15.1.12

बनारस की छत और पतंगबाजी














पतंग

आवा राजा चला उड़ाई पतंग ।

एक कन्ना हम साधी
एक कन्ना तू साधा
पेंचा-पेंची लड़ी अकाश में
अब तs ठंडी गयल
धूप चौचक भयल
फुलवा खिलबे करी पलाश में

काहे के हौवा तू अपने से तंग । [आवा राजा चला...]

ढीला धीरे-धीरे
खींचा धीरे-धीरे
हम तs जानीला मंझा पुरान बा
पेंचा लड़बे करी
केहू कबले डरी
काल बिछुड़ी जे अबले जुड़ान बा

भक्काटा हो जाई जिनगी कs जंग । [आवा राजा चला...]

केहू सांझी कs डोर
केहू लागेला अजोर
कलुआ चँदा से मांगे छुड़ैया
सबके मनवाँ मा चोर
कुछो चले नाहीं जोर
गुरू बूझा तनि प्रेम कs अढ़ैया

संझा के बौराई काशी कs भंग। [आवा राजा चला...]
................................


बाल सखा,  जिन्होने हमें पतंगबाजी का न्यौता दिया, वे तो एक कटोरा भांग छानकर टुन्न पड़े थे। छत पर चढ़ने लायक भी नहीं।




45 comments:

  1. अहा, आनन्द भयो बनारस..

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    1. भ्रमर मुसुकाई धायो..! आयो का बसंत?

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  2. खूब उडी पतंग मज़ा आ गया

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    1. आपने देखा तो हमको भी मजा आ गया:)

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    1. हाय! कविता पर चित्र भारी पड़ गये..:(

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  4. काशी(वाराणसी) की बात ही क्या - यह नगरी तो प्रलयकाल में भी नष्ट नहीं होती !

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  5. शतरंजबाजी और पतंगबाजी में सुध-बुध रखने की परंपरा नहीं होती। कनकौए काटने का तो अपना एक अलग ही नशा है!!

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    1. मैं शतरंज का भी नशीलची रहा हूँ..लिखकर पढ़ाउंगा आपको अपनी दीवानगी।..धन्यवाद।

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  6. बनारस और पतंगबाजी क्या रंग जमाया है.

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  7. बधाई स्वीकार करें |

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  8. नयनाभिराम चित्र और सजीली कविता ने मन मोह लिया।

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    1. शुक्रिया, आपने मेरी कविता की इज्जत रख ली।

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  9. पुर-अकास खुब उड़े पतंगा,ऊपर सरग तs नीचे गंगा !!

    मस्त पतंग उडाय रहे हो ,हुज़ूर !

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    1. ऊपर सरग त नीचे गंगा!
      वाह! क्या बात कही है आपने.! तबियत मस्त हो गई।

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    1. nostalgia हम नहीं समझे शब्द सम्राट !:(

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  11. अरे ई हमरी आँख का क्या हुआ जी ...पांडे जी ?
    ई ससुरा मांझा और सद्दी तो दिखाइए नहीं पड़ रही ?

    कम से कम ब्लॉग पोस्ट में डालने के मारे इनका तो कलरफुल किये होते ?

    जय जय बनारस .....जय जय बनारसी !!!

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    1. जब फोटू हिंचाय रहे थे तब ई बात का ध्यान थोड़ी न था कि ब्लॉग में डालना है अउर डोरी मंझा दिखाइए नहीं देगा:)..जय गुरूदेव।

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    2. तो मतलब यह कि केवल फोटुए हिन्चाये ....?
      वैसे ई पोज बिलकुले सच्ची जान पड़ा :)

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    3. कमाल है! कौनो टेक्निक है का कि कौनो ब्लॉग में कोइयो कमेंट का जवाब दे त तुरंते हमको मालूम हुई जाय?

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    4. हा हा हा !
      जैक ऑफ आल ट्रेड्स......मास्टर ऑफ "प्राइमरी"
      से दीक्षा लेने का वक्त अइये गया है !!
      :)



      दो तरीके हैं :
      १- पहला तो यह कि आप स्वयं नीचे कमेन्ट सब्सक्रिपशन सबसे पहले कर लें ! जिससे बाद के सारे कमेन्ट आपके ईमेल में पहुंचे ! (जैसा आप दूसरों के ब्लॉग में टीपने के बाद करते होंगे?)

