28.1.12

माँ सरस्वती



तूने दिया है प्यार माँ
स्वीकार कर आभार माँ

माता-पिता कोई नहीं
बस तू ही है आधार माँ

मेरा नहीं तेरा ही है
जो कुछ भी है घर-बार माँ

कोई न था बस तू ही थी
जब था बहुत लाचार माँ

आशीष दे लड़ता रहूँ
जितना भी हो अंधियार माँ

फिर फूल सरसों के खिले
आ मूर्त हो इस बार माँ

छू लूँ चरण इक बार मैं
भव से मुझे अब तार माँ

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विशेषः बसंत पंचमी चाहे 9 फरवरी, 1962 को आये चाहे 28 जनवरी 2012 को, है तो जन्म दिन !

(चित्र गूगल से साभार)

22.1.12

ढाई बाई चार फुट की चौकी



ढाई बाई चार फुट की चौकी
जिसके चारों तरफ लगे हैं
हर कोनों पर उठे लकड़ी के मुठ्ठों से जुड़ी
अलमुनियम के रॉड की रेलिंग
एक बच्चे के
रात में सोते समय
बिस्तर से गिरते रहने की चिंता का परिणाम
सुरक्षित पलंग।
                   
चौकी में रेलिंग नहीं है
कट चुके हैं लकड़ी के मुठ्ठे
बड़ा हो चुका है बच्चा
अब नहीं सो सकता चौकी पर
प्राचीन पलंग पर बैठकर
अब वह
रोज सबेरे
पढ़ता है अखबार
रगड़ता है चंदन
(ताखे पर विरासत में बैठे ठाकुर जी के लिए)
खाता है
दाल-भात
रात
देर से आने पर
वहीं ढकी मिल जाती है उसे
रोटी-सब्जी भी।

जगते हैं भाग
घूरे के भी
सनमाइका जड़ा है
ढाई बाई चार फुट की चौकी में !
जिसके इर्द गिर्द
लोहे की चार कुर्सियों पर बैठकर
दोस्तों के साथ
अब वह
शान से पी रहा है
चाय


एक दिन
दफ्तर से लौटकर
देखता है 
सदन बढ़ई जोड़ रहा है
चार पैर
ढाई बाई चार फुट की चौकी में
चौकी
अब नहीं रही चौकी
बन चुकी है
डाइनिंग टेबुल !
उसके इर्द-गिर्द
रखी हैं
चार नई प्लॉस्टिक की कुर्सियाँ
जिस पर बैठकर
वह और उसका परिवार 
एक साथ कर सकते हैं भोजन
खुश हो
कहती है उसकी पत्नी...
एक कुर्सी और लाइये न !
ताकि साथ बैठ सके
छुटकी भी।

डाइनिंग टेबुल की जुड़ी टांगों पर
उभर आये रंग
खुद ही कहते हैं
अपनी
राम कहानी

अकेले में
जब कोई नहीं होता कमरे में
बहुत ध्यान से   
सुनता रहता है वह
ढाई बाई चार फुट की चौकी और
डाइनिंग टेबल के बीच की
बातचीत
और.... 
ट्यूबलाइट की रोशनी
नाक पर चढ़े चश्मे को देखकर  
समझती है
कि वह अभी
अखबार पढ़ रहा है।
...................................................

17.1.12

अधिकारी

एक सरकारी बाबू ने
ज्योतिषी को अपना हाथ दिखाया
पूरा एक सौ एक  चढ़ाया
और पूछा...
बाबा !
मैं हूँ एक अदना सा कर्मचारी
बोलिए !
कब होगी तरक्की ?
कब बनुँगा अधिकारी ?

बाबा मुस्कुराए
बोले...
बिलकुल ठीक समय पर आए
आप शीघ्र ही बनेंगे
उच्चाधिकारी
आपके अण्डर में होंगे
तीन-तीन अधिकारी
यात्रा के लिए मिलेगी
बड़ी सी सवारी
एक दिन
जनता करेगी आपका सम्मान
भीड़ की शक्ल में आकर
देगी
भरपूर दान !

