22.1.12

ढाई बाई चार फुट की चौकी



ढाई बाई चार फुट की चौकी
जिसके चारों तरफ लगे हैं
हर कोनों पर उठे लकड़ी के मुठ्ठों से जुड़ी
अलमुनियम के रॉड की रेलिंग
एक बच्चे के
रात में सोते समय
बिस्तर से गिरते रहने की चिंता का परिणाम
सुरक्षित पलंग।
                   
चौकी में रेलिंग नहीं है
कट चुके हैं लकड़ी के मुठ्ठे
बड़ा हो चुका है बच्चा
अब नहीं सो सकता चौकी पर
प्राचीन पलंग पर बैठकर
अब वह
रोज सबेरे
पढ़ता है अखबार
रगड़ता है चंदन
(ताखे पर विरासत में बैठे ठाकुर जी के लिए)
खाता है
दाल-भात
रात
देर से आने पर
वहीं ढकी मिल जाती है उसे
रोटी-सब्जी भी।

जगते हैं भाग
घूरे के भी
सनमाइका जड़ा है
ढाई बाई चार फुट की चौकी में !
जिसके इर्द गिर्द
लोहे की चार कुर्सियों पर बैठकर
दोस्तों के साथ
अब वह
शान से पी रहा है
चाय


एक दिन
दफ्तर से लौटकर
देखता है 
सदन बढ़ई जोड़ रहा है
चार पैर
ढाई बाई चार फुट की चौकी में
चौकी
अब नहीं रही चौकी
बन चुकी है
डाइनिंग टेबुल !
उसके इर्द-गिर्द
रखी हैं
चार नई प्लॉस्टिक की कुर्सियाँ
जिस पर बैठकर
वह और उसका परिवार 
एक साथ कर सकते हैं भोजन
खुश हो
कहती है उसकी पत्नी...
एक कुर्सी और लाइये न !
ताकि साथ बैठ सके
छुटकी भी।

डाइनिंग टेबुल की जुड़ी टांगों पर
उभर आये रंग
खुद ही कहते हैं
अपनी
राम कहानी

अकेले में
जब कोई नहीं होता कमरे में
बहुत ध्यान से   
सुनता रहता है वह
ढाई बाई चार फुट की चौकी और
डाइनिंग टेबल के बीच की
बातचीत
और.... 
ट्यूबलाइट की रोशनी
नाक पर चढ़े चश्मे को देखकर  
समझती है
कि वह अभी
अखबार पढ़ रहा है।
...................................................

65 comments:

  1. एक अतिसम्वेदनशील
    कवि ही कर सकता है
    वार्तालाप
    अपने मेज़ कुर्सी
    और ढाई बाय चार
    फ़ुट की चौकी से

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  2. ढिआई फुट की चौकी के माध्यम से चिन्तन करने क अनुभव अच्छा लगा। बधाई।

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    1. आपको स्वस्थ देखकर हमें भी बहुत अच्छा लगा।

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  3. अत्यंत संवेदनशील रचना और सच का आइना भी.

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  4. अदभुद.............

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  5. बढ़िया प्रस्तुति...
    आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 23-01-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  6. उसका बढते जाना ,ज़रूरतों के साथ
    पर,कुछ चीज़ें हैं जो नहीं बदलतीं!
    ...जो बचा सको तो बचा लो,अपना पीढा(पाटा)अपनी चौकी !

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  7. बचपन से बुढ़ापे तक का सफ़र एक ही जगह पूरा कर दिया देवेन्द्र जी ।
    देखा है जिंदगी को बहुत करीब से ।

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    1. ..जितना देखो लगता है कुछ नहीं देखा। जैसे..

      बांस पर चढ़ता
      नन्हा कीड़ा
      सहता निरंतर
      गिरने की पीड़ा
      चढ़ता जाता
      जितना ऊपर
      जानता जाता
      धरती की विशालता
      और अपनी
      क्षुद्रता।
      ............

      ...आपके एक मिसरे ने छेड़ दिया डा0 साहब..! देखिए दूसरा ठीक है?

      देखा है जिंदगी को बहुत करीब से
      खाई है ठोकरें भी बहुत नसीब से।

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    2. बांस पर चढ़ता नन्हा कीड़ा
      चढ़ता , फिर गिरता , फिर चढ़ता ।
      इसी गिरने चढ़ने ने जिंदगी का फ़लसफ़ा सिखा दिया ।

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    3. दराल साहब ,
      इन दिनों पीठासीन अधिकारी देवेन्द्र पाण्डेय जी का कोई भरोसा नहीं कब क्या कह / लिख गुजरें , चौकी से लेकर टेबिल तक के सफर में लकड़ी उन्होंने अब तक सुरक्षित रखी है और अपने सभी मित्रों को बचपन से बुढापे तक पहुंचा कर ठहर भी गये हैं ! जिसने भी कविता पे आँख तरेरी उसके बुढ़ापे के बाद का हाल शुरू ... :)

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    4. और एक नमूना ये भी देखिये कि आपको पहला जबाब देते हुए उन्होंने किस बेदर्दी से मिसरा (मिश्रा) को मिसरे कहा है :)

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    5. लकड़ी और बुढ़ापा ---हा हा हा !
      यह चिंता भी हमारे देश में ही होती है ।
      बेदर्दी वाला मसला उनका आपसी मामला है । :)

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    6. कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना!:)

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    7. यह भी खूब कही,मगर लकड़ी बेचारी वहीँ रही !

