24.9.16

लोहे का घर-20


एक झपकी सी लगी थी लोहे के घर में। बर्फिली पहाड़ियों से दिखते कास के फूल लहुलुहान हो गये थे सहसा! आ गया होऊँ जैसे युद्ध के मैदान में। नहीं, शामिल नहीं था किसी आत्मघाती दस्ते में। ऐसे दस्ते बनाने की मनाही है अपने देश में। पार कर रहा था पाक अधिकृत कश्मीर का आखिरी दर्रा अकेले ही। खलबली थी पाक खेमे में। ये कौन कर रहा है बमों की बारिश! बह रही थी खून की नदी। कर रहा था मेघ गर्जन। बिछी थी पाकिस्तानी सैनिकों की लाशें। गिन रहा था पागलों सा...एक हजार, दो हजार, तीन हजार.......सोलह हजार, सत्रह हजार..बस्स!!! इतने ही थे तुम्हारे? बहुत उछल रहे थे सत्रह को मारकर! आओ...और आओ...अब तो शुरू हो चुका है युद्ध।
विपरीत दिशा से आ रही दूसरे #ट्रेन की चीखती क्रासिंग से ध्यान भंग हुआ। धत्त! यह तो पागलपन है। कैसे-कैसे सपने आने लगे हैं दिन में भी! मिर्जा! ये कहाँ आ गये हम? कब आयेगा अपना पड़ाव?

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एक झोले में सब कुछ है। अपड़ा-कपड़ा, भगवान और दूसरे झोले में पानी का जग, खाने का सामान। उम्र 75 साल, भेष साध्वी का। जौनपुर से चढ़ी हैं, काशी जाना है। कहीं रामायण से आ रही हैं। शरीर कमजोर नहीं है, तनकर बैठी हैं। 14 बरस से छोड़ दी हैं घर-द्वार। बोले जा रही हैं...जब नहीं रहे भतार तो साथ हैं भरतार। वही भरता है, वही तार से तार जोड़ता है। पूछता हूँ...बीमार पड़ गईं तो? तपाक से दाहिने हाथ की तरजनी ऊपर कर बोलती हैं... वो नहीं है? वो नहीं देखेगा? मरने से पहिले हमको चारपाई पर रखेगा? बीमार करेगा तो कहाँ रहेगा? करेगा न कुछ व्यवस्था। पूर्ण आत्म विश्वास से भरी सुना रही हैं शिव भजन...आदि शंभु स्वरुप मुनीवर, चंद्र शीश जटा धरम....।
कोई नहीं है साथ, कोई नहीं घर बार, साथ है तो ईश्वर के प्रति गहरी आस्था, भक्ति और इसी के प्रभाव से दमकता, चमकता चेहरा। 'लोहे का घर' रोज कुछ नया दिखाता है, रोज कुछ नया सुनाता है।