      २- या तो सबसे अच्छा यह होगा कि ब्लॉग सेटिंग के कमेन्ट सेक्शन में जाकर कमेन्ट डिलीवरी ओप्शन में अपना ई-मेल पता चिपका दें ...जिससे आपके ब्लॉग में आने वाली सभी टीपों का बैकअप भी बनता रहेगा !!

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    5. आप पद में प्राइमरी के मास्टर होंगे मगर ब्लॉगिंग में विश्वविद्यालय के प्रोफेसर लग रहे हैं। प्राइमरी के विद्यार्थी तो हम हैं जो आपका बताया कमेंट डिलीवरी ओप्सन ढूंढते रह गये:(

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    6. पहले अपने ब्लॉग की सेटिंग में जाइए फिर पोस्ट्स एंड कमेंट्स में जाकर मोबाइल और ई-मेल में जाइए और उसके बाद उसमे ओप्शन दिखाई पड़ेगा Comment Notification Email उसमे प्यार से अपना ई-मेल चिपका दीजिए !!!

      बस्स आप भी प्रोफ़ेसर हुए जी !
      :)

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    7. अब हो गया गुरू जी। मोबाइल और ई-मेल वाला पहिले ही न बताना था!..आभार।

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  12. खूब पतंगबाजी हुयी है ..बढ़िया ..

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  13. बुझाला बसंत चोरी दुबके इन्ही पतंगवां क डोर पकडे आवत बा ......सावधान होई जा संत लोग!

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    1. बंसतवा, पतंगवा क डोर पकड़े आयल, नाव में बैठ के गंगा मैया क उजा-पूजा करत रहल, तब ले चुनाव में फंस गयल..भहराय के डूब न जाय:(

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  14. ईर कहीं चला पतंग उडाई,
    बीर कहें चला पतंग उडाई
    फत्ते कहींन चला पतंग उडाई..
    हम कहा सब उड़ाइहें पतंग त लूटी के?? लागल रहा देवेंदर भाई चहुन्चक!!

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    1. हा..हा..हा..
      ढेर क लूट लेहला अब करबा का ?
      आवा राजा चला उड़ाई पतंग:)

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  15. आवा राजा कहके जिन्होंने पतंग उड़ाने का निमंत्रण दिया उनका फोटो नहीं लगाए आप ,कविता के पोर पोर से उनकी अभ्यार्थना झलक रही थी ! पर टिप्पणीकारों की टिप्पणियों से भी इस बात का अहसास होता है कि इन सबको यहाँ पर उनके शब्द नहीं चित्र चाहिये मित्र :)

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    1. हा..हा..हा..। वे पक्के बनारसी हैं। सुबह तीन बजे गंगा स्नान करने वाले और महांमृत्युंजय(बाबा विश्वनाथ का प्राचीन मंदिर) पर एक लोटा जल चढ़ाकर लौटने वाले। मैं जब तक पहुँचा वे एक कटोरा भांग छानकर टुन्न पड़े थे। सीढ़ी चढ़कर छत पर आने की स्थिति में भी नहीं थे। मैं तो उनके बच्चों के साथ ही पतंगबाजी का मजा ले पाया। लगाता हूँ उनका चित्र भी।

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  16. wah gurudev........ chha gaye aap to:)))

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  17. चित्रों में छतें और कविता में पतंगे --छा गई भाई . :)

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  18. क्या बात है देव बाबु एक ही पोस्ट में बनारस के नज़ारे, कनकव्वों के मज़े और भंग की मस्ती........बढ़िया है जी|

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  19. पतंग तो अंतिम चित्र में दिखी, रजाई ओढ़े! :-)

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  20. बधाई है अब तक पतंग उड़ाने में मजा आ रहा है.पतंग उड़ा लिए मगर खुद भंग का आनंद लिए कि नहीं ?

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  21. ए हो पांडे जी ! झूठी मत बोला हो ..तुहूँ त पियले रहा भंगिया ....तबहीं न पतंगिया कटवाय दिहला ..
    अब आज से बनारसिये बोलिया मं लिखिह हो ...कविता मं मजा आगइल.....

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    1. हा हा हा..। काशिका बोली की मिठास ही ऐसी है। प्रयास करूंगा इसमे और लिखने का। ..आभार।

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  22. Ho hi Kashi ka Funda,
    udawa Guddi, Kha Ke Dhunda,
    Soch main padal ho Ghate ka Panda,
    Murgi Pahle ki, Pahle Anda.
    --------------------------------
    Kanni Chor Bhayal How Guddi,
    Anna Sadhat Hauwn Kanna,

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