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  8. चकाचक है जी! बहुत चकाचक है! :)

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  9. ढाई फुट की चोकी और उसका वार्तालाप ... जीबन के बदलाव को मापने का प्रयास ...

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    1. मापना तो संभव नहीं, झांकने का छोटा सा प्रयास।..आभार।

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  10. बदलाव से विरासत तक का सफ़र .. प्रभावी व सुन्दर लिखा है

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  11. देवेन्द्र जी ,
    आपके सकारात्मक चिंतन का धन्यवाद जो ग़ुरबत के चक्रव्यूह में फंसा परिवार उस टेबिल में चाय ही पी रहा है वर्ना...

    वंचितों / मजलूमों के गम देशी दारू से दूर हों तभी रचना उत्कृष्ट कहलाती है !

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    1. पाण्डेय जी सात्विक आदमी बानी ...दारू न नू पिहें....

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  12. छोटा सा कमरा और जीवन के बारे में सारी बातचीत...वाह..सशक्त..

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  13. पहली बार जाना कि आप ऐसी कविताएं भी लिखते हैं। बहुत प्रभावी। पर इसे पढ़ते हुए एक पुराना गीत या कविता देख तमाशा लकड़ी की याद हो आई।

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    1. आपने पसंद किया..आनंद आ गया।

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  14. आपका पोस्ट अच्छा लगा । मेरे नए पोस्ट "धर्मवीर भारती" पर आपका सादर आमंत्रण है । धन्यवाद ।

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  15. बदलते मूल्यों का संभाषण ....

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  16. बहुत ही संवेदनशील और सशक्त रचना...

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  17. इस रचना में प्रतीकों का सहज एवं सफल प्रयोग किया गया है।
    मानवेतर या अमूर्त पात्रों का समावेश किया गया है। मानवेतर पात्रों का सफल प्रयोग किया है।
    एक और जो अच्छी बात मुझे लगी वह यह कि इसमें वर्णन और विवरण का आकाश नहीं वरन् विश्लेषण, संकेत और व्यंजना से काम चलाया गया है

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  18. बढिया प्रस्‍तुति।

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  19. बहुत सुंदर व भावपूर्ण चिंतन पांडेय जी।

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  20. bahut khoob pandey ji...........main to fan ho gaya apka

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  21. देवेन्द्र जी,आपकी कवितायेँ प्रभावित करती हैं....!

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  22. बदलते जीवन मूल्यों का सफल चित्रण।
    सुंदर रचना।

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  23. devendr ji apki rachana bahut achhi hai ....aj charchamach pr padhane ka avsar mil gaya ....badhai ke sath abhar bhi .

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  24. चौकी को बिम्ब बना कर जीवन में आने वाले उतार चढ़ाव को परिभाषित कर दिया है ..सुन्दर और सशक्त रचना

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  25. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की जयंती पर उनको शत शत नमन!

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  26. लोगों ने जो भी कहा वो दीगर.. मेरे लिए इसपर कुछ भी कहना कविता की उस चौकी पर (जिसपर मैंने अपनी दादाजी को सारा जीवन बिताते देखा और उनकी दुनिया देखी) सनमाइका लगाने जैसा होगा!! देवेन्द्र जी, प्रणाम स्वीकारें आज!!

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    1. मुझे तो आपका आशीर्वाद चाहिए ।..सादर।

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  27. आज ही हम नत्तू पांड़े को लाये पलंग की बात कर रहे थे - उसमें वह खिलौने सा रहता था, अब जब मन होता है कूद कर बाहर आ जाता है और धंस जाता है अपनी मां के बगल में!

    समय बदलता है, तेजी से।

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  28. वह क्या बात है ज़िंदगी का गहन फलसफा बहुत ही खुबसूरती से रचा है आपने आपके ब्लॉग पर आना सार्थक सिद्ध हुआ॥:)समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है

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    1. मेरा लिखना भी सार्थक हुआ..धन्यवाद।

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  29. बदलते मूल्यों की कसक को बहुत गहरी वेदना के साथ जीने की मजबूरी दर्शाती रचना,

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  30. साक्षी भाव से सब कुछ को देखती एक रचना .

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    1. मेरे मन की बात लिख दी आपने..आभार।

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  31. पीठासीन हो चुके आदमी को हर और काठ काठी ही सूझती है.... :)

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    1. हा हा हा..सुनते ही काठ मार जाता है:)

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  32. वाह देव बाबु.......एक गाना याद हो आया आपकी इस पोस्ट पर........देख तमाशा लकड़ी का........बहुत सुन्दर पोस्ट है ...........हैट्स ऑफ इसके लिए|

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  33. बचपम से बुढापे तक का सफर बहुत अच्छा रहा..

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  34. आजकल बड़े दार्शनिक अंदाज़ में दिख रहे हैं देवेन्द्र भाई! हर कविता दो कदम और गहरे ले जाती है!!

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  35. बहुत ही गंभीर और सार्थक कविता |गणतन्त्र दिवस की बधाई |

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  36. बहोत अच्छी रचना कि है देवेन्द्र जी आपने ।

    नया हिन्दी ब्लॉग

    हिंदी दुनिया

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  37. Badlaw ki bahut sundar prastuti

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  38. वाह सभी कुछ बात करते हैं

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  39. बेहद गहन अभिव्यक्ति…………॥

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  40. सुन्दर प्रस्तुति

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