सुनते ही वह
बाबा के चरणों में
नतमस्तक हो गया
उठा
तो उनके भारी तोंद की तरह
गदगद हो गया

बाबा थे महान
बाबा थे ज्ञानी
सोलह आने सच हुई
उनकी भविष्यवानी
दूसरे दिन ही आ गया
सरकारी फरमान
आपको कराना है
चुनाव में मतदान
आप हैं
लोकतंत्र के
सर्वोच्च पीठ पर आसीन
जी हाँ !
बना दिए गये हैं
पीठासीन !

आपके अण्डर में हैं
तीन-तीन मतमान अधिकारी
और बूध तक ले जाने के लिए
ट्रक की सवारी

आदेश पढ़ते ही
उसका ह्रदय तार-तार हो गया
दौड़कर
बाबा के सीने पर सवार हो गया
बोला..
बाबा !
आपने यह क्या कर दिया ?
मांगा था वरदान
शाप दे दिया !!

बाबा हँसते हुए बोले..

अधिकार सिर्फ
मजे लूटने का नाम नहीं है
वह अधिकारी क्या
जिसे कर्तव्य का ज्ञान नहीं है !

जाइये
ठीक से चुनाव कराइये
समय से जाइये
समय से आइये
कर्तव्य से यूँ न घबड़ाइये
बीच में
उड़न छू
न हो जाइये

किस्मत से मिली है
यह जिम्मेदारी
अब आपको दिखाना है
कि आप हैं
एक अच्छे अधिकारी।
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15.1.12

बनारस की छत और पतंगबाजी














पतंग

आवा राजा चला उड़ाई पतंग ।

एक कन्ना हम साधी
एक कन्ना तू साधा
पेंचा-पेंची लड़ी अकाश में
अब तs ठंडी गयल
धूप चौचक भयल
फुलवा खिलबे करी पलाश में

काहे के हौवा तू अपने से तंग । [आवा राजा चला...]

ढीला धीरे-धीरे
खींचा धीरे-धीरे
हम तs जानीला मंझा पुरान बा
पेंचा लड़बे करी
केहू कबले डरी
काल बिछुड़ी जे अबले जुड़ान बा

भक्काटा हो जाई जिनगी कs जंग । [आवा राजा चला...]

केहू सांझी कs डोर
केहू लागेला अजोर
कलुआ चँदा से मांगे छुड़ैया
सबके मनवाँ मा चोर
कुछो चले नाहीं जोर
गुरू बूझा तनि प्रेम कs अढ़ैया

संझा के बौराई काशी कs भंग। [आवा राजा चला...]
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बाल सखा,  जिन्होने हमें पतंगबाजी का न्यौता दिया, वे तो एक कटोरा भांग छानकर टुन्न पड़े थे। छत पर चढ़ने लायक भी नहीं।




14.1.12

वयोवृद्ध साहित्यकार, विवेकी राय, जगतगुरू रामानन्दाचार्य पुरस्कार से सम्मानित



आज 14 जनवरी 2012 को वाराणसी में श्री मठ की शाखा, श्री बिहारम, बड़ी पियरी स्थित अमरा बापू सभागार में जगतगुरू रामानन्दाचार्य की 713 वीं जयंन्ती मनाई गई। इस अवसर पर वाराणसी के पंचगंगा घाट स्थित श्री मठ के आचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी और गोपाल मंदिर प्रसिद्ध वैष्णव पीठ के आचार्य आदरणीय श्याम मनोहर जी महाराज मुख्य अतिथि के रूप में मंच पर विराजमान थे। इस अवसर पर जगतगुरू रामानंदाचार्य और भक्ति प्रस्थान आंदोलन विषयक विद्वत् संगोष्ठी और डा0 पव नाथ द्विवेदी जी की संस्कृत भाषा में अनुदित पुस्तक के लोकार्पण के साथ साथ विशिष्ट कार्यक्रम के अंतर्गत वरिष्ठ साहित्यकार श्री विवेकी राय जी का सम्मान समारोह भी आयोजित था।

