।मार्निंग वाक करने वाले जा चुके हैं घूम-घाम कर। अब गाजे-बाजे के साथ आ रहे हैं बुदध के भक्त और स्कूल से भाग कर आये कमसिन जोड़े। सभी प्रेम में है। मुझसे 5-5 फीट की दूरी पर, अगल-बगल बेंच पर दोनो तरफ बैठे हैं एक-एक जोड़े। उनकी तस्वीरें खींचना अच्छी बात नहीं लेकिन शब्द चित्र तो उतार ही सकता हूँ। वे भी निश्चिंत प्रेमालाप कर रहे हैं। खुश हैं कि बुढ्ढा समझदार है, हमारी फोटो नहीं खींच रहा।
बायीं ओर का जोड़ा ठीक-ठाक है, दोनो बालिक हैं। सामान्य कपड़ों मे हैं। कुछ खा-पी रहे हैं। मुझे इनसे कोई परेशानी नहीं। परेशानी दाहिनी ओर बैठे जोड़े से है। दाहिनी ओर बैठा लड़का सामान्य ड्रेस मे है लेकिन लड़की स्कूल ड्रेस में! समस्या उनके प्रेम से नहीं, स्कूल के ड्रेस मे है। कालेज भी नहीं, स्कूल ड्रेस में!!! मुझे लगता है यह अपराध है। अपने साथ, अपने घर वालों के साथ और स्कूल के साथ भी। इस अपराध को रोकने की जिम्मेदारी किसकी है?

सन्डे के दिन मॉर्निंग वॉक के बाद फुर्सत में जब नीम के पेड़ के नीचे बैठता हूँ तो ऊपर शाख पर बैठे तोते मुझे खूब मन की बात सुनाते हैं। मुझे उनकी बातें टांय-टांय के सिवा कुछ समझ में नहीं आती। मैं तोतों को अपने पैरों के छाले दिखाता हूँ। वे देखा, अनदेखा कर उड़ जाते हैं। वे हरदम इतनी ऊँचाई से उड़ते हैं कि मेरे छाले देख ही नहीं पाते। मैं सोचता हूँ जब मेरे छाले नहीं देख पाते तो उनके कैसे देख पाएंगे जो पत्थर तोड़ते हैं!

पंछियों को पहचानता नहीं हूँ। इनको सुनता खूब हूँ, देखता भी हूँ मगर इनको इनके नाम से नहीं जानता। मोर की चीख, कोयल की कूक, कौए की काँव-काँव, बुलबुल का चहकना, तोते की टें, टें, कबूतरों की गुटर-गूँ और गौरैया की चहचहाहट तो समझता हूँ मगर इनके अलावा बहुत से पंछी हैं जिनके गीत तो सुनता हूँ, नाम नहीं जानता। नाम का न जानना मेरे आनंद लेने में कोई समस्या नहीं है। आनन्द लेने के मामले में मैं बहुत स्वार्थी रहा हूँ। कभी नाम जानने का प्रयास ही नहीं किया बस गुपचुप इन पंछियों के संगीत सुनता रहा। यही कारण है कि आज तक मैं इन पंछियों का नाम नहीं जान पाया। समस्या अभिव्यक्ति में है। आनंद देने में है।

शायद अपने पूर्वांचल में पंछियों के सबसे अधिक मुखर होने का यही मौसम है। भोर में...मतलब भोरिये में..लगभग 4 बजे के आस-पास..एक चिड़िया मेरे इकलौते आम की डाली पर बैठ कर सुरीले, तीखे स्वर में चीखती है। तब तक चीखती है जब तक मैं जाग न जाऊँ! जाग कर मैं उसी को सुनता रहता हूँ। कभी सोने का मन हो तो भगा कर फिर लेटा हूँ। वह फिर चीखी है..तब तक जब तक अजोर न हो जाय! मैं उसका नाम नहीं जानता। जानता तो बस एक वाक्य लिखता और आप समझ जाते कि मैं किस चिड़िया की बात कर रहा हूँ!

सारनाथ पार्क में मोर और कोयल के साथ संगत करती है एक चिड़िया। ऐसा लगता है जैसे जलतरंग बजा रहा है कोई! एक दूसरी प्रजाति वीणा की झंकार की तरह टुन टुनुन टुनुन ..की तान छेड़ती है। अब मुझे इन पंछियों के नाम मालूम होते तो आपको बताने में सरलता होती। फलाँ चिड़िया ने राग मल्हार गाया, फलाँ ने राग ...अरे! बाप रे!!! मुझे तो राग के नाम का भी ज्ञान नहीं। :(