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हवा में ठंडक है। गोधुली बेला में लोहे के घर की खिड़की से दिख रहे हैं झूमते आम्र वृक्ष। एक लड़का तेज साइकिल चलाकर भागा जा रहा है पगडंडी-पगडंडी। रोज के यात्री खुश हैं कि लेट है फरक्का। बोगी में भीड़ नहीं है। तेजी से बदल रहे हैं दृष्य। कुछ बड़े हो गये हैं धान। अभी उन्होने नहीं पहनी हैं बालियाँ। बरगद की जटा पकड़ कर झूल रहे हैं गांव के किशोर। धीमी हो रही #ट्रेन। लम्बे सरपत और फूले कास के बीच साइकिल के पीछे भाई को बिठा चली जा रही है सांवरी। आ गया जफराबाद। यहाँ भी खड़े हैं रोज के यात्री।
पानी वाले बादलों से घिरा है आकाश। दूर कहीं हो रही होगी बारिश। फिर रफ्तार पकड़ रही है अपनी ट्रेन। बूँदा-बांदी, झमा झम बारिश में बदल गयी सहसा! बंद हो गयीं घर की खिड़कियाँ। शीशे पर रेंगने लगीं बूँदें। अब मजा नहीं दे रही बारिश। बंद हो गई हैं लोहे के घर की खिड़कियाँ। घर मे उमस है, खेतों में जश्न मना रहे हैं कौए। भीतर लोग संभावित भारत पाकिस्तान युद्ध की कर रहे हैं चर्चा। कोई कह रहा है-होगा, कोई कह रहा है-कभी नहीं होगा। बाहर मस्त हैं परिंदे। लहलहा रही है धान की फसल। युद्ध चाहने वाले नहीं जानते कि शीशे पर तेजी से रेंग रही पानी के बुल्लों सी पल में मिट जायेंगी लाखों जिंदगी।
अब रूक चुकी है बारिश। खुल गयी हैं घर की खिड़कियाँ। अंधेरा ओढ़कर सोने के मूड में आ रही है धरती। परिंदे लौट चुके हैं अपने-अपने घंरौंदे में। सुखा रहे होंगे पंख। पटरी पर भाग रही है अपनी ट्रेन। हमारे खेतों को, परिंदों को एटमी हथियारों की नजर न लगे।
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पटरी पर भागता लोहे का घर। बिन जाली की आपात कालीन खिड़की। तेज हवा से फरफर उड़तीं मेरी जुल्फें। काश! तुम होती मेरी सीट पर और सामने बैठा मैं तुमहें निहारता रहता। बाहर अंधेरा है, न चाँद न चाँदनी। दूर कंकरीट के घरों में जुगनू की तरह टिमटिमाते बल्ब ही दिखाई दे रहे हैं। भीतर, बोगी में, बैठे-बैठे ऊँघ रहे हैं दो थकेमांदे।
चीखती, चिल्लाती रूक गयी ट्रेन। किसी ने चेन पुलिंग की है। पहले से 11 घंटे लेट है। किसी का करम फूटा, किसी का सोया भाग्य जगा। सही होती तो अपने को कहाँ मिल पाती! अब इस पिटी#ट्रेन के साथ इतनी छेड़-छाड़! यह अच्छी बात नहीं। फिर रफ्तार पकड़ लिया। शायद कह रही है-मेरी चाल तो यह है, मुँएं चलने दें तब न!
फिर चेन पुलिंग! यह तो हद है यार। कोई है? अरे! इस ट्रेन का नाम 'सदभावना' है। इसके साथ इतनी दुर्भावना क्यों? नान स्टाप को बार-बार स्टाप क्यों करते हो भाई? इस नीति से तो कोई सरकार अच्छे दिन नहीं ला सकती।
दफ्तर से लौटता, ट्रेन में बैठे-बैठे ऊँघता, थका-मांदा प्राणी ट्रेन रूकने पर चौंक कर जागता, कुछ भुनभुनाता, इधर-उधर देखता फिर ऊँघने लगता है। मुझे इनमें साक्षात #प्रभु के दर्शन हो रहे हैं। जागो सरकार! जागो। ट्रेन पर चल रही है मगर सबकुछ ठीक ठाक नहीं घट रहा। शरारती तत्व बार-बार चेन पुलिंग कर रहे हैं।
अच्छे भले रोमांटिक मूड का सतियानास कर दिया इस ट्रेन ने।

3 comments:

  1. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल सोमवार (26-09-2016) के चर्चा मंच "मिटा देंगे पल भर में भूगोल सारा" (चर्चा अंक-2477) पर भी होगी!
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ-
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. लोहे के घर में कदम रखते ही आप फॉर्म में आ जाते हो, फिर शुरू होता है लोह-विमर्श- आत्म दर्शन और जग दर्शन! लोह-मंथन से निकलते हैं कई रत्न, और अमृत जिसका सेवन पाठक गण हो जाते हैं तृप्त!!

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