अक्षरब्रह्म के आराधक, भोजपुरी के भगीरथ, वयोवृद्ध साहित्य कार विवेकी राय जी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। जब डा0 उदय प्रताप सिंह जी ने बताया कि आज कबीर चौरा में विवेकी राय जी का सम्मान समारोह आयोजित है तो एक खुशी की लहर दौड़ गई। उनका बनारस में होना और सम्मान समारोह के आयोजन की खबर इतनी महत्वपूर्ण थी कि मैं वहां दौड़ा चला गया।


काशी के वरिष्ठ साहित्यकारों तथा श्रीमठ परिवार की उपस्थिति में आयोजित इस सम्मान समारोह में पूर्ण वैदिक रीति से तिलक चंदन लगाकर, विवेकी राय जी को एक लाख रूपये का जगतगुरू रामानन्दाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया। प्रमुख वक्ता के रूप में आचार्य कमलेश दत्त त्रिपाठी और वंशीधर त्रिपाठी जी उपस्थित थे।

आयोजन की कुछ तश्वीरें खीची और विवेकी राय जी का भाषण भी अपने मोबाइल में टेप कर घर ले आया। शोर में आवाज इतनी साफ नहीं है कि पॉडकास्ट लगाया जाय और उसे आपको सुनाया जाय। जो कर सकता था वह यह कि सुनकर उनका भाषण ज्यों का त्यों यहां प्रकाशित कर रहा हूँ।








पुरस्कार प्राप्त करने के पश्चात इस अवसर पर बोलते हुए विवेकी राय जी ने कहा... 



इस जगतगुरू के पवित्र पीठ का यह आशीर्वाद है। कृपा है जो पहुँच पाया। मुझे लगता था कि पहुंज पाउंगा कि नहीं। खड़ा भी हो पाउंगा कि नहीं । लेकिन आप तो ईश्वर तुल्य हैं। आपकी शक्ति से ही जो कुछ हुआ, वह हुआ है। सच पूछिये तो मैं तो साहित्यकार हूँ लेकिन मेरे पास कार नहीं है। हाँ, एक कार है। अहंकार की कार... कि मैं साहित्यकार हूँ। लेकिन उस अहंकार को आज मैं गाजीपुर छोड़ कर आया हूँ। आज यहां मैं जगतगुरू रामानन्दाचार्य द्वारा और उनके पद प्रतिष्ठित साहबों का कृपा पात्र बनकर, उनका पात्र बनकर आया हूँ। भक्त बनकर आया हूँ। सम्मान तो बहुत मिले लेकिन ऐसे प्रातः स्मरणीय, पुन्यशील, पवित्र हाथों का पुरस्कार बहुत दुर्लभ है और यह दुर्लभ मुझे आज मिला। सन 2000 में जगतगुरू रामानन्दाचार्या के सर्वोच्च ज्ञानपीठ समारोह का आयोजन गाजीपुर में हुआ था । गाजीपुर में महाराज का आगमन हुआ। वहां गाजीपुर के विशिष्ट लोगों को महाराज ने प्रशस्तिपत्र दिया। मुझे कुछ मिला नहीं। लेकिन जिस प्रेम से स्वामी जी मिले मैने कहा इससे अच्छा क्या हो सकता है। एक घटना हुई आपने मुझे रामनामी ओढ़ा दिया। ओढ़कर मैं बैठ गया। इसके बाद उन्होने मुझसे कहा कि एक बढ़िया शाल ओढ़ा दो..रामनामी हट गई। शाल ओढ़ा दिया गया। मैने समझा कि अभी वैराग्य लायक नहीं हूँ, घोर संस्कारी हूँ।  रामनामी के योग्य नहीं हुआ हूँ। अब 87 वर्ष की उम्र में अब क्या चाहते हैं महाराज जी ? एक लाख रूपिया देकर कहां ले जायेंगे..! हा..हा..हा..