कई बार और मजेदार बात हुई है। मॉर्निंग वॉक के समय पंछियों को खूब बोलते हुये सुन मैंने राह चलते ग्रामीण से पूछा है-दद्दा बतावा! आज चिरई एतना काहे गात हइन ? दद्दा ने जवाब दिया है-गात ना हइन। पियासल हइन, चीखत हइन! अब आप बताइये, कवियों के कलरव गीत पर अकस्मात सन्देह होगा या नहीं?
मिर्जा कहते हैं -पण्डित जी मैं आपको फूलों, पत्तियों और वृक्षों के नाम बताता हूँ, बाकी आपका काम है। अधिक पूछने पर बनारसी संस्कार दिखाते हुये झल्लाने लगते हैं-देखा! ....मत चाटा। ई नाम में का रख्खल हौ? मजा ला। कवि क ..आंट मत बना।
बड़ी समस्या है। अब मान लीजिये मुझे सबका नाम पता होता और लिख भी देता तो क्या आप समझ पाते कि मैं किस पंछी की बात कर रहा हूँ?। घने नीम के नीचे लेटना ही सुखद है, यहाँ तो नीम के कई वृक्ष हैं। दायें बाएं, दूर और दूर। नीम की शाख में तोतों के झुण्ड के झुण्ड तंय-टांय कर रहे हैं। 
सतियानास! धमेख स्तूप के पीछे बने जैन मंदिर से लाऊड स्पीकर से भजन बजने लगा! उनका ईश्वर प्रसन्न हो रहा होगा लेकिन मेरे आनंद में अब खलल पहुँच रहा है। सवा सतियानास! पीछे बुध्द मंदिर से भी लाउडस्पीकर बजने लगा! बुद्धम शरणम् गच्छामी! जय हो... बुद्ध कितने प्रसन्न हो रहे होंगे! 

31 comments:

  1. शुभ प्रभात । पेड़ और पत्ते । मेरे पडो‌सी बहुत गालियाँ देते हैं साल भर मेरे पेड़ों से झर रहे पत्तों को जो उनके इलाके में पहुँच जाते हैं । बंदर उधम मचाते हैं तो यही पेड़ उस समय गालियाँ खाते हैं । पूजा के समय पत्तियों की जरूरत हो या श्राद्ध के समय चौड़े अंजीर के पत्ते लोग खींसे निपोरते हुऐ माँगने चले आते हैं । जय हो ।

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    1. छांव, आक्सीजन, चिड़ियों का कलरव सब भूल जाते हैं। सिर्फ असुविधा का रोना ही रोते हैं।

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  2. सैर के बहाने बहुत सी मन की बातें बड़ी सार्थक है
    सुन्दर प्रस्तुति

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  3. ऑक्सीजन से भरपूर सुबह की बातें ।

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  4. प्रकृति की गोद में मन की बात बस मन मोह गयी! एक दुर्लभ दृश्य महानगरों के लिए!

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  5. शब्द चित्र बहुत सुन्दर...हरियाली देखना सुखद...पेड़ पर बैठे पक्षी का बिन सुने ही कलरव का अहसास|
    सुन्दर पोस्ट !

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  6. सुबह के तीनों चित्रों में नज़रिये की ताज़गी है। वृक्षों के पत्तों से गंदगी नहीं होती। प्रकृति स्वयं इनका प्रबंधन कर देती है। सबसे अच्छा लगा आपका पक्षियों की चहचाहट का आनंद लेना ... प्रकृति हमें कितनी तरह से आत्मिक सुख प्रदान करती है।

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  7. सुबह की ताज़ी हवा और चिड़ियों की चहचाहट सी ही ताजगी आपकी कलम में है . आपकी चिडया का नाम धनेश है ---- इंडियन ग्रे हार्नबिल !

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  8. बहुत सुंदर शब्द चित्र.प्रकृति के संग बात ही कुछ और है.

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  9. सुबह के सारे दृश्य
    पहली सूर्य किरण की मन्द हवा से लगे
    रसोई से उठता धुआँ दिखा
    पंछियों का कलरव गूँज उठा ...

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  10. पेड़ लगा लेना ही काफी नहीं.
    पिछले हफ्ते ही पैसे देकर पेड़ की छंटाई हुई और फिर उसकी डालियां और बिखरे पत्ते साफ उठाने के लिए फिर से भुगतान किया क्योंकि अकेले मेरे वश का काम नहीं था. पेड़ के नीचे गाड़ी खड़ी करने वाले इस दौरान बच कर निकलते रहे.😊

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    1. मगर सुबह ही इस पोस्ट को पढ कर मन प्रसन्न हो गया.

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  11. सुबह की चहलकदमी और मनोरंजन भी..वाकई जिंदगी इक सफर है सुहाना..वह भी सुबह सुबह का..

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  12. यह वर्णन मन को प्रसन्न कर गया -शब्दों के माध्यम से चित्र आँखोें के सामने से गुज़रते रहे -आभार !

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    1. आपकी प्रशंसा पा कर अपनन्दित हुआ...आभार.

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  13. true happiness lies in small things...yehi ek ehsaas mila hai..

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