यह गद्दी 15 वीं शताब्दि से लेकर भक्ति की जो जोत जला रही है, वह जलती रहेगी और अनंत काल तक जलती रहेगी। स्वामी रामानंदाचार्य एक नाम नहीं है वरन एक शक्तिशाली उर्जा की लहर है जो समय के साथ समाप्त नहीं हो जाती समय के साथ इसका प्रभाव और बढ़ता जाता है, बढ़ता रहा है ...तमाम-तमाम क्रांतिकारी कदम हुए वे अद्धभुत हैं।

भारत उन्नति करतेकरते प्रगतिशील आंदोलन तक आया है। और वैसा प्रगतिशील आंदोलन आचार्य रामानंद जी द्वारा 15 वीं, 16वीं शताब्दि में ही खड़ा कर दिया गया था। इनके शिष्य परम्परा में ऐसे शिष्य नहीं हैं जिनका साहित्य, उनके जीवन काल में ही बुझ जाय बल्कि समय के साथ और भी प्रभावी रूप में बढ़ता जाता है, लोगों के मन मस्तिष्क पर  छाता जाता है। कितने चाव के साथ आज कबीर को पढ़ाया जाता है! और कितने गर्व से कहा जाता है कि रामानंद जी ने एक ऐसा अग्नि धर्मी शिष्य दिया जिसके एक एक दोहे में, एक एक शब्दों मे जैसे क्रांति की चिंगारी है! और वह साहित्य की, धर्म की, चाहे कहीं..कोई भी शाखा हो वह सर्वत्र स्वीकृत है जिसका सृजन सर्वत्र समादृत है। सृजनवादियों में..जनवादियों में भी वह समादृत है। वह प्रेम के गीत गाता है। वह विरह के गीत भी गाता है। वह कुल्हाड़ा लेकर घर भी खोदता है।  तुलसी दास जी भी उसी स्रोत से आये। सही बात तो यह है कि इसका बड़ा श्रेय रामानंदाचार्य जी को जाता है। यह रामानंद जी की अत्यंत पवित्र गद्दी है। यह पुरष्कार जो मुझे मिला, इससे मेरा जीवन धन्य हो गया। अब मैं अधिक कहने की स्थिति में नहीं हूँ, थक गया हूँ, सभी को प्रणाम करता हूँ।



कुछ और चित्र काशी के वरिष्ठ साहित्यकार.....








सभा का कुशल संचालन और आये विद्वानों का सम्मान प्रसिद्ध साहित्यकार और आलोचक डा0 उदय प्रताप सिंह जी ने (बीच में जैकेट पहने)  किया...




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मकर संक्रांति

प्रस्तुत पोस्ट आनंद की यादें से उद्धरित है, उनके लिए जिन्होने इसे नहीं पढ़ा। आप सभी को मकर संक्रांति की शुभकामनाएं। 


मकर संक्रांति का त्योहार ज्यों-ज्यों करीब आता त्यों-त्यों पक्के महाल के घरों की धड़कने तेज होती जातीं। बच्चे पतंग उड़ाने की चिंता में तो माता-पिता बच्चों की चिंता में दिन-दिन घुलते रहते। कमरे में लेटो तो यूँ लगता कि हम एक ऐसे ढोल में बंद हैं जिसे कई एक साथ पीट रहे हैं। अकुलाकर छत पर चढ़ो तो बच्चों की पतंग बाजी देखकर सांसें जहाँ की तहाँ थम सी जातीं। तरह-तरह की आवाजें सुनाई देतीं....अरे...मर जैबे रे.s..s..गिरल-गिरल..s..s..कटल-कटल.s..s..बड़ी नक हौ..!..आवा, पेंचा लड़ावा.....ढील दे रे.s..ढील दे.s..खींच के.s..भक्काटा हौ...। जिस दिन पिता जी की छुट्टी होती उस दिन आनंद के लिए घर पर पतंग उड़ाना संभव नहीं था। उस दिन वह श्रीकांत या दूसरे दोस्तों के घरों की शरण लेता मगर जब पिताजी नहीं होते आनंद खूब पतंग उड़ाता। हाँ, मकर संक्रांति के दिन सभी को अभय दान प्राप्त होता था। आनंद के घर की छत के ठीक पीछे दूसरे घर की ऊँची छत थी। जब कोई पतंग कट कर आती तो वहीं रह जाती। उस पतंग को लूटने के चक्कर में आनंद बंदर की तरह उस छत पर चढ़ता। जरा सा पैर फिसला नहीं कि तीन मंजिल नीचे गली में गिरने की पूरी संभावना थी। उस छत पर चढ़ते आनंद के भैया उसे देख चुके थे। सख्त आदेश था कि पतंग लूटने के चक्कर में वहाँ नहीं चढ़ना है मगर पतंग लूटने का मोह आनंद कभी नहीं छोड़ पाता। यह तो किस्मत अच्छी थी कि कभी गिरा नहीं वरना कुछ भी हो सकता था।

यूँ तो भारत के सभी प्रांतों में अलग-अलग नाम से इस त्योहार को मनाते हैं लेकिन उत्तर प्रदेश में मुख्य रूप से स्नान-दान पर्व के रूप में मनाया जाता है। इस दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व है। प्रयाग का प्रसिद्ध माघ मेला भी इसी दिन से प्रारंभ होता है। सूर्य की उपासना का यह त्यौहार हमें अंधेरे से उजाले की ओर ले जाने वाला त्योहार है। इस दिन से सूर्य उत्तरायण होते हैं। दिन बड़े व रातें छोटी होती जाती हैं। माना जाता है कि भगवान भाष्कर शनि से मिलने स्वयंम् उनके घर जाते हैं। शनि देव मकर राशि के स्वामी हैं इसलिए इसे मकर संक्रांति के नास से जाना जाता है। गंगा स्नान के  पश्चात खिचड़ी दान व खिचड़ी खाने का चलन है। इस दिन की (उड़द की काली दाल से बनी) खिचड़ी भी साधारण नहीं होती वरन एक विशेष पकवान, विशेष अंदाज में खाने का दिन होता है जिसे उसके यारों के साथ खाया जाता है। लोकोक्ति भी प्रसिद्ध है... खिचडी के हैं चार यार । दही, पापड़, घी, अचार।। इसलिए इसे खिचड़ी के नाम से भी जाना जाता है। त्योहार से पूर्व ही विवाहित बेटियों के घर खिचड़ी पहुँचाने के अनिवार्य सामाजिक बंधन से भी इस पर्व के महत्व को समझा जा सकता है। इस त्योहार को सूर्य की गति से निर्धारित किया जाता है इसलिए यह हर वर्ष 14 जनवरी के दिन ही मनाया जाता है।  

मकर संक्रांति ज्यों-ज्यों करीब आता त्यों-त्यों पतंगबाजी का शौक परवान चढ़ता। गुल्लक फूट जाते। एक-एक कर सभी बड़ों से मंझा-पतंग खरीदने के पैसे मांगे जाते। खिचड़ी से एक दिन पहले जमकर खरीददारी होती। देर शाम तक नये खरीदे गये पतंगों के कन्ने साधे जाते। थककर जब बच्चे सोते तो नींद में भी पंतगबाजी चलती रहती। दूसरी तरफ पिताजी अपनी खरीददारी में परेशान रहते। बड़ों के लिए यह पर्व जहाँ धार्मिक-सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होता वहीं बच्चों के लिए इसका महत्व मात्र पतंगबाजी और तिल-गुड़ के लढ्ढू खाने तक ही सीमित था। इस दिन के लिए जहाँ पिताजी जप-तप, दान-स्नान  की तैयारी में व्यस्त रहते वहीं माता जी बच्चों के लिए तिल-गुड़ के लढ्ढू, चीनी खौलाकर उसके शीरे में मूंगफली के दाने की पट्टी बनाने में लगी रहतीं। आनंद वैसे तो नित्य गंगा स्नान करता मगर आज के दिन पतंगबाजी के चक्कर में नहाने में भी समय जाया नहीं करना चाहता था। बिना स्नान किये भोजन तो क्या एक लढ्ढू भी छूने की इजाजत नहीं थी वरना संभव था कि वह पूरे दिन बिना स्नान के ही रह जाता।

इधर सुरूज नरायण रेती पार से निकलने की तैयारी करते उधर आनंद आकाश ताक रहा  होता। उसे बस प्रतीक्षा इस बात की होती कि कहीं आकाश में एक भी पतंग उड़ते दिख जाय । सूर्य का उगना नहीं, पतंग का आकाश में दिखना मकर संक्रांति के आगाज का संकेत होता। धूप निकलने तक तो समूजा बनारस आनंद के इस महापर्व में पूरी तरह डूब चुका होता। क्या किशोर  ! क्या युवा ! सभी अपनी-अपनी पेंचें लड़ा रहे होते। हर उम्र के लिए यह त्योहार गज़ब की स्फूर्ती प्रदान करने वाला होता। वृद्ध धार्मिक क्रिया कलापों में तो किशोर पतंग बाजी में मगन रहते । सबसे दयनीय स्थिति माताओं की होती। एक ओर तो वे अपने पति देव के धार्मिक अनुष्ठानों की पूर्णाहुती देतीं वहीं दूसरी ओर बच्चों की चिंता में दिन भर उनकी सासें जहाँ की तहाँ अटकी रहतीं। युवा पतंग के पेंचों के साथ-साथ दिलों के तार भी जोड़ रहे होते। जान बूझ कर दूर खड़ी षोड़शी के छत पर पतंग गिराना और न तोड़ने की मन्नत करना बड़ा ही मनोहारी दृष्य उत्पन्न करता । ऐसे दृष्यों को देखकर कहीं सांसे धौंकनी की तरह तेज-तेज चलने लगती तो कहीं लम्बी आहें बन जातीं। वे खुश किस्मत होते जो किसी बाला से पतंग की छुड़ैया भी पा जाते।  

सूर्यास्त के समय का दृष्य बड़ा ही नयनाभिराम होता। समूचा आकाश रंग-बिरंगे पतंगों से आच्छादित। जिधर देखो उधर पतंग। पतंग ही पतंग। दूर गगन में उड़ते पंछी और पतंग में भेद करना कठिन हो जाता। पंछिंयों में घर लौटने की जल्दी। पतंगों में और उड़ लेने की चाहत। लम्बी पूंछ वाली पतंग। छोटी पूंछ वाली पतंग। काली पतंग। गुलाबी पतंग। कोई पतंगबाज फंसा रहा होता पतंग से पतंग तो कोई पतंगबाज लड़ा रहा होता पतंग से पतंग । कोई कटी पतंग सहसा पा जाती सहारा। थाम लेती उसका हाथ उसके आगे-पीछे घूमती दूसरी मनचली पतंग। कोई दुष्ट ईर्ष्या वश खींच लेता उसकी टांग। शोहदे चीखते ...भक्काटा हौ.....हो जाती वह...फिर से कटी पतंग। गिरने लगती बेसहारा दो कटी पतंग। सहसा खुल जाता किसी अभागे का भाग। थाम लेता एक की डोर। खींची चली आती दूसरी भी, पहली के संग। लम्बी होने लगतीं परछाईयाँ । गुलाबी होने लगता समूचा शहर । पंछियों मे बदल जाते सभी पतंग सहसा। गूँजने लगती चहचहाहटें। छतों से उतरकर कमरों में दुबकने लगते बच्चे। चैन की सांस लेता थककर निढाल हुआ दिन। खुशी से झूमने लगता चाँद। सकुशल हैं मेरे आँखों के तारे !       
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री पोस्ट होने के कारण कमेंट का विकल्प बंद है। आपने अभी तक पतंग नहीं उड़ाई तो मेरी पिछली पोस्ट की कविता 'पतंग' पढ़ कर आनंद ले सकते हैं...सादर।

12.1.12

पतंग

कटे बांस के
दो टुकड़ों संग
बंधी हुई डोरी।

मैं पतंग हूँ
उड़ना चाहूँ
उड़ा मुझे होरी।।

अरे ! संभल के
ठुमकी ठुमकी
नील गगन आया
ढील न इतना
खींच मुझे अब
फटती है काया

शातिर दुनियाँ
छूट ना जाए
अपनी यह जोरी।

एक न मानी
पेंच लड़ाई
सौतन से तूने
कटी मैं मगर
मेरी नज़र से
तू ही लगा गिरने

लगे लूटने
कई हाथ अब
मैं तो थी कोरी।
......................